LLB Notes Hindi - Law Study Material (Sem Wise)

Administrative Law Long Answer

प्रश्न 1. प्रशासनिक विधि का अर्थ एवं परिभाषा बताइये।

अथवा

प्रशासनिक विधि से आप क्या समझते है ?

उत्तर – प्रशासनिक विधि (Administrative Law) प्रशासनिक विधि का सम्बन्ध सरचना से अधिक कृत्य को ध्यान में रखते हुए सरकार के प्रशासनिक प्रवर्तन और नियंत्रण से है। यह प्रशासन की शक्तियों का विवेचन करती है और उनके प्रयोग के लिए प्रक्रिया को अधिकथित करती है।

प्रशासनिक विधि की परिभाषाएँ

(Definitions of Administrative Law)

अन्य जोविट के अनुसार प्रशासनिक विधि वह है जो प्रशासन का संचालन करती है।

प्रो. वेड के अनुसार प्रशासी विधि का सम्बन्ध प्रशासी अधिकारियों के कार्य संचालन और शक्ति नियन्त्रण से है जो ढाँचे की अपेक्षा कार्य पर अधिक बल देती है।’

प्रो. डायसी के अनुसार, “यह किसी भी राज्य की विधि का वह अंग है जो

(1) राज्य के सभी अधिकारियों के विधिक प्रस्थिति तथा दायित्वो का

(2) राज्य के अधिकारियों के प्रति सामान्य व्यक्तियों के अधिकारों तथा उत्तरदायित्वों का तथा

(3) उस प्रशासनिक प्रक्रिया का निरूपण करता है जिसके द्वारा उन अधिकारों तथा दायित्वों को लागू किया जाता है।”

केनिथ कल्प टैविस के अनुसार, प्रशासी विधि वह विधि है जिसका सम्बन्ध प्रशासी संस्थानों जिनमे विशेष रूप से प्रशासी कार्यों की न्यायिक समीक्षा को नियन्त्रण करने वाले कानून भी है, शक्तियों और प्रक्रियाओं से है।

डा. एस. पी. जैन के अनुसार प्रशासनिक विधि का कार्य इस बात को सुनिश्चित करता है कि सरकारी कार्य कानून के अनुसार कानूनी सिद्धान्तों के आधार पर और तर्क तथा न्याय के आधार पर हो।

प्रश्न 2. प्रशासनिक विधि की प्रकृति एवं क्षेत्र (विस्तार) का वर्णन कीजिए।

अथवा आधुनिक भारत में प्रशासकीय विधि के महत्व एवं प्रकृति की विवेचना कीजिए।

उत्तर –

प्रशासनिक विधि की प्रकृति एवं क्षेत्र

(Nature and Scope of

Administrative Law)

      प्रशासनिक विधि इतनी महत्वपूर्ण है कि उसका अध्ययन एक स्वतन्त्र विषय मानकर ही करना उचित है। प्रशासनिक विधि का सम्बन्ध प्रशासनिक एजेन्सियों जैसे रेलवे बोर्ड, केन्द्रीय राजस्व बोर्ड, यातायात अधिकारी, वेतन बोर्ड इत्यादि अर्द्धव्यवस्थापिका (Quasi-legislature) और अर्द्धन्यायिक व प्राधिकरणों से है। प्रशासनिक विधि के अन्तर्गत मन्त्री या उसके अधीनस्थ मन्त्रालय के प्राधिकारों के विवेकाधिकारों के बारे में अध्ययन किया जाता है तथा उनके प्रयोग के औचित्य की समीक्षा की जाती है। प्रशासनिक विधि के अन्तर्गत प्रशासनिक टिब्यूनल, चुनाव न्यायधीशकरण, औद्योगिक न्यायाधिकरण आयकर अपील न्यायाधिकरण इत्यादि के अधिकारी, दायित्वों एवं कार्यों का अध्ययन किया जाता है।

    संविधान के अनुसार जो एजेन्सी, कॉपोरेशन या न्यायाधिकरण स्थापित किए जाते हैं उन सबकी प्रशासनिक शक्तियों एवं दायित्वों की समीक्षा करना तथा यह देखना कि विशेष रूप से जब उनमें से कोई न्यायालय के रूप में कार्य करे तो उनकी न्याय प्रक्रिया भी न्याय सिद्धान्तो के अनुरूप हो। यह सब प्रशासकीय विधि की विषय-वस्तु (Subject-matter) है। न्याय एवं न्यायालय से भी प्रशासकीय विधि का घनिष्ठ सम्बन्ध है क्योंकि जब प्रशासकीय एजेन्सी या कोई न्यायाधिकरण (Tribunal) न्यायालय के रूप में कार्य करता है तो उस समय उसको कुछ विशिष्ट प्रक्रियाओं को छोड़कर न्यायालयों की प्रक्रिया एव आचार संहिता के अनुकूल आचरण करना पड़ता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि प्रशासनिक विधि का राज्य में उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थान है जितना विधि की अन्य शाखाओं का प्रशासनिक विधि की उत्तमता इसी बात पर निर्भर प्रशासनिक अधिकारियों की शक्तियों को न्यायिक नियन्त्रण में रखा जाए और उन पर संवैधानिक उत्तरदायित्व हो ।

हवार्ट के शब्दों में यदि प्रशासनिक शक्ति पर नियन्त्रण न रखा गया तो नवीन निरंकुशता फैल जायेगी”

प्रश्न 3- प्रशासनिक विधि के उद्देश्य एवं कारणों को समझाइये।

अथवा

प्रशासनिक विधि को परिभाषित कीजिए। वर्तमान युग में  त्वरित विकास के   इसके कारणों को समझाइये।

अथवा

प्रशासनिक विधि के विकास के कारणों की विवेचना कीजिए।

अथवा

कल्याणकारी राज्य की स्थापना के कारण प्रशासनिक विधि के विकास में निरन्तर अभिवृद्धि होती जा रही है।” कथन की विवेचना करते हुए प्रशासनिक विधि में विकास के अन्य कारणों का भी उल्लेख कीजिए।

उत्तर –

प्रशासनिक विधि के उद्देश्य

प्रशासनिक विधि के उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

1. प्रशासनिक अधिकारियों की गैर-कानूनी और स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति से नागरिकों की स्वतन्त्रता।

2. नागरिकों के जीवन और उनकी सम्पत्ति की रक्षा।

3. प्रशासन कार्य कुशलता में कोई कमी न होना।

4. प्रशासन द्वारा अधिकारों के दुरुपयोग पर रोक।

5. प्रशासनिक अधिकारियों के अनाधिकार कृत्यों पर नियन्त्रण।

    आधुनिक युग में प्रशासनिक विधि के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। प्रशासनिक विधि के अभ्युत्थान को आर्थर टी. वाण्डर विल्ट ने 20वीं सदी की विधि का अभूतपूर्व विकास कहा है।

प्रशासनिक विधि के विकास के कारण

प्रशासनिक विधि का अभ्युदय 18वीं शताब्दी से हुआ और उसके बाद शीघ्रता से विकास होता चला गया। प्रशासनिक विधि, संवैधानिक विधि की एक अंग मात्र न रहकर स्वयं एक स्वतन्त्र विषय बन गयी।

न्यायाधीश श्री वेंकटारामाहिया के अनुसार प्रशासी विधि के सिद्धान्तों का मुख्य 3 सरकारी शक्तियों पर नियन्त्रण से है और इसका किसी कम्पनी इत्यादि के कार्यों या इनके प्रशासन से नहीं है। प्रशासी विधि का मूल उद्देश्य सरकार और सरकारी अधिकारियों की शक्तियों पर नियन्त्रण रखना है जिससे कि वे अपने अधिकारों और शक्तियों का दुरुपयोग न कर सके।

प्रशासनिक विधि के विकास के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं (1) राज्य के कार्यों में वृद्धि – राज्य के कार्यों में अत्यधिक वृद्धि हो जाने के कारण प्रशासन को वे सभी कार्य दे दिए गए जो कि मूलतः राज्य को करने थे। इसके अन्तर्गत प्रशासन के नियम व उपनियम बनाये गये और न्यायिक तथा अर्द्धन्यायिक संस्था के रूप में विवादों का निर्णय इत्यादि करने का अधिकार दिया गया।

(2) राज्य के उद्देश्य में परिवर्तन – राज्य का कार्यक्षेत्र समाज के स्वरूप पर निर्भर करता है। प्रारम्भिक समाज में राज्य का कार्य मुख्यतः केवल विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा करना तथा आन्तरिक शान्ति व्यवस्था बनाये रखना था परन्तु समाज का विकास होने से राज्य के सामने अनेक नई-नई समस्याएँ आयी।

(3) कार्य कुशलता की वृद्धि एवं शीघ्र न्याय – जब व्यवस्थापिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका पृथक और स्वतन्त्र रूप से कार्य करती है तो उनके कार्य संचालन में इतनी कुशलता नहीं रहती कि वे किसी जटिल मामले का निपटारा ठीक से कर सके। कभी-कभी शीघ्र निर्णय नहीं लिए जा पाते क्योंकि बहुत-सी बातों के लिए एक अंग को दूसरे के ऊपर निर्भर रहना ही पड़ता है।

(4) समाज के स्वरूप में परिवर्तन – प्रारम्भिक युग में समाज का स्वरूप बड़ा ही सरल तथा सामान्य था। लोगों की आवश्यकताएँ इतनी सीमित होती थीं कि ये स्वयं उनकी पूर्ति कर लेते थे। प्रारम्भ में राज्य का कार्य भी बहुत सीमित था। जैसे-जैसे शिक्षा का प्रसार होता गया लोगों में जागृति पैदा होने लगी जिससे कृषि, उद्योग धनो व्यापार व कल-कारखानों में वृद्धि होती गयी।

(5) फ्रांस में प्रशासनिक विधि – फ्रांस में प्रशासनिक विधि को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध विधिशास्त्री डायसी ने यद्यपि फ्रांस की प्रशासनिक विधि की बड़ी आलोचना की परन्तु फिर भी इंग्लैण्ड उसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। फ्रांस में सन् 1872 ई. के बाद जब से काउन्सिल डी-एटेट ने एक स्वतन्त्र न्यायालय के रूप में कार्य करना प्रारम्भ किया तब से फ्रांस में प्रशासनिक विधि का महत्व और भी बढ़ गया।

प्रश्न 4- प्रशासनिक या प्रशासी विधि का क्या महत्व है ?

अथवा

आधुनिक भारत में प्रशासकीय विधि का महत्व समझाइये।

उत्तर –

प्रशासनिक विधि का महत्व

(Importance of Administrative Law)

      प्रशासनिक विधि वह विधि है जो प्रशासनिक अभिकरणों की शक्तियों तथा प्रक्रियाओं से समबन्ध रखती है। प्रशासनिक अभिकरण सरकार का एक ऐसा अंग है, जो न्यायालय तथा विधानमण्डल से भिन्न है। व्यापक अर्थ में यह कहा जा सकता है कि प्रशासनिक विधि परिनियमित विधि तथा प्रशासनिक प्राधिकारियों को नियंत्रित करने की विधि को सम्मिलित करती है। जो कार्य गलत ढंग या कानून का उल्लघन करके किए जाते हैं, प्रशासी विधि इस प्रकार के कार्यों पर नियन्त्रण करती है तथा भविष्य के लिए इस प्रकार के कार्य पर रोक लगाती है। आज के इस वैज्ञानिक युग में प्रशासों विधि के महत्व को अच्छी प्रकार से स्वीकार कर लिया गया है। प्रशासी विधि से सामाजिक विकास पर्याप्त मात्रा में हुआ है तथा सामाजिक विकास के साथ-ही-साथ समाज में रहने वाले व्यक्तियों में प्रशासी विधि के उत्तरदायित्व में भी काफी वृद्धि की हुई है। प्राचीन समय में राज्य पर प्रशासन करना सरल कार्य था क्योंकि उस समय जनसंख्या कम थी तथा राज्य के लिए कार्य भी कम थे आज की तरह भ्रष्टाचार का बोलबाला नहीं था। परन्तु वर्तमान में प्रशासकीय अधिकारियों व सामान्य नागरिकों के सम्बन्धों में विरोधाभास होता जा रहा है। इन सम्बन्धों में सुधार करने के लिए कानून की आवश्यकता महसूस की गयी। कानून की सहायता से इन व्यक्तियों एवं अधिकारियों के मध्य आपसी विचारों में सामजस्य स्थापित करने में काफी सहयोग मिला। कानून के द्वारा कार्य भी नियम के अनुसार होते हैं तथा अधिकारियों के द्वारा पद का गलत तरीके से प्रयोग भी कम होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कानून की दृष्टि में प्रशासी अधिकारियों के पद का बहुत अधिक महत्व है क्योंकि प्रशासी विधि से प्रशासन के द्वारा किए गए कार्यों को अच्छे ढंग से लागू किए जाने के लिए सही प्रकार की सूचनाएँ प्राप्त की जाती है।

निम्न बिन्दुओं के द्वारा भी इसके महत्व की पृष्टि की जा सकती है-

1. वैज्ञानिक युग के लिए महत्व।

2. तकनीकी प्रगति।

3. नवीन समस्याओं को हल करना।

4. समय की बचत

5. परिवहन का विकास

6. विद्युत क्षेत्रों में प्रगति।

7. आधुनिक सूचनाओं में सहायता

8. सामाजिक विकास के लिए प्रोत्साहन

9. आर्थिक विकास में सहायता ।

10. अपराधों पर नियन्त्रण।॥

11. प्रशासनिक कार्यों का सीमा में रहकर प्रयोग |

     अत प्रशासी विधि का बहुत ही महत्व है। इसका महत्व दिन प्रतिदिन सभी क्षेत्रों में बढ़ता जा रहा है। समाज के आधुनिकीकरण ने नये-नये किस्म के सामाजिक व आर्थिक अपराधों को जन्म दिया है। इसमें कुछ अपराध इस प्रकार के हो सकते हैं जैसे मिलावट कर की चोरी, कम कर का भुगतान करना, जमाखोरी, तस्करी, नशीली वस्तुओं जैसे अफीम, गाजा, भाग, हिरोइन आदि का बढ़ता प्रयोग इन सभी पर नियन्त्रण के लिए प्रशासी विधि का महत्व अति आवश्यक है।

प्रश्न 5. न्यायाधिकरण पद्धति के दोष बताइए।

उत्तर –

न्यायाधिकरण पद्धति के दोष

(Defects of Tribunal System)

    न्यायाधिकरण पद्धति में अनेक गुणों के साथ-साथ निम्न दोष भी पाये जाते हैं –

1. ये न्यायाधिकरण सामान्यत साक्ष्यविधि के उपबंधों से प्रशासित नही होते हैं। इसकी कार्यवाहियाँ भी सामान्य जनता के लिए खुली नहीं होती। कुछ न्यायाधिकरणों में विधिक प्रतिनिधित्व को इजाजत दी जाती है और कुछ में नहीं। कुछ शपथ पर साक्ष्य ले सकते हैं और कुछ नहीं। अतः स्पष्ट है कि इसकी सरचना, गठन, संविधान में एकरूपता नहीं है।

2. न्यायाधिकरणों के निर्णयों के विरुद्ध अपील का कोई प्रावधान नहीं होता। इनमें शक्ति कुछ ही लोगों के हाथों में सौप दी जाती है और वे न्यायाधीकरणों में बैठक लोगों के अधिकारों को काफी सीमा तक प्रभावित करते हैं फिर भी उनके निर्णयों के विरुद्ध अपील की कोई व्यवस्था नहीं होती है।

3. इन न्यायाधिकरणों में बैठने वाले अधिनिर्णायकों के लिए विधि विशेषज्ञ होना आवश्यक नहीं होता और न ही उनके लिए किसी विधिक विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। प्रो. वेड ने इन न्यायाधिकरणों के दोषों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि बिना अपील वाले न्यायालय को कुछ ऐसे व्यक्तियों को सौप दिया जाता है जो साधारणत न तो योग्यता प्राप्त अधिवक्ता होते हैं और न ही मजिस्ट्रेट अथवा न्यायाधीश होते हैं।

4. इन न्यायाधिकरणों में शपथ पर साक्ष्य लेने का कोई विशेष उपबंधन नहीं होता, अतः प्रतिपृच्छा का प्रावधान उस रूप में नहीं हो सकता जिस रूप में न्यायालयों में हुआ करता है। ऐसी स्थिति में सत्यता को जान पाना कठिन हो जाता है।

प्रश्न 6- आधुनिक भारत में प्रशासनिक विधि के प्रकृति एवं महत्व की विवेचना कीजिए।

उत्तर के लिये दीर्घ उत्तरीय प्रश्न सं. 2 व 4 देखें।

प्रश्न 7- न्यायिक पुनर्विलोकन को परिभाषित करते हुये प्रशासनिक स्वविवेक पर इसके प्रभाव को वर्णित कीजिये।

उत्तर न्यायिक पुनर्विलोकन न्यायिक पुनर्विलोकन को परिभाषित करते हुए प्रो कारबिन ने [कानपुर 2018] कहा है कि न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति न्यायालयों की वह शक्ति है जिसके अन्तर्गत वे विधान मण्डल द्वारा पारित अधिनियमों की संवैधानिकता की जाँच करते हैं। वे ऐसी किसी भी विधि को प्रवर्तित करने से इकार कर सकते हैं जो संविधान के उपबंधों से असंगत हो। अतः यह कार्य न्यायालयों की साधारण अधिकारिता के अन्तर्गत आता है। केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य की ATR1973 P. 1961 के मामले में न्यायमूर्ति खन्ना ने न्यायिक पुनर्विलोकन के संबंध में कहा है कि फेडरल प्रक्रिया में जहाँ विधायी शक्तियों का केन्द्रीय विधानमण्डल और राज्य विधान मण्डल में बटवारा होता है, ऐसे विवादों को निपटाने के लिए कि क्या एक विधान मण्डल ने दूसरे के विधायी क्षेत्र में अतिक्रमण किया है। न्यायालय की व्यवस्था की जाती है और विधानमण्डली द्वारा पारित किये गए अधिनियम की विधि-मान्यता का अवधारण करने के लिए न्यायालयो में न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति प्रदान की गई है। न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति केवल इस बात का विनिश्चय करने तक सीमित नहीं है कि क्या अपेक्षित विधियाँ बनाने में विधान मण्डलों ने अपनी निश्चित विधायी सूचियों की परिधि के भीतर काम किया है। वरन न्यायालय इस प्रश्न पर विचार करते है कि क्या विधियों संविधान के अनुच्छेदों के अनुरूप बनाई गई हैं और उनसे संविधान के अन्य उपबन्धों का उल्लंघन नहीं होता है ? इस प्रकार न्यायिक पुनर्विलोकन हमारी संविधानिक व्यवस्था का एक अपरिहार्य अंग है।

    फ्रांसीसी दार्शनिक मान्टेस्क्यू द्वारा प्रतिपादित शक्ति पृथक्करण के अनुसार कार्यपालिका विधायिका तथा न्यायपालिका तीनों शक्तियों का पृथक्करण किया जाना आवश्यक होता है। राज्य की एक शक्ति दूसरी शक्ति के संचालन में हस्तक्षेप न करे तथा प्रत्येक अग अपनी सीमा में रहकर कार्य करे एवं सरकार के एक अंग में समस्त शक्तियों केन्द्रीयकृत न हो यह विधि के निर्वाह संचालन के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इस शक्तियों के आपस में संतुलन स्थापित करके ही मनुष्य के स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश शक्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है तथा संविधान द्वारा प्रदान किये गए स्वतंत्रताओं की रक्षा की जा सकती है। इस प्रकार न्यायिक पुनर्विलोकन विधायिका कार्यपालिका एवं न्यायपालिका की शक्तियों के प्रयोग पर नियंत्रण रखने की शक्ति है। न्यायिक पुनर्विलोकन की संकल्पना की उत्पत्ति सीमित शक्ति वाली सरकार के सिद्धांत से प्रचलित हुआ है। इस सिद्धांत के अनुसार विधि दो प्रकार की होती है पहली साधारण विधि तथा दूसरी सर्वोच्च विधि। देश की सर्वोच्च विधि यानि संविधान अन्य सभी विधियों का आधार एवं स्रोत होती हैं। ऐसी कोई भी विधि जो संविधान के उपबंधों का अविसंघन करती है, असंवैधानिक मानी जाती है। ऐसी स्थिति में किसी संस्था को इन विधियों को अविधिमान्य घोषित करने का प्राधिकार होता है तथा यह अंग निश्चित रूप से न्यायपालिका ही है जिसके द्वारा न्यायिक पुनर्विलोकन किया जाता है।

प्रश्न 8- प्रशासनिक कृत्यों को सविस्तार व्याख्यायित कीजिए।

उत्तर

प्रशासनिक कृत्य

(Administrative Action)

     प्रशासन को सरकार के तीन कार्यो विधायी, न्यायिक तथा कार्यपालक का केन्द्र बिन्दु माना जाता है। कार्यपालक कृत्य को विधायी तथा न्यायिक कार्यों का अवशेष माना जाता है। नैसर्गिक न्याय के प्रमापों के बावजूद भी सरकार के कुछ ऐसे कृत्य बचे रहते हैं जहाँ पर प्रभावित व्यक्ति की सुनवाई अपेक्षित नहीं होती और इस प्रकार के कार्यों को प्रशासनिक कृत्य कहा जा सकता है।

     वास्तव में सरकार की दो शाखाओं विधान मण्डल तथा न्यायपालिका में जो कृत्य निहित नहीं होते हैं उन्हीं का निष्पादन कार्यपालिका द्वारा किया जाता है और कृत्य प्रशानिक कृत्य कहलाते है।

     कार्यपालिका का एक महत्वपूर्ण कृत्य नीति का निर्धारण और उसका कार्यान्वयन होता है। इसमे निम्न कृत्य सम्मिलित होते हैं-

(i) विधान का प्रारम्भः

(ii) लोक व्यवस्था की स्थापना,

(iii) सामाजिक तथा आर्थिक लोक कल्याण,

(iv) वैदेशिक नीति का निर्देशन,

(v) राज्य के सामान्य प्रशासन का संचालन,

(vi) प्रशासन का निरीक्षण आदि।

प्रशासनिक कृत्य की पहचान – प्रशासनिक कार्य न्याय निर्णायक प्रकृति का नहीं होता है। ऐसे कृत्य का निपटान साक्ष्य या तर्क के आधार पर भी नहीं किया जाता है। यह पूर्णतया एक वैवेकिक कृत्य होता है।

प्रशासनिक कृत्य की विशेषतायें (Characteristics

    of Administrative acts) प्रशासनिक कृत्य की निम्न विशेषतायें होती है –

(a) विरोधी पक्षकारों के बीच विवाद का अभाव

(b) अधिकार का अक्रान्त न होना

(c) निर्णय का सम्पादन

(a) विरोधी पक्षकारों के बीच विवाद का अभाव (Lack of Dispute between Rival Parties) आन्ध्र प्रदेश राज्य बनाम एस. एम. के. परशुराम गुरुकुल AIR 1973 S.C. के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या आन्ध्र प्रदेश पूर्व और हिन्दू धार्मिक संस्था विन्यास अधिनियम, 1966 की धारा 15 के अधीन न्यासियों को नियुक्त करने की सरकार की शक्ति प्रशासनिक शक्ति है अथवा न्यायिक कल्प शक्ति है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णीत किया कि इसमें सरकार का कार्य केवल प्रशासनिक था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जहाँ वाद पक्षकारों के बीच है और वस्तुपरक समाधान के आधार पर उस पर राय देना है तो ऐसा कार्य न्यायिक कल्प होगा अन्यथा वह प्रशासनिक कृत्य होगा।

(b) जहाँ पर पक्षकारों के अधिकार अक्रान्त न हो वहाँ पर भी कृत्य प्रशासनिक माना जाता है।

(c) प्रशासनिक कृत्य विशिष्ट परिस्थितियों में समस्या के त्वरित समाधान से संबंधित होता है इसमें जटिलता का अभाव होता है। इसके सम्पादन के लिए साक्ष्य और तर्क पर विचार करने की आवश्यकता नहीं रहती। यह पूर्णतया व्यक्तिपरक समाधान पर आधारित होता है।

   मुख्य जोर निर्णय नीति तथा समीचीनता पर दिया जाता है। प्रशासनिक कृत्य यद्यपि किसी व्यक्ति के अधिकार का अवधारण नहीं करता फिर भी इसका प्रभाव अधिकार पर पड़ सकता है।

इसमे प्रशासनिक कृत्य के निम्न उदाहरण दिये जा सकते हैं

(1) लाइसेंस जारी करने का कार्य.

(2) अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश जारी करना.

(3) निष्कासन, निर्वासन तथा नजरबंदी,

(4) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अधीन न्यायनिर्णयन हेतु विवाद को निदेशित करना,

(5) राजकीय संपत्ति की नीलामी में बोली को स्वीकार या अस्वीकार करना,

(6) सरकारी लाइब्रेरी हेतु पुस्तकों क्रय,

(7) तथ्यान्वेषण संबंधी कृत्य

(8) अधिग्रहण, अर्जन एवं आवटन सबंधी कृत्य,

(9) पुलिस के निगरानी रजिस्टर में नामों को दर्ज करना,

(10) किसी व्यक्ति विशेष को अधिनियम के कार्य क्षेत्र से छूट देना।

विधि का शासन (Rule of Law)

प्रश्न 9 “विधि का शासन संविधान के रोम-रोम में व्याप्त है तथा वास्तव में उसके आधारभूत लक्षणों का एक अंग है। इस कथन की समीक्षा कीजिये।

अथवा

भारतीय विधि में विधि-शासन की स्थिति व महत्व को स्पष्ट कीजिए।

अथवा

विधि का शासन से आप क्या समझते है ? भारत में इसकी स्थिति एवं महत्व का वर्णन कीजिए।

उत्तर –

भारतीय विधि में विधि-शासन

(Rule of Law in Indian Law) हमारे देश की विधि के अन्तर्गत विधि के शासन को स्वीकार किया गया है। भारतीय विधि में विधि के शासन को मान्यता दी गयी है। भारतीय विधि के संदर्भ में विधि के शासन को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है –

1. संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution) भारत में संविधान सर्वोच्च है तथा संविधान की प्रस्तावना में ही विधि के शासन की संकल्पना को मान्यता प्रदान की गयी है। प्रस्तावना में कहा गया है कि हम भारत के लोग एक सम्प्रभुता सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म एवं पूजा की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा • एवं अवसर की समानता प्राप्त कराने हेतु तथा उनमें व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्रीय एकता एव अखण्डता तय करने वाले भाई-चारे को बढ़ाने हेतु संविधान को अधिनियमित करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि देश में शासन व्यवस्था का संचालन विधि के शासन द्वारा किया जाता है। मनीलाल सिंह बनाम बोरोबाबू, ए. आई. आर. 1994 एस. सी. 505 के बाद में कहा गया है कि भारत में उच्चतम न्यायालय का यह कर्त्तव्य है कि वह विधि की राजसत्ता को बनाए रखे तथा लोगों के विश्वास को सिद्ध करे कि इस देश में विधि के ऊपर कोई नहीं है तथा शासन व्यक्तियों का नहीं वरन विधि का नियम होता है। विधि का शासन किसी को विधि के ऊपर होने का दावा करने की अनुमति नहीं देता है।

2. अधिकारों का संवैधानिक संरक्षण (Constitutional Protection of Rights) भारतीय संविधान में दिए गये मौलिक अधिकार सरकार द्वारा शक्ति के प्रयोग पर सीमा की भाँति कार्य करते हैं। संविधान व्यक्तियों को मौलिक अधिकारों की गारण्टी देता है। यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन किया जाता है तो भारत में विधि का शासन उसकी शिकायते दूर करने हेतु उपयुक्त मंच उपलब्ध कराता है। पीड़ित पक्षकार सर्वोच्च यालय में आवेदन कर सकता है।

3- समता की संवैधानिक अपेक्षा (Constitutional Requirement of Equality) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता को मान्यता देता है। समान दशाओं में सभी व्यक्तियों एवं वस्तुओं को छूटों एवं दायित्वों के आधार पर बराबर समझा जायेगा। संविधान में विधि के शासन की अवधारणा विवेकाधिकार के अनुरूप है। परन्तु विवेकाधिकार का आशय मनमानी करने से नहीं है। प्रशासनिक सरलता को तय करने हेतु प्राकृतिक न्याय के नियमों को विधि के शासन में अपनाने को भी स्वीकार किया गया है। विधि के शासन में यह माना जाता है कि आप कितने ही उच्च क्यों न हो, विधि के अधीन ही है। ए. के. केराइपक बनाम भारत के राष्ट्रपति ए. आई. आर. 1970 एस. सी. 150 के बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा है कि, “विधि का शासन प्रशासन के सम्पूर्ण क्षेत्र में विद्यमान रहता है तथा राज्य के सभी अंग विधि के शासन द्वारा विनियमित किये जाते हैं। कल्याणकारी राज्य में प्रशासकीय निकायों के अधिकार-क्षेत्र में तेजी से वृद्धि होना वाँछनीय है। न्यायाधीश भगवती ने वचन सिंह बनाम पंजाब राज्य, ए. आई. आर. 1982 एस. सी. 1325 के बाद में कहा है कि, विधि का शासन भारतीय संविधान के रोम-रोम में बसा हुआ है तथा वास्तव में उसके लक्षणों का एक अंग है।

4. विधिक वाँछनीयता का पालन (Follow up of Legal Requirement) विधि के शासन में कानूनी वाँछनीयता का पालन करना वाँछनीय होता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पी. साम्बामूर्ति बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य (1987) 1 ए. सी. 362 के वाद में विधि के शासन के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 371 D (5) (परन्तुक) को गैर-कानूनी माना गया है। न्यायालय ने निर्धारित किया कि सम्बद्ध प्रावधान विधि के शासन का उल्लंघन करता है जो संविधान की मूल सरचना एवं विशेषता है। विधि के शासन का यह मौलिक सिद्धान्त है कि कार्यपालिका या किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा अपनी शक्तियों का प्रयोग केवल विधि की शक्ति के अनुसार ही किया जा सकता है। राज्य के सभी अंग विधि की सीमा में रहते हैं।

       महत्व (Importance) अन्त में निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि भारत एक प्रजातान्त्रिक देश है तथा विधि का शासन यहाँ की एक आधारभूत वांछनीयता है। विधि के शासन के लिए स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका आवश्यक होती है। इस हेतु विधि का शासन आवश्यक होता है। विधि के समक्ष सभी नागरिकों को समानता दी जाती है। भारत में सभी नागरिकों को राज्य द्वारा शक्ति के मनमाने उपयोग के विपरीत संरक्षण दिया जाता है। विधि के शासन तथा प्रशासकीय विधि में कोई विरोध नहीं है।

प्रश्न- 10 डायसी के मत की समीक्षा कीजिए।

उत्तर- डायसी के मत की समीक्षा (Comment on Dicey’s View)- डायसी द्वारा विधि के शासन की विद्यमानता की कल्पना एवं विस्तार फॉस के ड्राफ्ट एडमिनिस्ट्रेटिन के आधार पर की गई थी। इसे इनकी एक बहुत बड़ी गलती माना जाता है। डायसी द्वारा विशेष प्राधिकरणों को ध्यान में नहीं रखा गया। अब डायसी के मत को पूर्णतया स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह संकल्पना सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक मूल्यों पर आधारित है जोकि बदलती रहती है। अतएव इसे भी परिवर्तनीय माना जाना चाहिए। डायसी के मत की समीक्षा हेतु निम्नलिखित पर विचार किया जाता है-

1. शासक एवं शासित की विधिपूर्ण साम्यता का प्रश्न (Question of Legal Equality of Administrator and Administered)- डायसी के काल में शासक एवं शासितों में पूर्ण विधिक साम्यता नहीं थी। शासक की विधिक क्रियायें विशेषाधिकार रखती है। शासक को अपकृत्य विधि के अधीन प्रतिवादी नहीं बनाया जा सकता है। शासक एवं शासित को एक ही तराजू से तौलना ठीक नहीं लगता क्योंकि इन दोनों के वास्तविक भेद इन्हें स्वीकार करने ही होगे।

2. विवेक शक्ति तथा मनमानेपन की शक्ति (Rational Power and Power of Arbitraryness) – डायसी ने अपने सिद्धान्त में विवेकाधीन शक्ति तथा मनमानी करने की शक्ति को एक ही रूप में स्वीकार किया है जबकि विवेकाधिकार वर्तमान शासन-पद्धति के लिए वाँछनीय होता है। विवेकाधिकार को विधि के शासन का विरोधी नहीं माना जा सकता और न ही इसे मनमानी करने की शक्ति ही माना जा सकता है। प्रशासकीय विधि से विवेकाधिकार पर नियंत्रण करने की आवश्यकता होती है। प्रशासनिक विधि विधि-शासन की विरोधी नहीं है। विधि का शासन मनमानी करने को रोकता है तथा प्रशासन की विवेकपूर्ण शक्तियों को मान्यता देता है।

3. ग्रिफिथ एवं स्ट्रीट के विचारानुसार- इनके द्वारा विधि के शासन के निम्नलिखित – भाव बताए गये है-

(i) विधि के शासन का आशय मनमानीपन की शक्ति के विपरीत सामान्य विधि की पूर्ण सर्वोच्चता या वरिष्ठता से है।

(ii) विधि के शासन के अधीन लोग केवल विधि के द्वारा ही शासित होते हैं। किसी भी व्यक्ति को केवल तभी दण्ड दिया जा सकता है जब वह विधि का उल्लंघन करे।

(iii) प्रशासन की शक्तियो के स्रोत अधिनियम है।

(iv) यदि किसी व्यक्ति को विधि के बदलाव के कारण या सामान्य हित में विवेकाधिकार के उपयोग के कारण नुकसान उठाना पडता है तो राज्य उसे क्षतिपूर्ति देगा।

(v) प्रशासन विधि से आबद्ध होता है।

4. आधुनिक संकल्पना (Modern Concept)- वर्तमान कल्याणकारी राज्य में डायसी के मत को पूर्णतया स्वीकार नही किया जा सकता। डेविस ने विधि के शासन के निम्नलिखित अर्थ बताए है –

(i) विवेकाधिकार की व्यवस्था

(ii) निश्चित नियम,

(iii) विवेकाधिकार का विलोपन,

(iv) विधि की सम्यक प्रक्रिया:

(v) प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों का पालन

(vi) कार्यपालक प्राधिकारी एवं प्रशासकीय अधिकरणों की अपेक्षा न्यायाधीशों एवं साधारण न्यायालयों को प्राथमिकता,

(vii) प्रशासकीय कार्यों का न्यायिक पुनर्विलोकन विधि के शासन को परिवर्तनशील अवधारणा माना जाता है। यह एक विधिक आदर्श है। विधि के शासन के अनुसार विधि में निम्नलिखित बातें होनी वाँछित होती हैं।

1. विधियों भविष्योन्मुखी हो।

2. सभी विधियाँ सुलभ एवं स्पष्ट हो ।

3. विधि में उचित स्थिरता होनी चाहिए।

4. विधि में प्राकृतिक न्याय के नियमों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

5. न्यायपालिका एव विधि व्यवसाय की स्वतन्त्रता सुनिश्चित हो।

6. न्यायालय सभी के लिए खुले होने चाहिए।

7. न्यायपालिका प्रशासकीय कार्यों का पुनरीक्षण कर सकती हो।

प्रश्न-11  प्रशासनिक निर्देश तथा प्रत्यायोजित विधान की समालोचनात्मक व्याख्या कीजिए।

उत्तर – अनुदेश का अर्थ (Meaning of Direction) सामान्यतया प्रशासनिक निर्देश अनुदेश वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कनिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन के लिए जारी किये जाते हैं। सामान्यतौर पर सरकार के क्रियाकलापों में प्रशासनिक अनुदेशों का प्रयोग बहुत बड़े पैमाने पर किया जाता है।

       विभिन्न प्रशासनिक अभिकरणों द्वारा निर्देशों को पत्रों, परिपत्रों, आदेशों, ज्ञापनों, लोक सूचनाओं प्रेस नोटों आदि के रूप में जारी किया जाता है। सामान्यतः ये निर्देश न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होते क्योंकि इनका प्रयोग केवल शासन/प्रशासन के आन्तरिक क्रियाकलापों में ही किया जाता है।

     महत्व – प्रशासनिक अनुदेश के कारण ही प्रशासनिक विवेक के प्रयोग में एकरूपता आती है और नये तथा गत्यात्मक क्षेत्र में भी इससे काम निकाला जाता है। इनके कारण प्रशासन में लचीलापन आता है क्योंकि इनके प्रयोग से नियम निर्माण की प्रक्रिया में औपचारिकतायें न्यूनतम हो जाती है। वर्तमान समय में प्रशासन को नित्य नई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ये अनुदेश इन समस्याओं के निराकरण में काफी सहायक होते हैं, जिसके कारण यह आधुनिक प्रशासनिक प्रक्रिया का अभिन्न अंग बन गया है।

अनुदेश के प्रकार (Types of Directions) प्रशासनिक अनुदेश मुख्यतः चार प्रकार के होते है –

1. विनिर्दिष्ट अनुदेश (Specific Direction)

2. सामान्य अनुदेश (Gerenal Direction)

3. निदेशात्मक अनुदेश (Directive Direction) तथा

4. आज्ञापक अनुदेश (Mandatory Direction)

1. विनिर्दिष्ट अनुदेश केवल विशिष्ट मामलों में दिया जाता है जबकि प्रशासनिक अनुदेश का संबंध व्यक्ति विशेष के साथ होता है।

2. साधारण अनुदेश का प्रयोग सामान्य सिद्धान्तो, नीतियों, रीतियों या सामान्य नियमों को लागू करने हेतु किया जाता है।

        सामान्यत प्रशासनिक अनुदेश जारी करने के लिए शक्ति के स्रोत का उल्लेख करना आवश्यक नहीं होता। ये सरकार की साधारण प्रशासनिक शक्ति के अधीन जारी किये जाते हैं। परन्तु कभी-कभी अनुदेश जारी करने के लिए सरकार को कानूनी शक्ति भी प्रदान की जाती है।

3. वे अनुदेश जो किसी कानूनी शक्ति के अधीन जारी नहीं किये जाते निदेशात्मक अनुदेश कहलाते हैं क्योंकि इनमें विधि का बल नही होता। रमन एण्ड रमन बनाम मद्रास राज्य AIR 1959S.C. के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह अवधारित किया है कि मोटरयान आधिनियम 1999 की धारा 43 के अधीन निकाले गये अनुदेशों में विधिक बल नहीं था परन्तु यह कोई आत्यंतिक नियम नहीं है।

4. जो अनुदेश कानूनी शक्ति के अधीन जारी किये जाते हैं और बाध्यकारी प्रकृति के होते हैं, आज्ञापक अनुदेश कहलाते हैं।

      अनुदेशों की प्रवर्तनीयता (Enforceability)- सामान्य नियम तो यही है कि अनुदेश – कानूनी रूप से न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं होते। अतः ऐसे अनुदेशों के उल्लघन के लिए परमादेश रिट जारी नहीं करवायी जा सकती है परन्तु यह कहना भी सही नहीं होगा कि प्रशासनिक अनुदेश काफी प्रवर्तनीय ही नहीं होते। उदाहरण के लिए भारत संघ बनाम के.पी. जोसेफ 1973 S.C. के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णीत किया है कि प्रत्यर्थी के वेतन के निर्धारण के लिए भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी किया गया कार्यालय ज्ञापन प्रवर्तनीय था। अतः इसके प्रवर्तन हेतु परमादेश की रिट जारी की जा सकती है।

      प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation)- प्रत्यायोजित विधान का तात्पर्य उस विधि से है जो विधान मण्डल के अतिरिक्त अन्य अधीनस्थ प्राधिकारियों द्वारा बनाया जाता है। प्रत्यायोजित विधान को कई नामों यथा नियम, विनियम, निदेश, उपविधि, परिनियम, आदेश, अनुदेश स्कीम अधिसूचना प्रपत्र आदि नामों से जाना जाता है। इस प्रकार निर्देश तथा अनुदेश एक प्रकार का प्रत्यायोजित विधान ही है।

        व्यवहार में इनका प्रयोग अत्यंत व्यापक क्षेत्र में किया जाता और कभी-कभी तो ऐसे कार्यों के लिए भी कर लिया जाता है जिसकी अनुमति देने का आशय विधान मण्डल का नहीं होता। प्रत्यायोजित विधान के अत्यधिक विस्तृत क्षेत्र के कारण इस पर नियंत्रण रख पाना मुश्किल होता। है जिसके कारण प्रशासन में स्वेच्छाचारिता और मनमानापन बढ़ जाता है। यह एक नये प्रकार की तानाशही को जन्म देता है जो विधि शासन, शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध है। इसी आधार पर इसकी आलोचना की जाती है। परन्तु आज के समय में यह अपरिहार्य है. इसका कोई विकल्प नहीं है। अतः एक आवश्यक बुराई के रूप में इसे स्वीकार किया जाता है।

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