LLB Notes Hindi - Law Study Material (Sem Wise)

BNS (भारतीय न्याय संहिता ) Part 11

बीएनएस धारा 308 क्या है |

BNS Section 308

       आज के समय में जबरन वसूली एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। यह एक ऐसा अपराध है जिसमें कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को डरा धमकाकर या बल प्रयोग करके उससे धन या संपत्ति हासिल करने का प्रयास करता है। यह अपराध न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाता है बल्कि पीड़ित के मानसिक स्वास्थ्य को भी गंभीर रूप से प्रभावित करता है। चाहे वह व्यापारी हों, छात्र हों या आम नागरिक कोई भी इस अपराध का शिकार हो सकता है। इस आर्टिकल के द्वारा हम जबरन वसूली के अपराध की धारा को जानेंगे, कि बीएनएस की धारा 308 में जबरन वसूली क्या है (BNS Section 308)? धारा 308 कब व कैसे लागू होती है – जमानत और सज़ा?

       किसी की मेहनत की कमाई को डरा-धमका कर छिन लेना बहुत ही गंभीर अपराध है पहले, इस तरह के मामलों में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 383 से 389 का इस्तेमाल होता था। लेकिन अब, नए कानून भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के आने के बाद, इन मामलों में धारा 308 लगाई जाने लगी है।

       नई धारा 308, जबरन वसूली को और गंभीर अपराध मानती है और इसमें सख्त सजा का प्रावधान है। यह लेख आपको इस अपराध के बारे में संपूर्ण जानकारी देगा जिससे आपको जबरन वसूली के अपराधों के पूरी कानूनी कार्यवाही की समझ हो जाएगी।

बीएनएस की धारा 308 क्या है कब लगती है – BNS Section 308 

      भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308 जबरन वसूली (Extortion) से संबंधित है। इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को डराने-धमकाने की कोशिश करता है ताकि वह उससे संपत्ति या कोई कीमती चीज़ जबरदस्ती हासिल कर सके, तो यह एक अपराध माना जाएगा।

       धारा 308 में जबरन वसूली को कई तरह के गंभीर तरीकों के आधार पर इसकी 7 उपधाराओं द्वारा बताया गया है, आइये इन सभी उपधाराओं को आसान भाषा में जानते है:-

  1. बीएनएस धारा 308 (1):- “जबरन वसूली” एक ऐसा अपराध है जिसमें कोई व्यक्ति जानबूझकर (Intentionally) किसी दूसरे व्यक्ति को डराकर या धमका कर उसे कुछ देने के लिए मजबूर करता है। इस डर के चलते, पीड़ित व्यक्ति अपनी संपत्ति, पैसे, या किसी महत्वपूर्ण दस्तावेज (Important Documents) को दे देता है।
  2. बीएनएस धारा 308 (2):- अगर कोई व्यक्ति जबरन वसूली (Extortion) करता है, यानी किसी को डराकर या धमकाकर उसकी संपत्ति, पैसे, या महत्वपूर्ण दस्तावेज लेता है, तो उस व्यक्ति को दोषी पाये जाने पर धारा 308(2) के तहत सजा दी जाती है।
  3. बीएनएस सेक्शन 308 (3): अगर कोई व्यक्ति जबरन वसूली करने के लिए किसी को डराता (Scares) है या उसे किसी तरह की चोट (Injury) पहुँचाने के डर में डालता है, तो उस पर धारा 308(3) लागू की जाती है। उदाहरण:- अगर कोई व्यक्ति किसी को चोट पहुंचाने की धमकी (Threat) देता है ताकि वह अपनी कीमती चीजें दे दे, तो उसे इस अपराध के तहत सजा मिल सकती है।
  4. बीएनएस सेक्शन 308 (4):- अगर कोई व्यक्ति जबरन वसूली के लिए किसी को मौत या गंभीर चोट (Death Or Serious Injury) का डर दिखाता है या ऐसा करने का प्रयास करता है, तो उसे सेक्शन 308(4) के तहत सजा मिल सकती है।
  5. बीएनएस सेक्शन 308 (5):- जब कोई व्यक्ति किसी को मौत या गंभीर चोट का डर दिखाकर जबरन वसूली करता है, तो इसे उस व्यक्ति को इस उपधारा (Sub-Section) के तहत दंडित किया जाएगा।
  6. बीएनएस सेक्शन 308 (6):- अगर कोई व्यक्ति जबरन वसूली के लिए किसी को डराता है और कहता है कि वह उस पर या किसी और पर गंभीर अपराध करने का आरोप (Blame) लगाएगा, जैसे कि हत्या या आजीवन कारावास की सजा वाले अपराधों के आरोप। ऐसे व्यक्ति पर धारा 308(6) लागू कर कार्यवाही की जाती है।
  7. बीएनएस सेक्शन 308 (7):- जब कोई व्यक्ति धमकाता है कि वह तुम्हें या किसी और को गंभीर अपराध का आरोपी बना देगा, या किसी को ऐसा अपराध करने के लिए उकसाएगा तो उस पर सेक्शन 308(7) के तहत कार्यवाही की जाती है।
जबरन वसूली की धारा के आवश्यक तत्व क्या हैं?
  • डराना: अपराधी जानबूझकर पीड़ित (Victim) को डराता है, जैसे उसे मारने की धमकी देना, या उसके परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना।
  • पैसे या चीज़ लेना: अपराधी का मुख्य काम पीड़ित से पैसे या कोई कीमती चीज़ लेना होता है।
  • गलत तरीके से दबाव डालना: अपराधी पीड़ित पर गलत तरीके से दबाव डालता है, जैसे उसे बदनाम करने की धमकी देना या उसके बारे में झूठी बातें फैलाने की धमकी देना।
  • मजबूरी में देना: इस अपराध के चलते पीड़ित डर के मारे पैसे या कोई संपत्ति देता है।
जबरन वसूली (Extortion)​ के अपराध का उदाहरण

       एक छोटे से शहर में प्रीतम नाम का एक दुकानदार अपनी दुकान चलाता था। उसकी दुकान काफी लोकप्रिय थी और उसमें हर रोज बहुत से ग्राहक आते थे। एक दिन वह रात के समय जब अपनी दुकान को बंद कर रहा था, तो उसके पास अचानक से सुमित नाम का एक बदमाश आ जाता है। सुमित ने प्रीतम को धमकाते हुए कहा, “अगर तुमने मुझे 50,000 रुपये नहीं दिए तो मैं तुम्हारी दुकान में तोड़फोड़ कर दूंगा और तुम्हें जान से मार दूंगा।”

       प्रीतम बहुत डर गया और उसने श्याम को 50,000 रुपये दे दिए। यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे सुमित ने प्रीतम को डराकर उससे पैसे लिए। इस मामले में सुमित ने धारा 308 के तहत जबरन वसूली का अपराध किया है क्योंकि उसने प्रीतम को डराकर उससे पैसे लिए हैं।

कुछ कार्य जिनको करना BNS 308 का अपराधी बना सकता है
  • पैसे या अन्य किसी वस्तु की माँग के लिए किसी व्यक्ति को शारीरिक नुकसान (Physically Harm) पहुंचाने या उसकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना।
  • जबरन वसूली करने के ले किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने या उसे बदनाम करने की धमकी देना।
  • जबरदस्ती पैसों की मांग के साथ किसी व्यक्ति को जान से मारने की धमकी देना।
  • पैसा या कोई वस्तु ना देने पर किसी व्यक्ति को किसी अपराध में फंसाने की धमकी देना।
  • किसी व्यक्ति के परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना।
बीएनएस की धारा 308 की सभी उपधाराओं की सजा

       भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 308 में जबरन वसूली के अपराध की सजा को इसकी 7 उपधाराओं (Sub-Sections) में विस्तार से अपराध की गंभीरता के आधार पर बाँटा गया है जो कि इस प्रकार है:-

  • उपधारा 308 (2) की सजा:- इसके अनुसार बताया गया है कि जो भी व्यक्ति जबरन वसूली के अपराध को करने का दोषी (Guilty) पाया जाएगा। उसे न्यायालय द्वारा धारा 308(2) के तहत 7 वर्ष की कारावास व जुर्माने की सजा दी जा सकती है।
  • उपधारा 308 (3) की सजा:- अगर कोई व्यक्ति जबरन वसूली के लिए किसी को डराने या चोट पहुँचाने का डर दिखाने का दोषी पाया जाएगा। उस पर 2 वर्ष तक की जेल व जुर्माना (Fine) लगाया जा सकता है।
  • उपधारा 308 (4) की सजा:- जब कोई व्यक्ति जबरन वसूली करने के लिए गंभीर चोट पहुँचाने का डर दिखाने के अपराध का दोषी होगा। उसे उसके किए गए अपराध के लिए 7 वर्ष तक की जेल व जुर्माने की सजा (Punishment) दी जा सकती है।
  • उपधारा 308 (5) की सजा:- जो भी व्यक्ति जबरन वसूली के लिए मौत का डर बनाकर इस अपराध को करने का दोषी होगा उसे 10 वर्ष की जेल व जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
  • उपधारा 308 (6) व 308 (7) की सजा:- अगर कोई व्यक्ति जबरन वसूली करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति को किसी गंभीर अपराध में फंसाने की धमकी देने का या किसी को उकसाने का अपराध करता है। तो उस पर 10 वर्ष की कारावास (Imprisonment) की सजा व जुर्माना लगाकर दंडित (Punished) किया जा सकता है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308 में जमानत कब व कैसे मिलती है

       बीएनएस सेक्शन 308 के अंतर्गत आने वाला जबरन वसूली का यह अपराध संज्ञेय (Cognizable) होता है। संज्ञेय अपराध में पुलिस आरोपी की गिरफ्तारी के लिए जल्द से जल्द कार्यवाही कर सकती है। इस धारा में जमानत (Bail) का फैसला अपराध की गंभीरता के आधार पर ही लिया जा सकता है, यदि आरोपी ने ज्यादा गंभीर अपराध किया है तो जमानत मिलना मुश्किल हो सकता है। इस धारा के अंतर्गत अपराध की सुनवाई किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा की जा सकती है।

निष्कर्ष:- BNS Section 308 एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान है जो समाज में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए आवश्यक है। यह धारा उन लोगों को दंडित करती है जो दूसरों को डरा धमकाकर या बल प्रयोग करके उनसे धन या संपत्ति हासिल करने का प्रयास करते हैं।

बीएनएस धारा 309 क्या है |

BNS Section 309

       लूट-पाट जैसी घटनाओं के कारण किसी भी व्यक्ति को अपनी कीमती वस्तु को खोना पड़ सकता है। अकसर देखा जाता है कि कोई महिला रोड पर जा रही होती है, कि अचानक से कोई व्यक्ति आता है और उससे उसके गहने छिन के भाग जाता है। ऐसे अपराध कभी-भी किसी के साथ भी हो सकते है। ऐसे अपराध का शिकार (Victim) होने पर तुरन्त कार्यवाही कर अपनी कीमती वस्तु जल्द से जल्द प्राप्त करने के लिए कानूनी जानकारी होना बहुत जरुरी है। इसलिए आज हम इसी तरह के मामलों से निपटने वाले एक बहुत ही आवश्यक कानून के बारे में आपको बताएंगे की बीएनएस की धारा 309 क्या है यह कब लागू होती है?, BNS Section 309 के तहत लूट के अपराध की सजा क्या हैबीएनएस सेक्शन 309 जमानती है या गैर-जमानती?

         लूट (Robbery) के अपराध के दौरान कुछ मामले ऐसे भी देखे जाते है, जिनमें अपराध करने वाला व्यक्ति ना सिर्फ किसी कीमती वस्तु को छीन (Snatch) ले जाता है। बल्कि इस घटना के शिकार व्यक्ति को चोट पहुँचाकर भी भाग जाता है। ऐसे मामलों में पहले भारतीय दंड संहिता की धारा (IPC) 390 के तहत कार्यवाही की जाती थी। लेकिन नए कानून लागू होने के बाद से इसे भारतीय न्याय संहिता की धारा (BNS) 309 से बदल दिया गया है। इसलिए यदि आप कभी भी इस प्रकार के अपराधों का शिकार हुए हैं, तो बीएनएस की धारा 309 आपको अपने अधिकारों के बारे में जानकारी प्रदान करेगी।

बीएनएस की धारा 309 क्या है – BNS Section 309 

        भारतीय न्याय संहिता की धारा 309 लूट (Robbery) को एक ऐसी चोरी (Theft) के रूप में परिभाषित करती है जिसमें बल या धमकी (Force or Threat) जैसी बातें शामिल होती है। इसमें बताया गया है कि जब कोई व्यक्ति चोरी करने या किसी संपत्ति को छिनने के लिए धमकी या हिंसा का प्रयोग करता है तो वह लूट कहलाती है।

इसमें लूट को दो प्रकार से बताया गया है जो की इस प्रकार है:-

  1. लूट में चोरी या जबरन वसूली (Extortion) शामिल है:- इसमें चोरी (अनुमति के बिना संपत्ति लेना) या जबरन वसूली का प्रयास (किसी को संपत्ति देने की धमकी देना) होना चाहिए।
  2. हिंसा या हिंसा की धमकी:- चोरी या जबरन वसूली के साथ हिंसा (चोट पहुंचाना) या तत्काल हिंसा (Immediate Violence) की धमकी, गलत तरीके से रोकना (किसी की आवाजाही को प्रतिबंधित करना), या मौत होना शामिल है।

उदाहरण:- यदि कोई व्यक्ति सड़क पर आपका बैग छीन लेता है और आपको अपना बटुआ न देने पर चोट पहुंचाने की धमकी देता है। चोरी (बैग लेना) और हिंसा की धमकी (आपको चोट पहुंचाना) के कारण इसे बीएनएस की धारा 309 के अंतर्गत लूट माना जाएगा।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 309 की मुख्य बातें:-
  • जो कोई किसी व्यक्ति से हिंसा या डराने-धमका कर उसकी संपत्ति छीन लेता है, वह लूट का अपराधी होगा।
  • हिंसा में मारपीट, धक्का-मुक्की, हथियार दिखाना या किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी शामिल है।
  • डराने-धमकाने में पीड़ित (Victim) को डराना, उसके सम्मान को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना या उसके परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना शामिल है।
BNS Section 309 कब लागू नहीं होती – कुछ अपवाद
  1. यदि कोई व्यक्ति रक्षा (Defence) के लिए या अपनी संपत्ति (Property) को बचाने के लिए बल (Force) प्रयोग करता है, तो उसे लूट का दोषी नहीं ठहराया जाएगा।
  2. यदि कोई व्यक्ति गलतफहमी के कारण किसी की संपत्ति छीन लेता है, तो उसे लूट का दोषी नहीं ठहराया जाएगा।
  3. यदि चोरी हिंसा, धमकी, पीड़ित को रोकने या तत्काल नुकसान का डर पैदा किए बिना होती है, तो यह केवल चोरी है, लूट नहीं।
  4. साधारण भाषा में कहे तो बिना किसी धमकी के कुछ चुराना BNS 309 के तहत लूट नहीं माना जाता।
BNS की धारा 309 के तहत लूट का उदाहरण

       कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति राजेश रात के समय एक सुनसान सड़क पर चल रहा है। तभी एक सुभाष नाम का व्यक्ति चाकू दिखाकर राजेश को धमकाता है और कहता है, अगर तुमने अपना मोबाइल और पैसे नहीं दिए, तो मैं तुम्हें चाकू मार दूंगा। डर के मारे राजेश अपना मोबाइल और पैसे सुभाष को दे देता है।

       इस उदाहरण में, सुभाष ने राजेश को धमकाने और बल का उपयोग करके उसके सामान को छीन लिया। यह घटना BNS Section 309 के तहत लूट की श्रेणी में आती है, क्योंकि इसमें चोरी के साथ-साथ बल और भय (Fear) का भी उपयोग किया गया है।

बीएनएस 309 में लूट की सजा – BNS Section 309 Punishment 

       भारतीय न्याय संहिता की धारा 309 में लूट की सजा को अलग-अलग प्रकार से मामले की गंभीरता व स्थिति के आधार पर बताया गया है। आइये जानते विस्तार से जानते है:-

लूट करने का प्रयास: यदि कोई व्यक्ति लूट करने का प्रयास (Attempt) करता है, लेकिन असफल हो जाता है, तो उसे सात वर्ष तक के कठोर कारावास की सज़ा (Punishment) दी जा सकती है और जुर्माना भी देना होगा।

लूट पूरी हो जाने पर:- जब किसी व्यक्ति के साथ लूट का अपराध सफल हो जाता है तो सज़ा अधिक कठोर होती है। जिसमें दोषी (Guilty) पाये जाने पर अपराधी को दस वर्ष तक के कठोर कारावास (Imprisonment) की सज़ा दी जा सकती है और जुर्माना भी देना होगा। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इसमें सज़ा की गंभीरता और भी बढ़ सकती है।

राजमार्ग पर लूट (सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच): इस मामले में कारावास की अवधि चौदह वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है। यह रात के समय सुनसान राजमार्गों (Highways) पर होने वाली लूट-पाट की घटनाओं पर लागू होती है।

चोट पहुँचाने के साथ लूट:- यदि अपराधी घटना के दौरान शारीरिक चोट पहुँचाता है, तो सज़ा और भी कठोर हो जाती है। यहाँ अपराधी और उसके किसी भी साथी को या तो आजीवन कारावास (Life Imprisonment) या दस साल तक की कठोर कारावास की सज़ा दी जा सकती है, साथ ही जुर्माना (Fine) भी लगाया जा सकता है।

BNS Section 309 में जमानत कब व कैसे मिलती है

      भारतीय न्याय संहिता की धारा 309 के अनुसार लूट एक संज्ञेय अपराध (Cognizable offence) होता है, यानी ऐसे अपराध जो ज्यादा गंभीर होते है। लूट-पाट जैसे मामले की गंभीरता को देखते हुए ही इसे गैर-जमानती (Non-Bailable) रखा गया है। जिसका मतलब है कि आरोपी (Accused) को जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता है। हालांकि, कुछ हालातों में जमानत दी जा सकती है जैसे:-

  • यदि आरोपी नाबालिग (Minor) है।
  • यदि अपराध कम गंभीर है।
  • यदि आरोपी के खिलाफ सबूत (Evidence) कमजोर हैं।

बीएनएस धारा 310 क्या है |

BNS Section 310

डकैती

(1) जब पांच या अधिक व्यक्ति मिलकर डकैती करते हैं या करने का प्रयास करते हैं, या जहां डकैती करने या करने का प्रयास करने वाले व्यक्तियों की पूरी संख्या, और ऐसे कार्य में उपस्थित और सहायता करने वाले व्यक्तियों की संख्या पांच या अधिक होती है , ऐसा करने, प्रयास करने या सहायता करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को “डकैती” करने वाला कहा जाता है।

(2) जो कोई भी डकैती करेगा, उसे आजीवन कारावास या दस साल तक के कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

(3) यदि पांच या अधिक व्यक्तियों में से कोई एक, जो मिलकर डकैती कर रहे हैं, डकैती करते समय हत्या कर देता है, तो उन व्यक्तियों में से प्रत्येक को मौत की सजा दी जाएगी, या आजीवन कारावास, या एक अवधि के लिए कठोर कारावास की सजा दी जाएगी। दस वर्ष से कम, और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

(4) जो कोई भी डकैती करने की तैयारी करेगा, उसे कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे दस साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

(5) जो कोई भी डकैती करने के उद्देश्य से इकट्ठे हुए पांच या अधिक व्यक्तियों में से एक है, उसे कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

(6) जो कोई भी आदतन डकैती करने के उद्देश्य से जुड़े व्यक्तियों के गिरोह से संबंधित है, उसे आजीवन कारावास या कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे दस साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

बीएनएस धारा 311 क्या है |

BNS Section 311

लूट या डकैती, मौत या गंभीर चोट पहुंचाने के प्रयास के साथ

यदि लूट या डकैती करते समय अपराधी किसी घातक हथियार का उपयोग करता है, या किसी व्यक्ति को गंभीर चोट पहुंचाता है, या किसी व्यक्ति को मौत या गंभीर चोट पहुंचाने का प्रयास करता है, तो ऐसे अपराधी को कारावास की सजा दी जाएगी। सात वर्ष से कम न हो.

बीएनएस धारा 312 क्या है |

BNS Section 312

घातक हथियार से लैस होकर डकैती या डकैती करने का प्रयास

      यदि लूट या डकैती करने का प्रयास करते समय अपराधी किसी घातक हथियार से लैस है, तो ऐसे अपराधी को कारावास की सजा सात साल से कम नहीं होगी।

बीएनएस धारा 313 क्या है |

BNS Section 313

लुटेरों, डकैतों, आदि के गिरोह से संबंधित होने के लिए सजा

जो कोई भी आदतन चोरी या डकैती करने वाले व्यक्तियों के गिरोह से संबंधित है, और डकैतों का गिरोह नहीं है, उसे कठोर कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

बीएनएस धारा 314 क्या है |

BNS Section 314

संपत्ति का बेईमानी से दुरुपयोग

      जो कोई किसी चल संपत्ति का बेईमानी से दुरुपयोग करेगा या अपने उपयोग के लिए परिवर्तित करेगा, उसे किसी भी अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी जो छह महीने से कम नहीं होगी लेकिन जिसे दो साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जाएगा।

रेखांकन

(ए) ए, ज़ेड की संपत्ति को ज़ेड के कब्जे से बाहर ले जाता है, अच्छे विश्वास के साथ उस समय विश्वास करता है जब वह इसे लेता है, कि संपत्ति उसकी है। ए चोरी का दोषी नहीं है; लेकिन यदि ए, अपनी गलती का पता चलने के बाद, बेईमानी से संपत्ति को अपने उपयोग के लिए विनियोजित करता है, तो वह इस धारा के तहत अपराध का दोषी है।

(बी) ए, ज़ेड के साथ मैत्रीपूर्ण शर्तों पर होने के कारण, ज़ेड की अनुपस्थिति में ज़ेड की लाइब्रेरी में जाता है, और ज़ेड की स्पष्ट सहमति के बिना एक किताब ले जाता है। यहां, यदि ए इस धारणा के तहत था कि उसे पढ़ने के उद्देश्य से पुस्तक लेने के लिए जेड की निहित सहमति थी, तो ए ने चोरी नहीं की है। लेकिन, यदि A बाद में अपने फायदे के लिए किताब बेचता है, तो वह इस धारा के तहत अपराध का दोषी है।

(सी) ए और बी, एक घोड़े के संयुक्त मालिक हैं। ए घोड़े को इस्तेमाल करने के इरादे से बी के कब्जे से निकाल लेता है। यहां, चूंकि ए को घोड़े का उपयोग करने का अधिकार है, इसलिए वह बेईमानी से इसका दुरुपयोग नहीं करता है। लेकिन, यदि ए घोड़ा बेचता है और पूरी आय अपने उपयोग के लिए विनियोजित करता है, तो वह इस धारा के तहत अपराध का दोषी है।

स्पष्टीकरण 1.—केवल एक समय के लिए बेईमानीपूर्ण दुरुपयोग इस धारा के अर्थ के अंतर्गत एक दुरुपयोग है।

रेखांकन

A को Z से संबंधित एक सरकारी वचन पत्र मिलता है, जिस पर रिक्त पृष्ठांकन अंकित है। ए, यह जानते हुए कि नोट ज़ेड का है, इसे ऋण के लिए सुरक्षा के रूप में एक बैंकर के पास गिरवी रखता है, भविष्य में इसे ज़ेड को वापस करने का इरादा रखता है। ए ने इस धारा के तहत अपराध किया है।

स्पष्टीकरण 2.—एक व्यक्ति जो पाता है कि संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति के कब्जे में नहीं है, और ऐसी संपत्ति को उसकी सुरक्षा के लिए, या मालिक को वापस लौटाने के उद्देश्य से लेता है, तो वह इसे बेईमानी से नहीं लेता है या उसका दुरुपयोग नहीं करता है, और नहीं है किसी अपराध का दोषी; लेकिन वह ऊपर परिभाषित अपराध का दोषी है, यदि वह इसे अपने उपयोग के लिए उपयुक्त बनाता है, जब वह जानता है या उसके पास मालिक की खोज करने के साधन हैं, या इससे पहले कि उसने मालिक की खोज करने और उसे नोटिस देने के लिए उचित साधनों का उपयोग किया हो और उसे अपने पास रखा हो। संपत्ति के मालिक को उस पर दावा करने में सक्षम बनाने के लिए उचित समय दिया जाना चाहिए। ऐसे मामले में उचित साधन क्या हैं या उचित समय क्या है, यह तथ्य का प्रश्न है। यह आवश्यक नहीं है कि खोजने वाले को पता हो कि संपत्ति का मालिक कौन है, या कोई विशेष व्यक्ति इसका मालिक है; यह पर्याप्त है यदि, इसे विनियोजित करते समय, वह यह नहीं मानता कि यह उसकी अपनी संपत्ति है, या सद्भावपूर्वक विश्वास करता है कि वास्तविक मालिक नहीं पाया जा सकता है।

रेखांकन

(ए) ए को ऊंची सड़क पर एक रुपया मिलता है, यह न जानते हुए कि वह रुपया किसका है, ए रुपया उठा लेता है। यहां A ने इस धारा में परिभाषित अपराध नहीं किया है।

(बी) ए को सड़क पर एक पत्र मिलता है, जिसमें एक बैंक नोट है। पत्र की दिशा और विषय-वस्तु से वह जान लेता है कि नोट किसका है। वह नोट को विनियोजित करता है। वह इस धारा के तहत अपराध का दोषी है।

(सी) ए को धारक को देय एक चेक मिलता है। वह उस व्यक्ति के बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकता जिसने चेक खो दिया है। लेकिन उस व्यक्ति का नाम सामने आ जाता है, जिसने चेक काटा है. ए जानता है कि यह व्यक्ति उसे उस व्यक्ति के पास भेज सकता है जिसके पक्ष में चेक काटा गया था। ए मालिक का पता लगाने का प्रयास किए बिना चेक का विनियोजन करता है। वह इस धारा के तहत अपराध का दोषी है।

(डी) ए ने देखा कि जेड ने अपना पैसों वाला पर्स गिरा दिया है। क उस पर्स को ज़ेड को लौटाने के इरादे से उठाता है, लेकिन बाद में उसे अपने उपयोग के लिए उपयोग कर लेता है। ए ने इस धारा के तहत अपराध किया है।

(ङ) क को पैसों से भरा एक पर्स मिलता है, बिना यह जाने कि यह किसका है; बाद में उसे पता चलता है कि यह Z का है, और वह इसे अपने उपयोग के लिए उपयुक्त बना लेता है। ए इस धारा के तहत अपराध का दोषी है।

(एफ) ए को एक मूल्यवान अंगूठी मिलती है, यह नहीं पता कि यह किसकी है। ए मालिक का पता लगाने का प्रयास किए बिना इसे तुरंत बेच देता है। ए इस धारा के तहत अपराध का दोषी है।

बीएनएस धारा 315 क्या है |

BNS Section 315

      आजकल धोखाधड़ी व बेईमानी से जुड़े अपराध देश में दिन-प्रतिदिन फैलते जा रहे है, ये ऐसे अपराध होते है जो हमारे पीठ पीछे हमारे ही भरोसेमंद लोगों के द्वारा किए जाते है। उन्हीं में से एक अपराध ऐसा भी है जो किसी इंसान की मृत्यु होने के बाद किया जाता है। जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो कुछ व्यक्ति उस दुखद समय का फायदा उठाकर बेईमानी से उसकी संपत्ति पर कब्जा कर लेते है। ऐसे में जब तक उस मृत व्यक्ति के परिवार को पता चलता है, तो बहुत देर हो चूकी होती है। लेकिन सही समय पर की गई कार्यवाही इस अपराध से आप सभी को बचा सकती है। इसलिए आज इसी महत्वपूर्ण विषय से जुडी धारा के बारे में आपको बताएंगे की, बीएनएस धारा 315 क्या है (BNS Section 315)? इस सजा क्या है? धारा 315 जमानती है या गैर-जमानती है?

        किसी मरे हुए इंसान की संपत्ति पर बेईमानी से कब्जा करने के अपराध में पहले आईपीसी 404 के तहत कार्यवाही की जाती थी। लेकिन BNS के नए कानून के रुप में लागू होने के बाद से ऐसे अपराधों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 315 के तहत कार्यवाही की जाएगी। कोई भी कानूनी छात्र हो या नौकरी करने वाला कर्मचारी, देश के हर नागरिकों के लिए आज के आपराधिक मामले से जुड़ी जानकारी होना बहुत ही आवश्यक है। साथ ही जिन लोगों पर इस अपराध के आरोप लगे है, उन्हें भी जमानत से लेकर बचाव उपायों की जानकारी यहाँ मिलेगी।

बीएनएस धारा 315 क्या है और यह कब लागू होती है – BNS 315 

         भारतीय न्याय संहिता की धारा 315 किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति को बेईमानी से लेने या उसका उपयोग करने के अपराध से संबंधित है, यह धारा उन व्यक्तियों को दंडित करती है जो किसी भी मरे हुए व्यक्ति की मृत्यु के समय उसके कब्जे में रही संपत्ति का बेईमानी से दुरुपयोग करते हैं या उस संपत्ति में खुद के इस्तेमाल के लिए बदलाव कर देते है।

         सरल भाषा में कहे तो जो भी व्यक्ति किसी मृत व्यक्ति (Dead Person) की मृत्यु के समय मौजूद किसी भी वस्तु पर धोखे से या बेईमानी से कब्जा करता है, जिस पर उसका कोई कानूनी अधिकार नहीं है। जैसे:- घर, गाड़ी, पैसे, व अन्य कीमती वस्तु। ऐसे व्यक्तियों पर बीएनएस की धारा 315 के तहत कार्यवाही की जाती है।

इस धारा के अपराध से जुड़े मुख्य बिंदु

  • धारा 315 केवल उसी संपत्ति (Property) पर लागू होती है जो मृतक के पास मृत्यु के समय थी।
  • जब कोई व्यक्ति जानबूझकर और बेईमानी से मृत व्यक्ति की संपत्ति को अपने कब्जे में लेता है, भले ही वह उस संपत्ति का कानूनी उत्तराधिकारी (Legal heir) न हो।
  • जब कोई व्यक्ति मृत व्यक्ति की संपत्ति को बेच देता है, नष्ट कर देता है, या उसका गैरकानूनी रूप से उपयोग करता है, भले ही उसने उसे अपने कब्जे में न लिया हो।
  • जब कोई व्यक्ति मृत व्यक्ति के परिवार के सदस्यों या कानूनी उत्तराधिकारियों को उनकी संपत्ति से वंचित (Deprived) करता है।
  • आरोपी को यह जानना होगा कि वह मृतक की संपत्ति का गबन कर रहा है।
  • गलती से या अनजाने में संपत्ति का उपयोग करना अपराध नहीं होगा।
  • यदि कोई व्यक्ति इन नियमों का उल्लंघन करता है तो उन्हें सजा दी जाती है।
बीएनएस 315 का आपराधिक उदाहरण:-

         एक बार अजय और विजय नाम के दो भाई थे। उनके पिता का कुछ ही समय पर निधन हो गया था। पिता की मृत्यु के कुछ दिनों बाद, अजय को पता चला कि उनके पिताजी ने बैंक में 50 लाख रुपये जमा कराए थे। अजय को यह बात पता चलने पर लालच आ गया और उसने यह बात अपने भाई विजय को नहीं बताई और सारा पैसा धोखे से पर निकाल लिया। कुछ समय बाद विजय को जब अपने पिताजी की बैंक की पासबुक मिली तब उसने देखा कि खाते में कोई पैसा नहीं है।

         जिसके बाद उसे अजय पर शक हुआ और उसने अजय से पूछताछ की पहले, तो अजय ने झूठ बोल दिया की उसने पैसे नहीं निकाले। लेकिन बाद में उसने बता दिया कि हाँ पैसे मैने ही निकाले है, और वो पैसे में किसी को नहीं दूंगा। जिसके बाद दोनों में बहुत बहस हुई लेकिन अजय पैसे देने के लिए नहीं माना, जब्कि सारी संपत्ति व पैसो का उत्तराधिकारी विजय को ही बनाया गया था। इसके बाद विजय बहुत गुस्सा हो जाता है और अजय कि शिकायत पुलिस में दर्ज करा देता है। जिसके बाद पुलिस द्वारा अजय पर BNS Section 315 के तहत मामला दर्ज कर लिया जाता है।

BNS 315 के तहत अपराध माने जाने वाले कुछ कार्य:-
  • किसी भी मरे हुए इंसान की किसी भी प्रकार की संपत्ति को बेईमानी से अपने कब्जे में कर लेना। जैसे:- घर, गाड़ी, पैसा, आदि।
  • मरे हुए व्यक्ति की संपत्ति को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना, उसमें बदलाव करना या उसे किसी अन्य व्यक्ति को बेच देना।
  • आपके पास किसी व्यक्ति की संपत्ति का कोई अधिकार नहीं है फिर भी आप उस पर अपना हक दिखाने लग जाए।
  • मृतक व्यक्ति के घर वालों या उसकी संपत्ति के असली हकदार व्यक्ति को डराना धमकाना।
  • धोखे से झूठे दस्तावेज (Fake Documents) बनवाकर किसी और की संपत्ति को अपनी बताना।
  • किसी नौकर या कर्मचारी के द्वारा मालिक के विश्वास का फायदा उठाकर बेईमानी करना।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 315 के अपराध की सजा

       बीएनएस धारा 315 के तहत किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति को धोखे से हासिल करने वाले दोषी व्यक्ति (Guilty person) को तीन साल तक की कारावास व जुर्माना, या दोनों से दंडित (Punished) किया जा सकता है। यदि अपराध करने वाला व्यक्ति मृतक का नौकर या सेवक था तो ऐसे मामले में सजा और भी गंभीर दी जाती है। जिसमें सात साल तक की कारावास व जुर्माने की सजा से दंडित किया जा सकता है। सज़ा की गंभीरता गबन की गई संपत्ति के मूल्य पर भी निर्भर हो सकती है।

सजा की गंभीरता कुछ विशेष बातों पर निर्भर करती हैजो कि इस प्रकार हैं:-

  • गबन की गई संपत्ति के मूल्य के आधार पर।
  • अपराधी का इरादा।
  • अपराधी का आपराधिक इतिहास।
  • ​किए गए अपराध के कारण पीड़ित (Victim) का कितना नुकसान हुआ।
बीएनएस​ सेक्शन 315 में जमानत कब और कैसे मिलती है

        बीएनएस की धारा 315 एक जमानती अपराध होता है, जिसे गैर-संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब है कि न्यायालय द्वारा इस अपराध के आरोपी व्यक्ति को जमानत दी जा सकती है। लेकिन जब भी आरोपी जमानत के लिए आवेदन करता है, तो जमानत से पहले कुछ बातों को न्यायालय द्वारा देखा जाता है। जिसके कारण आपकी जमानत को रद्द भी किया जा सकता है।

आइये जानते है उन जरुरी बातों के बारे में :-

  • यदि चोरी की गई संपत्ति का मूल्य अधिक है, तो जमानत मिलना कठिन हो सकता है।
  • यदि आरोपी ने पहले भी बहुत सारे अपराध किए है, तो जमानत मिलने की संभावना कम हो सकती है।
  • यदि आरोपी व्यक्ति की देश छोड़ कर भागने की संभावना है, तो जमानत अस्वीकार की जा सकती है।
BNS Section 315 के तहत लगे आरोप के खिलाफ बचाव कैसे करें

       बीएनएस की धारा 315 के तहत आरोपी व्यक्ति अपने बचाव के लिए कुछ जरुरी उपायों का इस्तेमाल कर सकता है, इसलिए आप सभी का इन बचाव उपायों के बारे में समझना बहुत जरुरी है। जो कि इस प्रकार है:-

       यदि आपको असल में यह लगता था कि आपका उस संपत्ति पर कानूनी अधिकार था, तो यह साबित करता है कि आपने बेईमानी नहीं की। उदाहरण:- यदि आपको गलती से मृतक का वारिस (Heir) समझा गया था और आपने संपत्ति को उसी विश्वास में आकर अपना मान लिया था। तब यह आपके बचाव के रुप में काम आ सकता है।

        यदि आपने गलती से सोचा कि जो संपत्ति आपने ली है वो मरने वाले की नहीं बल्कि किसी और व्यक्ति की है। यदि संपत्ति के असली मालिक ने आपको इसे लेने की सहमति दी थी, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता और इससे आपका बचाव हो सकता है। उदाहरण:- यदि मृतक के पति या पत्नी ने आपको उनकी संपत्ति का कुछ हिस्सा रखने की अनुमति दी थी। यदि आपने संपत्ति को केवल उस संपत्ति की सुरक्षा के लिए कुछ समय के लिए अपने पास रखा था, जब तक कि वह असली मालिक तक न पहुंच जाए, तो इसमें भी आप का बचाव हो सकता है। लेकिन इसमें आपको यह साबित करना होगा कि आपका इरादा असल में अच्छा था।

निष्कर्ष :- बीएनएस सेक्शन 315 मरे हुए लोगों की संपत्ति को गलत लोगों के हाथ में जाने से रोकने के लिए बहुत अहम कार्य करती है। जिसके द्वारा पीड़ित परिवारों को उनका हक मिलता है और दोषी व्यक्तियों को सजा। अगर आप भी ऐसे किसी मामले से जुड़ी कानूनी सहायता प्राप्त करना चाहते है तो हमारे वकीलों से परामर्श कर सकते है।

बीएनएस धारा 316 क्या है |

BNS Section 316

          आज के समय में विश्वासघात जैसे अपराधों के मामले बहुत ही तेजी से बढ़ रहे हैं। जब भी किसी व्यक्ति को अपना मानकर उसे कोई वस्तु या संपत्ति संभालने दी जाती है। लेकिन वो व्यक्ति उस संपत्ति का जब दुरुपयोग करता है, या बेईमानी करता है तो ऐसा करना एक अपराध माना जा सकता है। ऐसे अपराधों के बारे में जागरुक होना बहुत ही आवश्यक है ताकि हम अपने आप को और अपने प्रियजनों को इस तरह के अपराधों से बचा सकें। इसलिए इस आर्टिकल के द्वारा हम भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 को समझेंगे कि, बीएनएस की धारा 316 में आपराधिक विश्वासघात क्या है (BNS Section 316)? इस बीएनएस सेक्शन में सजा और जमानत का क्या प्रावधान हैं?

          भारत में बहुत पहले से ही विश्वासघात के मामलों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 405 और 409 के तहत दर्ज किया जाता था। हालांकि, जब से Bhartiya Nyaya Sanhita (BNS) लागू हुई है ऐसे मामलों को अब बीएनएस की धारा 316 के तहत दर्ज किया जाता है। बीएनएस एक नई संहिता है जो आईपीसी की जगह लेती है। इसलिए इस अपराध से जुड़ी संपूर्ण जानकारी आपको इसी लेख में मिल जाएगी।

बीएनएस की धारा 316 क्या है – BNS Section 316 

       भारतीय न्याय संहिता की धारा 316, आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) के अपराध से संबंधित है। यह धारा किसी व्यक्ति द्वारा संपत्ति के दुरुपयोग (Misuse) या बेईमानी (Dishonesty) से उसका उपयोग करने पर लागू होती है, जब उस व्यक्ति को उस संपत्ति पर विश्वास किया गया हो।

आसान भाषा में कहे तो, यह धारा ऐसी स्थितियों में लागू होती है:-

  • जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति पर भरोसा करके अपनी किसी संपत्ति को संभालने के लिए देता है, लेकिन वो व्यक्ति उस संपत्ति का किसी भी तरीके से गलत उपयोग करता है।
  • जब कोई व्यक्ति किसी संपत्ति का बेईमानी से अपने लाभ के लिए उपयोग करता है।

        BNS की धारा 316 के अपराध व उनकी सजा को विस्तार से इसकी 5 उपधाराओं (Sub-Sections) के द्वारा बताया है, जो इस प्रकार से है:-

BNS 316 की उपधारा (1):- इसमें केवल आपराधिक विश्वासघात के अपराध की परिभाषा (Definition) के बारे में बताया गया है। आपराधिक विश्वासघात का सीधा सा मतलब है कि जब किसी व्यक्ति को कोई चीज़ संभालने के लिए दी जाती है और वह उस चीज़ को अपने फायदे के लिए गलत तरीके से इस्तेमाल करता है, तो उस पर धारा 316 (1) के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है।

BNS 316 की उपधारा (2): इसमें धारा 316(1) के अंदर बताए गए अपराध को करने के दोषी (Guilty) पाये जाने वाले व्यक्ति को जेल की कैद व जुर्माने की सजा के बारे में बताया गया है।

BNS 316 की उपधारा (3): अगर कोई व्यक्ति, जो सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाता है (वाहक), दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति (वार फिंगर), या गोदाम का प्रबंधक (जो सामान को संभालता है) आपराधिक विश्वासघात करता है। तो उसे धारा 316(2) में दी गई सजा से ज्यादा दंड दिया जा सकता है।
उदाहरण: एक गोदाम के प्रबंधक (Ware House Manager) ने अपने अधिकार का गलत उपयोग करके गोदाम में रखे महंगे सामान को चुपके से चुरा लिया और बेच दिया।

BNS 316 की उपधारा (4):- अगर कोई क्लर्क (जो कार्यालय में काम करता है) या संपत्ति की देखरेख करने वाला नौकर आपराधिक विश्वासघात करता है, तो उस पर धारा 316(4) के तहत कार्यवाही की जाती है।
उदाहरण: एक क्लर्क ने कंपनी की फाइलों में जालसाजी (Forgery) की और कंपनी की संपत्ति के कुछ हिस्से को अपनी निजी संपत्ति (Private Property) के रूप में दर्ज कर लिया।

BNS 316 की उपधारा (5):- जब कोई सरकारी कर्मचारी, बैंक में काम करने वाला व्यक्ति या इसी तरह के पेशेवर (Professional) लोग आपराधिक विश्वासघात करते हैं, तो उन पर धारा 316(5) के तहत कार्यवाही कर सजा (Punishment) दी जाती है।
उदाहरण: एक बैंकर ने बैंक के धन को अपने व्यक्तिगत उपयोग (Personal Use) के लिए गबन किया, या किसी सरकारी कर्मचारी ने अपनी जिम्मेदारी का दुरुपयोग करके सरकारी फंड को अपने निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया।

कुछ कार्य जिनको करना धारा 316 का अपराधी बना सकता है
  • यदि कोई व्यक्ति किराए पर लिया गए घर को धोखे से बेच देता है।
  • किसी ट्रस्ट के धन का अपने फायदे के लिए उपयोग करना।
  • किसी कंपनी के कर्मचारी द्वारा कंपनी के पैसो को धोखे से अपने पास रख लेना।
  • बैंक कर्मचारी द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के खाते से पैसे निकालकर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना।
  • किसी दुकानदार या व्यापारी द्वारा किसी ग्राहक से लिए गए पैसे को वापस नहीं करना।
  • यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर संपत्ति का दस्तावेज (Documents) तैयार करता है और उस संपत्ति को अपने नाम पर कर लेता है, तो उस पर भी धारा 316 के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है।
  • यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर संपत्ति बेचता है और उसका पैसा अपने पास रख लेता है, तो उस पर धारा 316 के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है।
बीएनएस सेक्शन 316 के अपराध का उदाहरण

     राहुल एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में एक सीनियर प्रोग्रामर के पद पर काम करता था। कंपनी ने राहुल को एक नए व बहुत ही महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी सौंपी। यह प्रोजेक्ट कंपनी के लिए बहुत जरुरी था। उस प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए कंपनी ने राहुल को बहुत सारे पैसे दिए। लेकिन, राहुल ने उन पैसो का उपयोग प्रोजेक्ट के लिए नहीं किया। बल्कि उसने इन पैसे को अपने निजी स्वार्थों के लिए खर्च कर दिया।

        उसने इस पैसे से एक नई कार खरीदी, महंगे गजेट्स खरीदे, और कई तरह की चीजों में खर्च किए। कुछ समय बाद जब प्रोजेक्ट पूरा होने में देरी हुई और कंपनी को पता चला कि राहुल ने प्रोजेक्ट के लिए दिए गए पैसों का दुरुपयोग (Misuse) किया है, तो कंपनी ने इस मामले की जांच शुरू की। जिसमें राहुल द्वारा किए गए विश्वासघात का पता चला। जिसके बाद कंपनी के अधिकारियों की शिकायत के आधार पर पुलिस द्वारा राहुल के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात की धारा 316 व उसकी उपधाराओं के तहत शिकायत दर्ज (Complaint Register) कर कार्यवाही की गई।

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316 के अपराध की सजा

बीएनएस की धारा 316 के अपराध में सजा (Punishment) को अलग-अलग उपधाराओं (Sub-Sections) के द्वारा अपराध की गंभीरता के अनुसार बताया गया है। जो कि इस तरह से है:-

  • धारा 316 (2) की सजा:- यदि कोई व्यक्ति धारा 316(1) में बताए गए आपराधिक विश्वासघात के अपराध का दोषी (Guilty) पाये जाता है तो उसे धारा 316(2) के तहत 5 साल तक की जेल व जुर्माना (Imprisonment Or fine) लगाकर दंडित किया जा सकता है।
  • धारा 316(3) की सजा:- किसी सामान को लाने ले जाने वाले व्यक्ति या किसी गोदाम का प्रबंधक (Warehouse Manager) धारा 316(3) के तहत दोषी पाया जाएगा। तो उसको सात साल की जेल व जुर्माने का दंड लगाकर सजा दी जाएगी।
  • धारा 316(4) की सजा:-यदि कोई कलर्क या नौकर आपराधिक विश्वासघात करेगा तो उसे धारा 316(4) के उल्लंघन (Violation) की सजा के तौर पर 7 साल की जेल व जुर्माने की सजा दी जाएगी।
  • धारा 316(5) की सजा:- यदि कोई सरकारी कर्मचारी या बैंक का कर्मचारी आपराधिक विश्वासघात करने का अपराध करेगा तो उसे धारा 316(5) के तहत 7 वर्ष की कैद व जुर्माने की सजा दी जाएगी।
बीएनएस​ की धारा 316 में जमानत कब और कैसे मिलती है

       बीएनएस की धारा 316 के अनुसार किसी व्यक्ति के साथ आपराधिक विश्वासघात करने का यह अपराध एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध (Cognizable Or Non- Bailable Offence) होता है। जिसमें पीड़ित व्यक्ति (Victim) के द्वारा पुलिस में शिकायत दर्ज करवाते ही आरोपी को गिरफ्तार किया जा सकता है।

        गैर-जमानती होने के कारण इस अपराध के आरोपी व्यक्ति को जमानत (Bail) के लिए भी बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ ही यह मामला प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय (Triable) होता है व इसमें किसी भी प्रकार का समझौता (Compromise) नहीं किया जा सकता है।

निष्कर्ष:- BNS Section 316 एक महत्वपूर्ण कानूनी धारा है जो संपत्ति के दुरुपयोग से संबंधित अपराधों से निपटती है। यदि आप इस धारा के तहत किसी मामले में शामिल हैं, तो आपको एक अनुभवी वकील से सलाह लेनी चाहिए। जिसके लिए अभी आप हमारे अनुभवी वकीलों से बात कर घर बैठे बात कर सकते है।

बीएनएस धारा 317 क्या है |

BNS Section 317

        कभी-कभी हम किसी कीमती चीज को सस्ते में खरीदने के लिए इतनी जल्दबाजी कर देते है, कि हम यह भी पता करना भूल जाते है कि वो वस्तु चोरी की भी हो सकती है। कई बार ऐसे कार्य अंजाने में होते है, लेकिन कुछ लोग जानबूझकर भी चोरी के सामान को खरीद लेते है। ऐसा करना कानूनी रुप से एक गंभीर अपराध माना जा सकता है, जिसके लिए कई वर्षों तक जेल की सजा भी भुगतनी पड़ सकती है। ऐसे अपराधों से बचने व अंजाने में आरोपी बनने पर आगे की कार्यवाही की जानकारी होना सभी के लिए बहुत आवश्यक है। इसलिए इस लेख में हम भारतीय न्याय संहिता में चोरी के सामान से जुडी एक धारा के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे कि, बीएनएस की धारा 317 (1) (2) (3) (4) (5) क्या है (BNS Section 317)? व धारा 317 लागू होने के लिए मुख्य बिंदु, सजा और जमानत की जानकारी।

         भारत में समय-समय पर कानूनों को पहले से बेहतर करने के लिए बदलाव किया जाता है, ताकि न्याय व्यवस्था को लोगों के लिए और भी आसान बनाया जा सके। चोरी की गई संपत्ति से जुड़े अपराधों के मामले में भी ऐसा ही हुआ है। पहले जब कोई व्यक्ति चोरी की हुई चीज खरीदता या बेचता था, तो उस पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 410 और 414 के तहत मामला दर्ज किया जाता था। लेकिन अब चीजें बदल गई हैं। अब ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 317 लागू होती है। इसलिए इस अपराधों से जुड़े सभी कानूनी उपायों को विस्तार से जानने के लिए इस आर्टिकल को अंत तक पूरा पढ़े।

बीएनएस की धारा 317 क्या है – BNS Section 317 

         भारतीय न्याय संहिता की धारा 317 चोरी की संपत्ति (Stolen Property) को लेने के अपराध से संबंधित है। यह धारा उन व्यक्तियों पर लागू होती है जो जानबूझकर या अनजाने में चोरी की हुई संपत्ति को प्राप्त करते हैं या अपने पास रखते हैं। इसे सरल शब्दों में समझे तो अगर आप कोई ऐसी चीज ले रहे है जो चोरी (Theft) की है और आपको पता है या आपको शक है कि वो वस्तु चोरी की है। लेकिन फिर भी आप उस वस्तु को कम पैसों में या किसी अन्य लालच में खरीदते है, तो यह कानून अपराध माना जाता है।

        धारा 317 में चोरी की संपत्ति के अपराध को इसकी 5 उपधाराओं (Sub-Sections) में अलग-अलग तरीकों व उन अपराधों की गंभीरता के अनुसार बताया गया हैआइये विस्तार से जानते है:-

  1. बीएनएस धारा 317 (1):- इसमें इस अपराध की परिभाषा (Definition) के बारे में बताया गया है। जिसके अनुसार जब किसी संपत्ति को चोरी, डकैती, जबरन वसूली जैसे गैर-कानूनी कार्यों द्वारा लिया जाता है। तो वह चोरी की गई संपत्ति मानी जाती है। लेकिन अगर वह संपत्ति (Property) उसके असली मालिक के पास वापस आ जाती है, तो फिर उसे चोरी की गई संपत्ति नहीं कहा जाएगा।
  2. बीएनएस धारा 317 (2): यदि कोई व्यक्ति चोरी की गई संपत्ति को जानबूझकर या संदेह होने के बावजूद भी अपने पास रखता है, तो उसे धारा 317(2) के अनुसार सजा मिल सकती है। इसका मतलब है कि अगर किसी को पता है या उसे शक है कि यह संपत्ति चोरी की गई है, और फिर भी वह इसे अपने पास रखता है, तो यह अपराध माना जाएगा और उसके लिए उसे धारा 317(2) के तहत सजा दी जा सकती है।
  3. बीएनएस सेक्शन 317 (3): अगर कोई व्यक्ति चोरी की गई संपत्ति को बेईमानी (Dishonesty) से अपने पास रखता है, और उसे पता है या उसे शक है कि यह संपत्ति डकैती के जरिए ली गई है, उस व्यक्ति पर धारा 317(3) लागू की जा सकती है। सरल भाषा में कहे तो, अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति से संपत्ति लेता है। जिसे वह जानता है या शक करता है कि वह डाकुओं के गिरोह का सदस्य है, और उसे विश्वास है कि यह संपत्ति डकैती करके ही लाई गई है, तो उसकी सजा और भी सख्त हो जाती है।
  4. बीएनएस सेक्शन 317 (4):- अगर कोई व्यक्ति बार-बार या आदतन (ऐसे कार्य करने की आदत हो जाना) ऐसी संपत्ति खरीदता, बेचता या उसका लेन-देन करता है। जिसके बारे में उसे पता है या शक है कि वह संपत्ति चोरी की गई है, तो उस पर धारा 317(4) के तहत कार्यवाही की जाती है।
  5. बीएनएस सेक्शन 317 (5):- अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर (Intentionally) चोरी की गई संपत्ति को छिपाने, उसे कहीं और ले जाने, या उसे ठिकाने लगाने में मदद करता है। जिसके बारे में उसे पता है कि यह संपत्ति चोरी की गई है, तो यह धारा 317(5) के तहत अपराध माना जाएगा। सरल शब्दों में कहे तो, अगर कोई जानबूझकर चोरी की संपत्ति को छिपाने या इधर-उधर करने में मदद करता है, तो उसे जेल और जुर्माने (Imprisonment Or fine) की सजा मिल सकती है।
बीएनएस धारा 317 के अपराध को साबित करने वाले कुछ मुख्य तत्व
  • इस धारा के तहत अपराध को साबित करने के लिए सबसे पहले यह साबित करना होगा कि वह संपत्ति जो व्यक्ति के पास है, वह चोरी की गई थी।
  • व्यक्ति ने चोरी की गई संपत्ति को प्राप्त किया या अपने पास रखा।
  • व्यक्ति को यह जानकारी होनी चाहिए की जो संपत्ति वो खरीद रहा हो वो चोरी की है, या उसे इस बात का शक होना चाहिए।
  • यदि व्यक्ति को यह नहीं पता था कि संपत्ति चोरी की गई है, तो उसे दोषी (Guilty) नहीं ठहराया जा सकता है।
  • व्यक्ति ने जानबूझकर और गलत इरादे से चोरी की गई संपत्ति को प्राप्त किया या रखा।
आपराधिक उदाहरण

       राहुल एक दिन बाजार में घूम रहा था, उसे किसी ने बताया था कि उस बाजार में एक दुकान पर लाखों के फोन बहुत ही सस्ते में मिल जाते है। जिसके बाद राहुल उस दुकान पर चला गया, वहाँ उसे बहुत ही महंगे फोन बहुत ही कम कीमत पर दिखाए जाते है। राहुल को पता होता है कि इस दुकान पर कम कीमत में मिलने वाले ये फोन चोरी के होते है। फिर भी वो कम पैसों में कीमती फोन लेने की सोचकर एक फोन खरीद लेता है।

       कुछ दिनों बाद पुलिस राहुल के घर आई और उससे वह फोन जब्त कर लिया। पुलिस ने बताया कि वह फोन चोरी हुआ था। राहुल को पता चला कि उसने जो फोन खरीदा था, वह चोरी का था। इसलिए अब राहुल पर BNS की धारा 317 के तहत मामला दर्ज हो सकता है।

ऐसे कार्य जिनको करने पर धारा 317 के तहत आरोप लग सकते है

       यदि आपको पता है या आपको शक है कि कोई सामान चोरी का है और आप फिर भी उसे खरीदते हैं, तो आप इस अपराध के दायरे में आ सकते हैं।

  • यदि आप किसी चोरी के सामान को बेचते है तो इस अपराध के दोषी बन सकते है।
  • कोई सामान चोरी का है और उसे छिपाना भी इस धारा के तहत अपराध है।
  • कोई सामान चोरी का है और कोई उसे इस्तेमाल करता हैं, तो आप उस व्यक्ति पर भी धारा 317 लागू की जा सकती है।
  • इसके अलावा चोरी के सामान को किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचना।
  • धोखे से चोरी की किसी वस्तु को अपना बताकर दे देना ये सभी कार्य किसी भी व्यक्ति को धारा 317 का आरोपी (Accused) बना सकते है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 317 के अपराध के लिए दंड

       बीएनएस की धारा 317 में चोरी की संपत्ति (Stolen Property) के अपराध में दी जाने वाली सजा (Punishment) को अलग-अलग प्रकार से ही अपराध की गंभीरता के अनुसार इसकी उपधाराओं (Sub-Sections) में बताया गया है:-

  • BNS 317 (2) की सजा:- जो भी व्यक्ति यह जानते हुए भी की जिस वस्तु को वो ले रहा है वो चोरी की है। फिर भी जानबूझकर उस संपत्ति को लेता है और अपने पास ऱखने का अपराध करता है, उसे दोषी पाये जाने पर धारा 317(2) के तहत सजा दी जाती है। यह सजा तीन साल तक की जेल हो सकती है, या उसे जुर्माना देना पड़ सकता है, या फिर दोनों सजा एक साथ भी मिल सकती हैं।
  • BNS 317(3) की सजा:- यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर या शक होने के बाद भी ऐसी संपत्ति को अपने पास रखता है, जो डकैतों या अपराधियों से ली गई हो तो दोषी को आजीवन कारावास (Life Imprisonment) या दस साल तक की सख्त जेल की सजा दी जा सकती है। इसके अलावा उस पर जुर्माना (Fine) भी लगाया जा सकता है।
  • BNS 317(4) की सजा:- अगर कोई व्यक्ति बार-बार चोरी की संपत्ति को खरीदने, बेचने या उसके लेन-देन का दोषी पाया जाता है, तो उसे तो उसे आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है। इसके अलावा, उसे दस साल तक की जेल भी हो सकती है और उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
  • BNS 317(5) की सजा:- यदि कोई व्यक्ति चोरी की संपत्ति को यह जानते हुए भी की वह संपत्ति चोरी की है, उस संपत्ति को कही छिपाने, ले जाने या ठिकाने लगाने का दोषी पाया जाएगा। उसे धारा 317(5) के अपराध के लिए तीन साल तक की जेल हो सकती है। इसके अलावा उसे जुर्माना भी देना पड़ सकता है, या फिर दोनों सजा एक साथ भी दी जा सकती हैं।
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 317 में जमानत का प्रावधान

        बीएनएस की धारा 317 के तहत किया गया अपराध गैर-जमानती (Non-Bailable) होता है, जिसका मतलब है कि इस अपराध में आरोपी को जमानत (Bail) मिलना आसान नहीं होता। इस धारा के तहत अपराध को संज्ञेय (Cognizable) भी माना जाता है, यानी पुलिस के पास आरोपी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार होता है। इसके अलावा इस अपराध का मामला किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा सुना जा सकता है।

बीएनएस की धारा 317 में आरोपी व्यक्ति के लिए बचाव उपाय
  • आरोपी व्यक्ति अपने बचाव के लिए यह दावा कर सकता हैं उसको यह नहीं पता था कि संपत्ति चोरी हुई है।
  • यदि आरोपी यह साबित कर दे कि उसको कोई ऐसा कारण नहीं पता चला जिससे मालूम हो सके की उसने जो संपत्ति ली है, वो चोरी की है। ऐसे में यह बात साबित होने पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता हैं।
  • आरोपी को अपने बचाव में यह साबित करना होगा की उसने संपत्ति को ईमानदारी से और बिना किसी गलत इरादे से प्राप्त किया था। उदाहरण के लिए यदि आरोपी ने उस चीज को किसी भरोसेमंद व्यक्ति से खरीदा था।
  • जिस वस्तु की चोरी के आरोप (Blame) आप पर लगे है। यदि वो वस्तु आपकी ही है, तो आप यह साबित कर सकते है कि आप ही उस वस्तु के असली मालिक हैं और चोरी का कोई सवाल ही नहीं उठता।
  • आरोपी अपने बचाव में यह कर सकता हैं कि जब उसे पता चला की उसने कोई चोरी की गई वस्तु ले ली है तो उसने उसी समय उस वस्तु के असली मालिक का पता करके उसको वापिस कर दिया था।
  • आरोपी ऐसे गवाहों (Witnesses) को पेश कर सकते हैं जो आपके दावे का समर्थन करते हों।
  • इसके अलावा ऐसे दस्तावेजों (Documents) को पेश कर सकते हैं जो आपके दावे (Claims) का समर्थन करते हों, जैसे कि खरीद का बिल, रसीद आदि।

बीएनएस धारा 318 क्या है |

BNS Section 318

        आजकल धोखाधड़ी के मामलों की बढ़ती घटनाओं के चलते देश के हर नागरिक को सतर्क और जागरूक रहने की जरुरत है। धोखेबाज़ किसी भी व्यक्ति की मेहनत की कमाई और कीमती वस्तुओं को कुछ ही देर में चुरा सकते हैं। ऐसे अपराध करने वाले लोग बहुत ही चालाकी से लोगों के लालच व डर का सहारा लेकर अपने शिकार को फंसा लेते हैं। अगर आप अपने आपको धोखाधड़ी से बचाना चाहते हैं या आपके ऊपर धोखेबाज़ का आरोप लगा हैं, तो यह लेख आपके लिए बहुत ही उपयोगी होने वाला है। जिसमें हम भारतीय न्याय संहिता की धोखाधड़ी की कानूनी धारा के बारे में जानेंगे, कि बीएनएस की धारा 318 (1) (2) (3) (4) क्या है (BNS Section 318)? यह कब लागू होती हैं और इस धारा में सजा और बचाव का क्या प्रावधान है?

        किसी भी व्यक्ति को बहला-फुसलाकर धोखे से कोई भी वस्तु हासिल करने से संबंधित आपराधिक मामलों पर अभी तक भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 415, 417, 418 व 420 के तहत कार्यवाही की जाती थी। लेकिन कानूनी बदलाव के चलते BNS के लागू होने के बाद से इस अपराध के आरोपी व्यक्तियों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 लागू कर कार्यवाही की जाएगी। इसलिए इस अपराध की संपूर्ण जानकारियों व बचाव उपायों को पूर पढ़कर अन्य लोगों को भी जरुर भेजे।

बीएनएस धारा 318 क्या है व यह कब लागू होती है – BNS Section 318 

         भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 एक ऐसा कानून है जो किसी व्यक्ति को धोखा (Cheat) देने पर सजा का प्रावधान (Provision) करता है। जिसमें किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देकर उसे संपत्ति देने या संपत्ति के नुकसान के लिए सहमति देने के लिए प्रेरित करना शामिल है।

         आसान भाषा में कहे, तो यदि कोई व्यक्ति किसी को झूठ बोलकर या किसी बात को छिपाकर उससे पैसे या कोई अन्य संपत्ति प्राप्त कर लेते हैं, तो वह धोखाधड़ी (cheating) मानी जाएगी। जिसके आरोपी व्यक्ति पर BNS Section 318 के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

      बीएनएस धारा 318 में चार उप-धाराएँ (Sub Sections) हैं जिनके अंदर इस अपराध को गंभीरता के हिसाब से अलग-अलग प्रकार से बताया गया है।

  1. बीएनएस धारा 318 की उपधारा (1): इसमें बताया गया है की धोखा तब होता है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी दूसरे व्यक्ति को गुमराह (Astray) करता है, या उसे गलत जानकारी देकर उसे कुछ ऐसा करने पर मजबूर करता है। जो वह सामान्य परिस्थितियों में नहीं करता। इस धोखे के कारण उस व्यक्ति को किसी भी तरह का नुकसान या हानि हो सकती है। जिसमें उसके शरीर, मन, सम्मान, या संपत्ति का नुकसान शामिल है।
  2. बीएनएस धारा 318 की उपधारा (2): इसमें केवल सेक्शन 318(1) के अपराध की सजा (Punishment) के बारे में बताया गया है। जो भी व्यक्ति किसी के साथ धोखाधड़ी का अपराध करेगा उसे दोषी पाये जाने पर कारावास व जुर्माने (Imprisonment Or fine) की सजा से दंडित किया जा सकता है।
  3. बीएनएस सेक्शन 318 की उपधारा (3): यदि कोई व्यक्ति जिसे किसी अन्य व्यक्ति के हितों की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी दी गई है। यानी जिस व्यक्ति का काम लोगों की मदद करना है जब ऐसा व्यक्ति किसी के साथ धोखाधड़ी करता है। तो उस व्यक्ति को धारा 318(2) में दी गई सजा से ज्यादा सजा व जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।सरल भाषा में समझे तो, इसमें ऐसे लोग आते है जो अपने अधिकार और ज़िम्मेदारी का गलत उपयोग करते है और दूसरों के साथ धोखा करते है। जो की कानूनी रुप से एक गंभीर अपराध माना जाता है। उदाहरण:- यदि किसी बैंक का मैनेजर ग्राहक के पैसे का गलत उपयोग करके उन पैसे से खुद को फायदा पहुँचाता है, तो उसे जेल या जुर्माना हो सकता है।
  4. बीएनएस की धारा 318 (4): इसमें बताया गया है अगर कोई व्यक्ति धोखा देकर या बेईमानी से किसी दूसरे व्यक्ति को इस तरह से बहकाता है। जिससे वह अपनी संपत्ति, पैसे, या कीमती कागजात (जैसे कि किसी जायदाद के दस्तावेज़, बैंक चेक आदि) किसी को सौंप देता है। या फिर धोखे से कोई उसके जरुरी दस्तावेज़ को बदल देता है या नष्ट कर देता है तो ऐसे व्यक्ति को अन्य सभी उपधाराओं (Sub Sections) की सजा से अधिक सजा व जुर्माने से दंडित (Punished) किया जा सकता है। उदाहरण:- मान लीजिए, कोई व्यक्ति किसी बुजुर्ग को धोखे से बहकाकर उनकी जायदाद के कागज़ात पर हस्ताक्षर (Signature) करवा लेता है, जिससे जायदाद का मालिकाना हक वह अपने नाम कर लेता है।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 की मुख्य बातें:-

बीएनएस की धारा 318 के तहत धोखाधड़ी के अपराध के तहत किसी व्यक्ति पर तभी आरोप (Blame) लगाए जा सकते है, जब इनमें से कोई बात शामिल हो:-

  • धोखा देने का इरादा: आरोपी का पीड़ित (Victim) को धोखा देने और आर्थिक नुकसान पहुंचाने का इरादा होना चाहिए।
  • धोखा: आरोपी के द्वारा पीड़ित को गुमराह करने के लिए शब्दों द्वारा, हावभाव द्वारा या आचरण द्वारा किसी प्रकार का धोखा देना चाहिए।
  • संपत्ति का नुकसान: आरोपी के द्वारा दिए गए धोखे के कारण पीड़ित व्यक्ति को संपत्ति का नुकसान होना चाहिए।
कुछ ऐसे कार्य जिनको करना धोखाधड़ी मान जा सकता है:-
  • किसी व्यक्ति को झूठे वादे करके, जैसे निवेश में ज्यादा से ज्यादा लाभ देने का वादा करके उससे धन प्राप्त करना।
  • किसी नकली सामान को असली बताकर या उसकी गुणवत्ता (Quality) के बारे में झूठ बोलकर धोखे से किसी को बेचना।
  • किसी फर्जी दस्तावेज (Fake Documents) जैसे कि जाली पासपोर्ट या डिग्री, का उपयोग करके अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना।
  • ऑनलाइन माध्यम से जैसे कि सोशल मीडिया या ई-कॉमर्स वेबसाइटों के माध्यम से, धोखाधड़ी करना।
  • झूठी लॉटरी या स्कीम के बारे में बताकर लोगों से पैसे लेना।
  • बैंक खाते से पैसे निकालने या किसी और के खाते में पैसे ट्रांसफर करने के लिए फर्जी तरीके अपनाना।
  • बीमा कंपनी को गुमराह करके बीमा का फायदा लेने का दावा करना।
  • किसी संपत्ति के दस्तावेजों में हेराफेरी करके उस संपत्ति को बेचना या गिरवी रखना।
  • नौकरी पाने के लिए अपनी योग्यता के बारे में झूठ बोलना।
  • चैरिटी के नाम पर दान लेना और उस पैसे का निजी उपयोग करना।
बीएनएस सेक्शन 318 का उदाहरण

        रमेश नाम का व्यक्ति एक छोटे शहर में अपने परिवार के साथ रहता था। एक दिन उसको किसी महिला का फोन आया और उसने बताया गया कि वह एक बड़ी लॉटरी जीत गया है। बस उन पैसों को प्राप्त करने के लिए उसे कुछ पैसे जमा करने हैं और वह लाखों रुपये का इनाम ले सकता है।
रमेश यह बात सुनकर बहुत खुश हुआ और उसने उस महिला द्वारा मांगे गए पैसे जमा कर दिए। लेकिन कुछ दिनों बाद जब उसने अपना इनाम लेने की कोशिश की तो पता चला कि कोई लॉटरी नहीं थी और वह धोखा खा गया था। जिसके बाद रमेश उस अज्ञात महिला के खिलाफ BNS Section 318 के तहत शिकायत दर्ज करवाता है।

बीएनएस धारा 318 की सजा – BNS Section 318 Punishment 

     बीएनएस की धारा 318 के अपराध में सजा (Punishment) को अलग-अलग उपधाराओं के द्वारा बताया गया है। चलिए धोखाधड़ी के अपराध की सजा को विस्तार से जानते है:-

  • BNS Section 318 (2) की सजा:- धारा 318 की उपधारा (1) में बताए गई बातों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति धोखाधड़ी के अपराध का दोषी (Guilty) पाया जाएगा। उसे न्यायालय द्वारा 2 वर्ष तक की कारावास व जुर्माने की सजा से दंडित किया सकता है।
  • BNS Section 351 (3) की सजा:- यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसे लोगों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी दी गई है, ऐसा व्यक्ति अपने पद का गलत फायदा उठाता है। तो ऐसे व्यक्ति को दोषी पाये जाने पर 5 वर्ष तक की जेल व जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
  • BNS Section 351 (4की सजा:- यदि कोई किसी अन्य व्यक्ति को बहकाकर या धोखे से उसकी किसी संपत्ति को हासिल करने के लिए दस्तावेजों (Documents) में बदलाव करने का दोषी पाया जाएगा। उस व्यक्ति को 7 वर्ष तक की कारावास व जुर्माने की सजा दी जा सकती है।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 में जमानत कब व कैसे मिलती है

        बीएनएस की धारा 318 के अनुसार किसी भी व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी करके उसे किसी भी प्रकार का नुकसान पहुँचाना एक गंभीर अपराध माना जाता है। इसलिए धोखाधड़ी का अपराध संज्ञेय व गैर-जमानती (Cognizable Or Non Bailable) होता है, जिसका मतलब है कि इस अपराध के आरोपी व्यक्ति को अधिकार के तौर पर जमानत (Bail) नहीं दी जा सकती है।

        इस प्रकार के मामलों में जमानत के लिए आपको किसी वकील (Lawyer) की सहायता लेनी चाहिए। जो आपके द्वारा किए गए अपराध की गंभीरता के अनुसार कोर्ट में आपकी जमानत की मांग कर सकता है।

BNS 318 के तहत धोखाधड़ी के आरोपी व्यक्तियों के लिए बचाव उपाय

        यहां इस अपराध के आरोपी व्यक्तियों के लिए कुछ ऐसे बचाव (Defence) उपाय दिए गए हैं जो ऐसे अपराध के मामलों में मदद कर सकते हैं:

  • ऐसे आपराधिक मामलों में आरोप लगते ही सबसे पहले एक अनुभवी वकील से संपर्क करें जो आपकी मदद कर सके।
  • वकील आपको कानूनी प्रक्रिया के बारे में जानकारी देगा और आपके बचाव की रणनीति तैयार करेगा।
  • अपने खिलाफ लगे आरोपों को ध्यान से पढ़ें और समझें। यह जानें कि आप पर क्या आरोप (Blame) लगाया गया है।
  • अपने बचाव के लिए सभी आवश्यक सबूत (Evidence) इकट्ठा करें। इसमें दस्तावेज, गवाह, और अन्य प्रमाण शामिल हो सकते हैं जो साबित करते हैं कि आप निर्दोष (Innocent) हैं।
  • पुलिस जांच में सहयोग करें लेकिन कोई भी ऐसा बयान न दें जो आपके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके।
  • जब भी कोर्ट में पेश होने के लिए कहा जाए, तो तैयार रहें।
  • ऐसे गवाहों (Witnesses) को ढूंढें जो आपके पक्ष में गवाही दे सकें।
  • अदालत में झूठ बोलने से आपका मामला और खराब हो सकता है।
  • अपने वकील के निर्देशों का पालन करें और उनकी सलाह को ध्यान से सुनें।
धोखा-धड़ी के अपराध की शिकायत धारा 318 के तहत कैसे दर्ज कराए
  • इस अपराध का शिकार होने पर जितनी जल्दी हो सके पुलिस में शिकायत दर्ज (Complaint Register) कराएं। देरी से शिकायत करने पर सबूत मिटने का खतरा रहता है।
  • अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन में जाएं और एक लिखित शिकायत दर्ज कराएं।
  • घटना के सभी तथ्यों को ध्यान से इकट्ठा करें। इसमें तारीख, समय, स्थान, शामिल व्यक्ति, और सभी प्रमाण शामिल हैं जो आपके दावे को मजबूत कर सकते हैं।
  • सभी सबूत जैसे कि दस्तावेज, संदेश, या अन्य सामग्री को सुरक्षित रखें।
  • अपनी शिकायत में सभी बातों को अच्छे से बताए इसमें धोखाधड़ी का तरीका, आपको हुए नुकसान, और आरोपी के बारे में सभी जानकारी शामिल होनी चाहिए।
  • यदि आपके पास कोई गवाह है तो उनके नाम और पते भी अपनी शिकायत में शामिल करें।
  • शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस से प्राथमिकी (एफआईआर) की एक प्रति (Copy) लें।
  • यदि आवश्यक हो तो किसी वकील की सहायता ले एक वकील आपको कानूनी प्रक्रिया के बारे में मार्गदर्शन दे सकता है और आपके मामले को अदालत में पेश कर सकता है।

निष्कर्ष:- धोखाधड़ी एक गंभीर अपराध है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश के हर नागरिक को धोखाधड़ी के अपराध से बचाना व पीड़ित व्यक्तियों को समय पर न्याय (Justice) दिलाना है। अगर आपको कोई धोखा देता है तो आपको जल्द से जल्द कानूनी सहायता लेनी चाहिए। यदि आप BNS Section 318 (1) (2) (3) (4) से संबधित सलाह लेना चाहते चाहते है, तो अभी हमारे वकीलों से घर बैठे बात कर सकते है।

बीएनएस धारा 319 क्या है |

BNS Section 319

         आपने अखबारों में सोशल मीडिया पर या हो सकता है अपने आसपास भी ऐसे कई मामले सुने होंगे जहां लोग अपनी पहचान छिपाकर धोखाधड़ी करते हैं। जैसे कि किसी और के नाम से बैंक खाता खोलना, किसी और की डिग्री का उपयोग करके नौकरी पाना, या किसी और की संपत्ति हड़पने के लिए फर्जी दस्तावेज बनाना। इस प्रकार के सभी कार्य कानून अपराध माने जाते है। ऐसे कार्यों के कारण लोगों का आत्मविश्वास टूटता है, आर्थिक नुकसान होता है और कई बार मानसिक तनाव भी होता है। आज हम पहचान के आधार पर धोखा-धड़ी के अपराध से जुड़ी भारतीय न्याय संहिता की धारा के बारे में समझेंगे कि बीएनएस की धारा 319 क्या है (BNS Section 319)? यह सेक्शन 319 (1) (2) कब लागू होती है और इस धारा के दोषी को सजा कितनी और जमानत कैसे मिलती है?

          कुछ महीनों पहले तक जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे को पहचान के आधार पर धोखा देता था तो भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 416 और 419 के तहत मामला दर्ज किया जाता था। ये धाराएं अलग-अलग तरह के धोखे के लिए इस्तेमाल होती थीं, जिससे कानूनी प्रक्रिया थोड़ी जटिल हो जाती थी। लेकिन समय के साथ कानून में बदलाव हुए और अब भारतीय न्याय संहिता लागू हुई।

          इस नए कानून के तहत धोखे के अधिकांश मामलों को एक ही धारा यानी BNS की धारा 319 के तहत लागू किया जाता है। यह बदलाव इसलिए किया गया ताकि कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाया जा सके और धोखे के मामलों में न्याय मिलने की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।

बीएनएस की धारा 319 क्या है – BNS Section 319 (1) (2) 

         भारतीय न्याय संहिता की धारा 319 प्रतिरूपण द्वारा धोखा (Deception by impersonation) देने के अपराध के बारे में बताती है। यह एक ऐसा कानूनी प्रावधान है, जो किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर किसी और का रूप धारण करके धोखा देने से संबंधित है। इस अपराध के तहत कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का गलत उपयोग करके उसके नाम से कोई कार्य करता है, तो ऐसे लोगों पर धारा 319 के तहत मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही की जाती है।

उदाहरण:- यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के नाम से सरकारी दस्तावेजों (Government Documents) का गलत उपयोग करता है, जैसे कि पहचान पत्र या पासपोर्ट, तो यह प्रतिरूपण द्वारा धोखा माना जाएगा।

किसी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर किसी दूसरे की तस्वीर और नाम का इस्तेमाल करके लोगों को गुमराह करना भी इस धारा के तहत अपराध होता है।

  • BNS Section 319 (1):- सेक्शन 319(1) में केवल इस अपराध की परिभाषा के बारे में बताया गया है। जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी दूसरे व्यक्ति का रूप धारण (impersonate) करके, या किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का गलत तरीके से इस्तेमाल करके धोखा देता है, तो वह प्रतिरूपण द्वारा धोखे का अपराध करता है।
  • BNS Section 319 (2): इसमें सेक्शन 319 (1) के अंदर बताए गए अपराध के लिए दंड (Punishment) का प्रावधान किया गया है। यानि जो भी व्यक्ति किसी और की पहचान का इस्तेमाल करने का दोषी (Guilty) पाया जाएगा उसे धारा 319 (2) के तहत दंडित किया जाएगा।
धारा 319 के तहत अपराध साबित करने के मुख्य बिंदु
  • किसी अन्य व्यक्ति का रूप धारण करना, यानी जानबूझकर किसी और की पहचान (Identity) का उपयोग करना।
  • इसमें किसी अन्य व्यक्ति की पहचान या रुप का उपयोग किसी को धोखा देने के लिए किया जाता है।
  • इस प्रकार के धोखे से आरोपी को कोई लाभ होता है या किसी अन्य व्यक्ति को हानि होती है।
  • आरोपी जानबूझकर (Intentionally) व खुद की इच्छा से यह अपराध करता है।
बीएनएस की धारा 319 का उदाहरण

       राहुल एक प्रतियोगी परीक्षा देना चाहता था, लेकिन उसे विषय के प्रश्नों के उत्तर अच्छी तरह से नहीं आते थे। इसलिए उसन अपने दोस्त रवि से कहा कि वह उसकी जगह परीक्षा दे दे। रवि राहुल के कहने पर ऐसा करने के लिए राजी हो गया। रवि ने राहुल की पहचान का उपयोग करके परीक्षा दी और राहुल के नाम से उत्तर पुस्तिका भर दी। इस मामले में रवि ने राहुल का रूप धारण किया और परीक्षा देने के लिए राहुल की पहचान का दुरुपयोग (Misuse) किया। जिसमें रवि ने इस धोखे से राहुल को लाभ पहुंचाया इसलिए ऐसे अपराध को करने के लिए रवि व राहुल दोनों पर BNS की धारा 319 के तहत कार्यवाही की जा सकती है।

BNS Section 319 के तहत आपराधिक कृत्य
  • किसी और व्यक्ति के नाम, पद या पहचान का उपयोग करना।
  • किसी और के दस्तावेजों (Documents) का उपयोग करना जैसे कि पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस या बैंक स्टेटमेंट।
  • पारिवारिक विवाद (Family Dispute) में किसी और का रूप धारण करना।
  • किसी मृत व्यक्ति (Dead Person) का रूप धारण करके उसकी संपत्ति हासिल करने का प्रयास करना।
  • किसी और के नाम से परीक्षा देना।
  • संगठन में घुसपैठ करने के लिए झूठी पहचान (Fake Identity) का उपयोग करना।
  • किसी बैंक से लोन लेने के लिए किसी अमीर व्यक्ति का रूप धारण करना।
  • सरकारी नौकरी (Government Job) पाने के लिए झूठी जानकारी देना।
  • किसी और के नाम से वोट देना।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 319 में सजा का प्रावधान

       बीएनएस की धारा 319(2) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति धोखे से किसी और का रूप धारण करके धोखाधड़ी (Fraud) करता है और दोषी (Guilty) पाया जाता है, तो उसे अधिकतम पांच साल तक जेल हो सकती है। इसके साथ ही आरोपी व्यक्ति पर जुर्माना (Fine) भी लगाया जा सकता है। कुछ मामलों में तो अदालत कारावास और जुर्माना (Imprisonment Or Fine) दोनों की सजा एक साथ दे सकती है। इसका मतलब है कि व्यक्ति को जेल की सजा भुगतनी होगी और साथ ही जुर्माना भी अदा करना पड़ेगा।

बीएनएस की धारा 319 में जमानत कब व कैस मिलती है?

         भारतीय न्याय संहिता की धारा 319 के तहत किए गए अपराध आमतौर पर संज्ञेय व जमानती (Cognizable Or Bailable) माने जाते है। जिसका मतलब है कि इस मामले में आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तारी के बाद जमानत (Bail) मिलने का अधिकार होता है। यदि किसी की पहचान का गलत इस्तेमाल करके धोखाधड़ी करने के अपराध से पीड़ित व्यक्ति (Victim) को कोई बड़ा नुकसान हुआ है या अपराध की गंभीरता ज्यादा है, तो अदालत जमानत देने में सख्ती भी दिखा सकती है। उदाहरण के लिए यदि किसी ने किसी अन्य व्यक्ति की पहचान चुराकर बहुत ज्यादा आर्थिक नुकसान पहुंचाया है, तो जमानत मिलना कठिन हो सकता है।

निष्कर्ष:- BNS की धारा 319 उन लोगों पर लागू होती है जो किसी और की पहचान का इस्तेमाल करके धोखा देते हैं और इससे किसी को नुकसान पहुंचाते हैं। यह कानून लोगों को धोखाधड़ी से बचाने के लिए बनाया गया है। अगर आपको इस विषय के बारे में और जानकारी चाहिए तो आप आज ही हमारे किसी अनुभवी वकील से संपर्क कर सकते हैं।

बीएनएस धारा 320 क्या है |

BNS Section 320

लेनदारों के बीच वितरण को रोकने के लिए संपत्ति को बेईमानी से या धोखाधड़ी से हटाना या छिपाना

         जो कोई बेईमानी से या धोखाधड़ी से किसी भी संपत्ति को हटाता है, छिपाता है या किसी व्यक्ति को सौंपता है, या किसी भी संपत्ति को बिना पर्याप्त विचार के किसी भी व्यक्ति को हस्तांतरित करता है या हस्तांतरित करता है, जिससे उसे रोकने का इरादा होता है, या यह जानते हुए कि वह ऐसा होने से रोकेगा, उस संपत्ति को कानून के अनुसार अपने लेनदारों या किसी अन्य व्यक्ति के लेनदारों के बीच वितरित करने पर, किसी भी अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी, जो छह महीने से कम नहीं होगी, लेकिन जिसे दो साल तक बढ़ाया जा सकता है, या जुर्माना लगाया जाएगा। या दोनों के साथ.

 

error: Content is protected !!