LLB Notes Hindi - Law Study Material (Sem Wise)

Alternative Dispute Resolution System Short Answer

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर


प्रश्न 1: वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) क्या है?

उत्तर:
वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) एक ऐसी विधि है, जिसके माध्यम से विवादों को न्यायालय के बाहर प्रभावी, त्वरित और कम खर्चीले तरीके से सुलझाया जाता है। यह एक लचीली प्रक्रिया है, जिसमें पक्षकार आपसी सहमति से समाधान तक पहुँच सकते हैं।

मुख्य विशेषताएँ:

  1. अनौपचारिक प्रक्रिया: इसमें औपचारिक कानूनी प्रक्रियाओं की तुलना में कम जटिलता होती है।
  2. गोपनीयता: विवाद का समाधान गोपनीय रूप से किया जाता है।
  3. तेजी और किफायती: यह पारंपरिक अदालती प्रक्रिया की तुलना में तेज़ और कम खर्चीला होता है।
  4. अनुकूल समाधान: इसमें पक्षकार अपनी शर्तों पर विवाद सुलझाने के लिए स्वतंत्र होते हैं।

प्रश्न 2: ADR के प्रमुख प्रकार कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
ADR के चार प्रमुख प्रकार हैं:

  1. पंचाट (Arbitration):
    • इसमें एक स्वतंत्र पंच (Arbitrator) नियुक्त किया जाता है, जो दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर निर्णय देता है।
    • पंच का निर्णय (Award) बाध्यकारी होता है और इसे अदालत में लागू कराया जा सकता है।
  2. मध्यस्थता (Mediation):
    • इसमें एक तटस्थ मध्यस्थ (Mediator) दोनों पक्षों को समझौते तक पहुँचने में सहायता करता है।
    • मध्यस्थता का निर्णय बाध्यकारी नहीं होता; यह केवल एक परामर्श प्रक्रिया होती है।
  3. सुलह (Conciliation):
    • इसमें एक तटस्थ सुलहकर्ता (Conciliator) विवाद सुलझाने के लिए पक्षकारों के बीच बातचीत कराता है।
    • इसमें मध्यस्थता की तुलना में अधिक सक्रिय भूमिका निभाई जाती है।
  4. बातचीत (Negotiation):
    • इसमें दोनों पक्ष बिना किसी तटस्थ तीसरे पक्ष की सहायता के सीधे बातचीत करते हैं।
    • यह सबसे अनौपचारिक और लचीला तरीका होता है।

प्रश्न 3: पंचाट (Arbitration) और मध्यस्थता (Mediation) में क्या अंतर है?

उत्तर:

  1. निर्णय की बाध्यता:
    • पंचाट में पंच का निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है।
    • मध्यस्थता में मध्यस्थ केवल सुझाव देता है; उसका निर्णय बाध्यकारी नहीं होता।
  2. भूमिका:
    • पंचाट में पंच न्यायाधीश की तरह कार्य करता है।
    • मध्यस्थता में मध्यस्थ केवल वार्ता को सुविधाजनक बनाता है।
  3. लचीलेपन की सीमा:
    • पंचाट में प्रक्रिया न्यायालय जैसी औपचारिक होती है।
    • मध्यस्थता अधिक लचीली और अनौपचारिक होती है।
  4. खर्च और समय:
    • पंचाट अधिक महंगा और लंबा हो सकता है।
    • मध्यस्थता अपेक्षाकृत तेज़ और किफायती होती है।

प्रश्न 4: भारत में ADR को लागू करने वाले प्रमुख कानून कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
भारत में ADR को लागू करने के लिए कई प्रमुख कानून बनाए गए हैं:

  1. पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996):
    • यह कानून भारत में पंचाट और सुलह की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
    • इसमें अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू पंचाट दोनों को शामिल किया गया है।
  2. सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (Civil Procedure Code, 1908):
    • इसकी धारा 89 में न्यायालय को विवादों को ADR के माध्यम से निपटाने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रावधान है।
  3. वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015):
    • इसमें वाणिज्यिक विवादों के लिए अनिवार्य मध्यस्थता का प्रावधान किया गया है।
  4. केंद्रीय लोक शिकायत निवारण और लोक सेवा वितरण अधिनियम, 2011:
    • यह अधिनियम सरकारी सेवाओं से संबंधित विवादों को ADR के माध्यम से सुलझाने में मदद करता है।

प्रश्न 5: ADR के क्या लाभ हैं?

उत्तर:

  1. समय की बचत:
    • अदालतों में मुकदमे सालों तक चलते हैं, जबकि ADR में विवाद जल्दी सुलझ जाता है।
  2. खर्च में कमी:
    • न्यायालय की प्रक्रिया महंगी होती है, जबकि ADR तुलनात्मक रूप से सस्ता होता है।
  3. गोपनीयता:
    • ADR की कार्यवाही गोपनीय होती है, जिससे पक्षकारों की प्रतिष्ठा बनी रहती है।
  4. अनुकूल समाधान:
    • इसमें पक्षकार अपने विवाद को अपनी शर्तों पर सुलझाने के लिए स्वतंत्र होते हैं।
  5. रिश्तों की रक्षा:
    • पारंपरिक मुकदमेबाजी में कटुता बढ़ सकती है, जबकि ADR के माध्यम से सौहार्दपूर्ण समाधान निकाला जा सकता है।

प्रश्न 6: ADR को भारत में लोकप्रिय बनाने के लिए क्या सुधार किए जा सकते हैं?

उत्तर:
ADR को अधिक प्रभावी और लोकप्रिय बनाने के लिए निम्नलिखित सुधार आवश्यक हैं:

  1. कानूनी ढांचे को मजबूत करना:
    • ADR कानूनों में संशोधन करके इसे और अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
  2. न्यायपालिका और वकीलों को प्रशिक्षण देना:
    • न्यायाधीशों और वकीलों को ADR की तकनीकों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
  3. जनता में जागरूकता बढ़ाना:
    • ADR के लाभों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाने चाहिए।
  4. तकनीकी नवाचार:
    • ऑनलाइन ADR प्लेटफार्म विकसित करके डिजिटल माध्यम से विवादों का समाधान किया जा सकता है।

प्रश्न 7: क्या ADR के निर्णयों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है?

उत्तर:
हाँ, ADR के कुछ निर्णयों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन यह केवल विशेष परिस्थितियों में संभव होता है।

  1. पंचाट (Arbitration) का निर्णय:
    • पंचाट का निर्णय अंतिम होता है, लेकिन यदि यह कानून के विरुद्ध है या पंच ने अनुचित व्यवहार किया है, तो इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
    • पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत पंचाट निर्णय को चुनौती दी जा सकती है।
  2. मध्यस्थता (Mediation) और सुलह (Conciliation):
    • क्योंकि मध्यस्थता और सुलह के निर्णय बाध्यकारी नहीं होते, इसलिए इन पर पुनर्विचार संभव होता है।
  3. अन्य कारण:
    • यदि ADR प्रक्रिया में धोखाधड़ी, अनुचित प्रभाव या पक्षपात साबित होता है, तो इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (8 से 15)


प्रश्न 8: पंचाट (Arbitration) की प्रक्रिया क्या होती है?

उत्तर:
पंचाट (Arbitration) एक वैकल्पिक विवाद समाधान प्रक्रिया है, जिसमें पक्षकार किसी विवाद को अदालत के बजाय एक स्वतंत्र पंच (Arbitrator) के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जो कानूनी रूप से बाध्यकारी निर्णय देता है। पंचाट की प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में संपन्न होती है:

1. पंचाट समझौता (Arbitration Agreement):

  • विवाद होने से पहले या बाद में दोनों पक्ष आपसी सहमति से पंचाट के लिए सहमत होते हैं।
  • यह समझौता लिखित रूप में होना आवश्यक है।

2. पंच की नियुक्ति (Appointment of Arbitrator):

  • पक्षकार आपसी सहमति से पंच नियुक्त कर सकते हैं।
  • यदि सहमति न बने, तो न्यायालय या किसी निर्दिष्ट प्राधिकरण द्वारा पंच की नियुक्ति की जाती है।

3. प्रारंभिक सुनवाई (Preliminary Hearing):

  • पंच दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर देता है।
  • आवश्यक दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं।

4. गवाही और साक्ष्य (Evidence & Witness Examination):

  • दोनों पक्ष अपने-अपने साक्ष्य और गवाहों को पेश करते हैं।
  • पंच उनके बयान और दस्तावेजों का मूल्यांकन करता है।

5. अंतिम बहस (Final Arguments):

  • दोनों पक्ष अपने तर्क और प्रतिवाद प्रस्तुत करते हैं।

6. पंचाट निर्णय (Arbitration Award):

  • पंच विवाद का निपटारा करते हुए अंतिम निर्णय (Award) जारी करता है।
  • यह निर्णय न्यायालय द्वारा लागू किया जा सकता है और कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है।

प्रश्न 9: पंचाट (Arbitration) के क्या लाभ और हानियाँ हैं?

उत्तर:

लाभ:

  1. तेजी से विवाद समाधान:
    • न्यायालय की तुलना में पंचाट प्रक्रिया अधिक तेज़ होती है।
  2. कम लागत:
    • यह अदालती मुकदमेबाजी से सस्ता होता है।
  3. गोपनीयता:
    • पंचाट प्रक्रिया गोपनीय होती है, जिससे व्यावसायिक प्रतिष्ठा बनी रहती है।
  4. विशेषज्ञता:
    • तकनीकी और व्यावसायिक मामलों में विशेषज्ञ पंच को नियुक्त किया जा सकता है।
  5. लचीली प्रक्रिया:
    • पक्षकार अपनी सुविधानुसार प्रक्रिया और नियम निर्धारित कर सकते हैं।

हानियाँ:

  1. न्यायिक पुनरीक्षण का अभाव:
    • पंचाट निर्णय को चुनौती देने के विकल्प सीमित होते हैं।
  2. खर्चिलापन (कुछ मामलों में):
    • यदि पंच उच्च विशेषज्ञता वाला हो, तो पंचाट लागत अधिक हो सकती है।
  3. निष्पक्षता का अभाव:
    • यदि पंच पक्षपाती हो, तो निष्पक्ष निर्णय संभव नहीं होता।
  4. परिसीमा (Limited Appeal):
    • एक बार पंचाट निर्णय हो जाने के बाद अपील के सीमित अवसर होते हैं।

प्रश्न 10: मध्यस्थता (Mediation) की प्रक्रिया क्या होती है?

उत्तर:
मध्यस्थता (Mediation) एक विवाद समाधान प्रक्रिया है, जिसमें एक तटस्थ व्यक्ति (मध्यस्थ) दोनों पक्षों को बातचीत के माध्यम से आपसी सहमति से समाधान खोजने में मदद करता है। इसकी प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में संपन्न होती है:

1. प्रारंभिक बैठक (Initial Meeting):

  • मध्यस्थ दोनों पक्षों से बातचीत करता है और विवाद की प्रकृति समझता है।

2. जानकारी संग्रह (Information Gathering):

  • दोनों पक्ष अपने-अपने दस्तावेज़ और तर्क प्रस्तुत करते हैं।

3. मुख्य मध्यस्थता सत्र (Mediation Session):

  • मध्यस्थ दोनों पक्षों को आमने-सामने बातचीत के लिए बुलाता है।
  • मध्यस्थ समाधान निकालने में मदद करता है, लेकिन कोई बाध्यकारी निर्णय नहीं देता।

4. समझौता (Settlement Agreement):

  • यदि दोनों पक्ष किसी समाधान पर सहमत होते हैं, तो एक समझौता पत्र तैयार किया जाता है।
  • यह समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता, जब तक कि इसे अदालत द्वारा अनुमोदित न किया जाए।

प्रश्न 11: सुलह (Conciliation) और मध्यस्थता (Mediation) में क्या अंतर है?

उत्तर:

  1. परिभाषा:
    • मध्यस्थता में मध्यस्थ एक तटस्थ भूमिका निभाता है और कोई निर्णय नहीं देता।
    • सुलह में सुलहकर्ता पक्षकारों को समाधान पर पहुँचने में अधिक सक्रिय रूप से मदद करता है।
  2. अनुभव:
    • सुलहकर्ता को सामान्यतः कानूनी या व्यावसायिक विशेषज्ञता होती है, जबकि मध्यस्थ केवल वार्ता में सहायक होता है।
  3. निर्णय की प्रकृति:
    • मध्यस्थता में कोई बाध्यकारी निर्णय नहीं होता।
    • सुलह में सुलहकर्ता का सुझाव अधिक प्रभावशाली होता है।

प्रश्न 12: भारत में ADR को बढ़ावा देने के लिए कौन-कौन से प्रयास किए गए हैं?

उत्तर:
भारत में ADR को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं, जिनमें शामिल हैं:

  1. पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996:
    • यह अधिनियम ADR की कानूनी प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है।
  2. न्यायालयों द्वारा ADR को प्रोत्साहन:
    • उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने कई निर्णयों में ADR के उपयोग को बढ़ावा दिया है।
  3. राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA):
    • यह संस्था गरीबों और जरूरतमंदों को ADR के माध्यम से निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करती है।
  4. व्यावसायिक विवादों में अनिवार्य मध्यस्थता:
    • वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 के तहत, कुछ मामलों में अनिवार्य मध्यस्थता लागू की गई है।

प्रश्न 13: वार्ता (Negotiation) क्या होती है और यह अन्य ADR तरीकों से कैसे भिन्न है?

उत्तर:
वार्ता (Negotiation) ADR का सबसे अनौपचारिक तरीका है, जिसमें दोनों पक्ष बिना किसी मध्यस्थ या पंच की सहायता के आपसी बातचीत के माध्यम से विवाद सुलझाने का प्रयास करते हैं।

वार्ता और अन्य ADR प्रक्रियाओं में अंतर:

  1. कोई तीसरा पक्ष नहीं:
    • वार्ता में कोई मध्यस्थ या पंच नहीं होता।
    • अन्य ADR प्रक्रियाओं में तटस्थ मध्यस्थ या पंच शामिल होते हैं।
  2. अत्यधिक लचीलापन:
    • वार्ता में पक्षकारों के पास पूरी स्वतंत्रता होती है।
  3. गोपनीयता:
    • वार्ता पूर्णतः गोपनीय होती है, जबकि पंचाट और मध्यस्थता में कभी-कभी कानूनी प्रक्रिया शामिल हो सकती है।

प्रश्न 14: ADR का उपयोग किन-किन क्षेत्रों में किया जाता है?

उत्तर:
ADR का उपयोग कई कानूनी और व्यावसायिक क्षेत्रों में किया जाता है, जैसे:

  1. व्यावसायिक विवाद (Commercial Disputes):
    • व्यापारिक अनुबंधों और लेन-देन संबंधी विवाद।
  2. नियोक्ता-कर्मचारी विवाद (Employer-Employee Disputes):
    • श्रम कानूनों और वेतन संबंधित विवादों में।
  3. पारिवारिक विवाद (Family Disputes):
    • विवाह, तलाक, संपत्ति विवाद आदि।
  4. बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights):
    • कॉपीराइट, पेटेंट और ट्रेडमार्क विवाद।
  5. संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय विवाद:
    • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति से जुड़े मामलों में।

प्रश्न 15: भारत में ADR का भविष्य क्या है?

उत्तर:
ADR भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। डिजिटल ADR, ऑनलाइन पंचाट और मध्यस्थता के माध्यम से यह प्रणाली और अधिक प्रभावी हो सकती है। न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते बोझ को कम करने और त्वरित न्याय प्रदान करने के लिए ADR का अधिकाधिक उपयोग किया जाना चाहिए।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (16 से 20)


प्रश्न 16: ADR और पारंपरिक न्यायिक प्रणाली (Traditional Court System) में क्या अंतर है?

उत्तर:
ADR और पारंपरिक न्यायिक प्रणाली में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं, जो निम्नलिखित हैं:

1. प्रक्रिया की प्रकृति:

  • ADR: यह अनौपचारिक और लचीली प्रक्रिया होती है, जिसमें पक्षकार बातचीत, मध्यस्थता, पंचाट आदि के माध्यम से विवाद का समाधान करते हैं।
  • न्यायालय: यह एक औपचारिक प्रक्रिया होती है, जिसमें साक्ष्य, गवाही और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है।

2. समय और लागत:

  • ADR: कम समय में और कम लागत में विवाद सुलझाया जा सकता है।
  • न्यायालय: मुकदमेबाजी लंबी और महंगी होती है।

3. निर्णय की बाध्यता:

  • ADR: मध्यस्थता और सुलह में निर्णय बाध्यकारी नहीं होता, लेकिन पंचाट में होता है।
  • न्यायालय: अदालत का निर्णय बाध्यकारी होता है।

4. गोपनीयता:

  • ADR: इसमें विवाद और निर्णय गोपनीय रहते हैं।
  • न्यायालय: न्यायालय की कार्यवाही सार्वजनिक होती है।

5. लचीलापन:

  • ADR: इसमें पक्षकार अपने हिसाब से समाधान की शर्तें तय कर सकते हैं।
  • न्यायालय: इसमें कानूनी नियमों का सख्ती से पालन किया जाता है।

प्रश्न 17: ADR में उपयोग होने वाले प्रमुख अधिनियम (Acts) कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
भारत में ADR की प्रक्रिया को कानूनी रूप से नियंत्रित करने वाले प्रमुख अधिनियम निम्नलिखित हैं:

1. पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996)

  • इस अधिनियम के तहत पंचाट और सुलह की प्रक्रियाओं को स्पष्ट किया गया है।
  • इसमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पंचाट से जुड़े नियमों को शामिल किया गया है।

2. कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987)

  • इस अधिनियम के तहत लोक अदालतों की स्थापना की गई है, जो ADR का एक महत्वपूर्ण अंग है।

3. वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015)

  • यह अधिनियम वाणिज्यिक मामलों में अनिवार्य मध्यस्थता को प्रोत्साहित करता है।

4. सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (Civil Procedure Code, 1908)

  • इसके अनुच्छेद 89 में न्यायालयों को विवादों को ADR के माध्यम से निपटाने का निर्देश दिया गया है।

प्रश्न 18: लोक अदालत (Lok Adalat) क्या है और यह कैसे कार्य करती है?

उत्तर:
लोक अदालत ADR का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जिसमें विवादों को शीघ्र और कम लागत में हल किया जाता है। लोक अदालत की प्रक्रिया निम्नलिखित होती है:

1. लोक अदालत का गठन:

  • राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर लोक अदालतें गठित की जाती हैं।

2. विवादों का चयन:

  • छोटे-मोटे अपराध, मोटर वाहन दुर्घटना दावे, पारिवारिक विवाद, भूमि विवाद आदि लोक अदालतों में निपटाए जाते हैं।

3. त्वरित निपटान:

  • पक्षकार सीधे सुलह वार्ता में भाग लेते हैं।
  • निर्णय दोनों पक्षों की सहमति से लिया जाता है।

4. निर्णय की बाध्यता:

  • लोक अदालत का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता है।
  • इसमें अपील का प्रावधान नहीं होता।

5. नि:शुल्क और सरल प्रक्रिया:

  • लोक अदालतों में कोई कोर्ट फीस नहीं होती और यह प्रक्रिया सरल होती है।

प्रश्न 19: अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान में ADR की क्या भूमिका है?

उत्तर:
ADR अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। निम्नलिखित क्षेत्रों में ADR का उपयोग किया जाता है:

1. अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवाद:

  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक पंचाट केंद्र (ICC) ADR का उपयोग करके व्यापार विवादों का निपटान करते हैं।

2. राजनयिक वार्ता:

  • विभिन्न देशों के बीच संधियों और समझौतों के तहत मध्यस्थता और वार्ता का उपयोग किया जाता है।

3. अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद:

  • अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद समाधान केंद्र (ICSID) ADR के माध्यम से निवेश से जुड़े विवादों का निपटान करता है।

4. समुद्री विवाद समाधान:

  • समुद्री पंचाट संस्थाएं (Maritime Arbitration Centers) समुद्री कानून से जुड़े विवादों का निपटान करती हैं।

5. मानवाधिकार विवाद:

  • संयुक्त राष्ट्र (UN) और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ADR के माध्यम से मानवाधिकार मामलों का समाधान करती हैं।

प्रश्न 20: ADR का भविष्य क्या है और इसे अधिक प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है?

उत्तर:
ADR भविष्य में और अधिक प्रभावी बन सकता है, यदि निम्नलिखित प्रयास किए जाएँ:

1. डिजिटल ADR का विकास:

  • ऑनलाइन मध्यस्थता (Online Mediation) और आभासी पंचाट (Virtual Arbitration) को बढ़ावा दिया जाए।
  • तकनीकी प्रगति का उपयोग करके तेज और पारदर्शी निर्णय लिए जाएँ।

2. कानूनी जागरूकता:

  • ADR को लेकर आम जनता, वकीलों और न्यायाधीशों के बीच जागरूकता बढ़ाई जाए।

3. न्यायालयों में ADR को बढ़ावा देना:

  • अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मामलों को पहले ADR के माध्यम से हल करने का प्रयास किया जाए।

4. ADR को अनिवार्य बनाना:

  • छोटे-मोटे मामलों में ADR को अनिवार्य करने से न्यायालयों का बोझ कम होगा।

5. अंतरराष्ट्रीय ADR संस्थानों के साथ सहयोग:

  • भारत को अंतरराष्ट्रीय ADR संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए ताकि वैश्विक स्तर पर ADR प्रणाली को मजबूत किया जा सके।

6. ADR विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाना:

  • पेशेवर मध्यस्थों और पंचों की संख्या बढ़ाई जाए और उन्हें उचित प्रशिक्षण दिया जाए।

ADR की बढ़ती भूमिका यह दर्शाती है कि यह पारंपरिक न्यायिक प्रणाली का एक प्रभावी विकल्प है, जिसे आधुनिक तकनीक और बेहतर कानूनी ढांचे के माध्यम से और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (16 से 20)


प्रश्न 16: ADR और पारंपरिक न्यायिक प्रणाली (Traditional Court System) में क्या अंतर है?

उत्तर:
ADR और पारंपरिक न्यायिक प्रणाली में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं, जो निम्नलिखित हैं:

1. प्रक्रिया की प्रकृति:

  • ADR: यह अनौपचारिक और लचीली प्रक्रिया होती है, जिसमें पक्षकार बातचीत, मध्यस्थता, पंचाट आदि के माध्यम से विवाद का समाधान करते हैं।
  • न्यायालय: यह एक औपचारिक प्रक्रिया होती है, जिसमें साक्ष्य, गवाही और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है।

2. समय और लागत:

  • ADR: कम समय में और कम लागत में विवाद सुलझाया जा सकता है।
  • न्यायालय: मुकदमेबाजी लंबी और महंगी होती है।

3. निर्णय की बाध्यता:

  • ADR: मध्यस्थता और सुलह में निर्णय बाध्यकारी नहीं होता, लेकिन पंचाट में होता है।
  • न्यायालय: अदालत का निर्णय बाध्यकारी होता है।

4. गोपनीयता:

  • ADR: इसमें विवाद और निर्णय गोपनीय रहते हैं।
  • न्यायालय: न्यायालय की कार्यवाही सार्वजनिक होती है।

5. लचीलापन:

  • ADR: इसमें पक्षकार अपने हिसाब से समाधान की शर्तें तय कर सकते हैं।
  • न्यायालय: इसमें कानूनी नियमों का सख्ती से पालन किया जाता है।

प्रश्न 17: ADR में उपयोग होने वाले प्रमुख अधिनियम (Acts) कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
भारत में ADR की प्रक्रिया को कानूनी रूप से नियंत्रित करने वाले प्रमुख अधिनियम निम्नलिखित हैं:

1. पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996)

  • इस अधिनियम के तहत पंचाट और सुलह की प्रक्रियाओं को स्पष्ट किया गया है।
  • इसमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पंचाट से जुड़े नियमों को शामिल किया गया है।

2. कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987)

  • इस अधिनियम के तहत लोक अदालतों की स्थापना की गई है, जो ADR का एक महत्वपूर्ण अंग है।

3. वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015)

  • यह अधिनियम वाणिज्यिक मामलों में अनिवार्य मध्यस्थता को प्रोत्साहित करता है।

4. सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (Civil Procedure Code, 1908)

  • इसके अनुच्छेद 89 में न्यायालयों को विवादों को ADR के माध्यम से निपटाने का निर्देश दिया गया है।

प्रश्न 18: लोक अदालत (Lok Adalat) क्या है और यह कैसे कार्य करती है?

उत्तर:
लोक अदालत ADR का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जिसमें विवादों को शीघ्र और कम लागत में हल किया जाता है। लोक अदालत की प्रक्रिया निम्नलिखित होती है:

1. लोक अदालत का गठन:

  • राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर लोक अदालतें गठित की जाती हैं।

2. विवादों का चयन:

  • छोटे-मोटे अपराध, मोटर वाहन दुर्घटना दावे, पारिवारिक विवाद, भूमि विवाद आदि लोक अदालतों में निपटाए जाते हैं।

3. त्वरित निपटान:

  • पक्षकार सीधे सुलह वार्ता में भाग लेते हैं।
  • निर्णय दोनों पक्षों की सहमति से लिया जाता है।

4. निर्णय की बाध्यता:

  • लोक अदालत का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता है।
  • इसमें अपील का प्रावधान नहीं होता।

5. नि:शुल्क और सरल प्रक्रिया:

  • लोक अदालतों में कोई कोर्ट फीस नहीं होती और यह प्रक्रिया सरल होती है।

प्रश्न 19: अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान में ADR की क्या भूमिका है?

उत्तर:
ADR अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। निम्नलिखित क्षेत्रों में ADR का उपयोग किया जाता है:

1. अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवाद:

  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक पंचाट केंद्र (ICC) ADR का उपयोग करके व्यापार विवादों का निपटान करते हैं।

2. राजनयिक वार्ता:

  • विभिन्न देशों के बीच संधियों और समझौतों के तहत मध्यस्थता और वार्ता का उपयोग किया जाता है।

3. अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद:

  • अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद समाधान केंद्र (ICSID) ADR के माध्यम से निवेश से जुड़े विवादों का निपटान करता है।

4. समुद्री विवाद समाधान:

  • समुद्री पंचाट संस्थाएं (Maritime Arbitration Centers) समुद्री कानून से जुड़े विवादों का निपटान करती हैं।

5. मानवाधिकार विवाद:

  • संयुक्त राष्ट्र (UN) और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ADR के माध्यम से मानवाधिकार मामलों का समाधान करती हैं।

प्रश्न 20: ADR का भविष्य क्या है और इसे अधिक प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है?

उत्तर:
ADR भविष्य में और अधिक प्रभावी बन सकता है, यदि निम्नलिखित प्रयास किए जाएँ:

1. डिजिटल ADR का विकास:

  • ऑनलाइन मध्यस्थता (Online Mediation) और आभासी पंचाट (Virtual Arbitration) को बढ़ावा दिया जाए।
  • तकनीकी प्रगति का उपयोग करके तेज और पारदर्शी निर्णय लिए जाएँ।

2. कानूनी जागरूकता:

  • ADR को लेकर आम जनता, वकीलों और न्यायाधीशों के बीच जागरूकता बढ़ाई जाए।

3. न्यायालयों में ADR को बढ़ावा देना:

  • अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मामलों को पहले ADR के माध्यम से हल करने का प्रयास किया जाए।

4. ADR को अनिवार्य बनाना:

  • छोटे-मोटे मामलों में ADR को अनिवार्य करने से न्यायालयों का बोझ कम होगा।

5. अंतरराष्ट्रीय ADR संस्थानों के साथ सहयोग:

  • भारत को अंतरराष्ट्रीय ADR संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए ताकि वैश्विक स्तर पर ADR प्रणाली को मजबूत किया जा सके।

6. ADR विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाना:

  • पेशेवर मध्यस्थों और पंचों की संख्या बढ़ाई जाए और उन्हें उचित प्रशिक्षण दिया जाए।

ADR की बढ़ती भूमिका यह दर्शाती है कि यह पारंपरिक न्यायिक प्रणाली का एक प्रभावी विकल्प है, जिसे आधुनिक तकनीक और बेहतर कानूनी ढांचे के माध्यम से और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (21 से 30)


प्रश्न 21: ADR के विभिन्न तरीकों में मध्यस्थता (Mediation) की क्या भूमिका है?

उत्तर:
मध्यस्थता (Mediation) ADR की एक महत्वपूर्ण विधि है, जिसमें एक तटस्थ व्यक्ति (मध्यस्थ) पक्षकारों के बीच संवाद स्थापित करता है और उन्हें पारस्परिक सहमति से विवाद सुलझाने में मदद करता है।

1. मध्यस्थता की प्रक्रिया:

  • एक निष्पक्ष मध्यस्थ दोनों पक्षों की बात सुनता है।
  • पक्षकारों को समझौता करने के लिए प्रेरित करता है।
  • मध्यस्थ किसी भी पक्ष पर निर्णय थोपता नहीं है, बल्कि समाधान सुझाता है।

2. मध्यस्थता के लाभ:

  • समय और लागत की बचत।
  • विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान।
  • कानूनी प्रक्रिया से बचाव और गोपनीयता सुनिश्चित।
  • पारस्परिक संबंधों को बनाए रखने में सहायक।

3. मध्यस्थता का कानूनी आधार:

  • भारत में पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 में मध्यस्थता की प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
  • वाणिज्यिक विवादों में मध्यस्थता का विशेष महत्व है।

प्रश्न 22: सुलह (Conciliation) और मध्यस्थता (Mediation) में क्या अंतर है?

उत्तर:
हालाँकि सुलह और मध्यस्थता दोनों ही ADR के अंग हैं, लेकिन इनमें कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं:

1. प्रक्रिया की प्रकृति:

  • मध्यस्थता: इसमें एक मध्यस्थ केवल पक्षकारों के बीच वार्ता कराता है और उन्हें समाधान सुझाता है।
  • सुलह: इसमें एक सुलहकर्ता पक्षकारों को सुलह के लिए सुझाव देने के साथ-साथ विवाद के निपटारे की शर्तें भी निर्धारित कर सकता है।

2. निर्णय की बाध्यता:

  • मध्यस्थता: मध्यस्थ का सुझाव बाध्यकारी नहीं होता।
  • सुलह: सुलहकर्ता द्वारा सुझाया गया समझौता अधिक औपचारिक और लागू करने योग्य हो सकता है।

3. कानूनी आधार:

  • मध्यस्थता: पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत आती है।
  • सुलह: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में भी इसका उल्लेख है।

प्रश्न 23: पंचाट (Arbitration) क्या है और इसकी विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर:
पंचाट (Arbitration) ADR का एक प्रमुख तरीका है, जिसमें विवाद को हल करने के लिए पक्षकार एक या अधिक पंचों (Arbitrators) को नियुक्त करते हैं, जो अंतिम और बाध्यकारी निर्णय देते हैं।

1. पंचाट की विशेषताएँ:

  • विवाद का समाधान न्यायालय के बाहर किया जाता है।
  • पंचों का निर्णय (Award) बाध्यकारी होता है।
  • प्रक्रिया गोपनीय और लचीली होती है।
  • न्यायालय की तुलना में इसमें कम समय और धन खर्च होता है।

2. पंचाट का कानूनी आधार:

  • पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 पंचाट की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 24: ADR में पंचाट के निर्णय (Arbitral Award) को कैसे लागू किया जाता है?

उत्तर:
ADR में पंचाट द्वारा दिए गए निर्णय को लागू करने की प्रक्रिया निम्नलिखित होती है:

1. न्यायालय द्वारा लागू कराना:

  • पंचाट का निर्णय अदालत में दाखिल किया जाता है।
  • न्यायालय इसकी वैधता की पुष्टि करने के बाद इसे लागू करने का आदेश देता है।

2. अपील और चुनौतियाँ:

  • पंचाट के निर्णय को केवल सीमित आधारों पर चुनौती दी जा सकती है, जैसे कि पक्षपात, अनुचित प्रक्रिया या सार्वजनिक नीति के विरुद्ध निर्णय।

3. अंतरराष्ट्रीय पंचाट निर्णय:

  • न्यूयॉर्क कन्वेंशन (1958) के तहत, भारत और अन्य देशों में अंतरराष्ट्रीय पंचाट निर्णयों को मान्यता दी जाती है।

प्रश्न 25: ADR में वार्ता (Negotiation) का क्या महत्व है?

उत्तर:
वार्ता (Negotiation) ADR का एक अनौपचारिक तरीका है, जिसमें पक्षकार सीधे चर्चा करके विवाद का समाधान करते हैं।

1. वार्ता के लाभ:

  • लागत-मुक्त और त्वरित समाधान।
  • पक्षकार अपनी शर्तों पर समझौता कर सकते हैं।
  • संबंधों को बनाए रखने में मदद मिलती है।

2. वार्ता का उपयोग:

  • व्यापारिक अनुबंधों में विवाद समाधान।
  • श्रम विवादों में समाधान।
  • पारिवारिक और संपत्ति विवादों में उपयोग।

प्रश्न 26: ऑनलाइन विवाद समाधान (Online Dispute Resolution – ODR) क्या है?

उत्तर:
ODR एक आधुनिक ADR पद्धति है, जिसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से विवादों का समाधान किया जाता है।

1. ODR की प्रक्रिया:

  • ऑनलाइन प्लेटफार्मों पर मध्यस्थता और पंचाट की सुनवाई।
  • ईमेल, वीडियो कॉल और चैट के माध्यम से वार्ता।

2. ODR के लाभ:

  • दूरस्थ विवाद समाधान की सुविधा।
  • तेज़ और लागत-कम प्रक्रिया।
  • तकनीकी साक्ष्यों का उपयोग।

3. ODR का कानूनी आधार:

  • आईटी अधिनियम, 2000 और पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत मान्यता प्राप्त।

प्रश्न 27: ADR का उपयोग किन प्रमुख क्षेत्रों में किया जाता है?

उत्तर:
ADR निम्नलिखित क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है:

  • वाणिज्यिक विवाद (व्यापार अनुबंध, बौद्धिक संपदा विवाद)।
  • नौकरी और श्रम विवाद (औद्योगिक विवाद, वेतन विवाद)।
  • पारिवारिक मामले (तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार)।
  • भूमि और संपत्ति विवाद (सीमांकन, पट्टा विवाद)।
  • उपभोक्ता विवाद (खराब उत्पाद, सेवा में खामी)।

प्रश्न 28: भारत में ADR को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?

उत्तर:
भारत सरकार ने ADR को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं:

  • लोक अदालतों की स्थापना।
  • पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 में सुधार।
  • व्यवसाय सुगमता (Ease of Doing Business) में सुधार के लिए वाणिज्यिक अदालतें।
  • ऑनलाइन विवाद समाधान को प्रोत्साहित करना।

प्रश्न 29: ADR में न्यायालयों की भूमिका क्या है?

उत्तर:
न्यायालय ADR को प्रोत्साहित करने और विवाद समाधान प्रक्रिया की निगरानी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • न्यायालय मामले को ADR के लिए भेज सकते हैं।
  • ADR के निर्णय को लागू करने का आदेश दे सकते हैं।
  • ADR में निष्पक्षता बनाए रखने में सहायता कर सकते हैं।

प्रश्न 30: ADR को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए क्या सुधार किए जा सकते हैं?

उत्तर:
ADR को प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित सुधार आवश्यक हैं:

  • मध्यस्थों और पंचों का बेहतर प्रशिक्षण।
  • डिजिटल ADR और ODR को बढ़ावा देना।
  • विधायी सुधार और ADR कानूनों को मजबूत करना।
  • सरकार और न्यायालयों द्वारा ADR को अधिक अनिवार्य बनाना।

ADR न्याय प्रणाली में एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है, यदि इसे सही दिशा में और बेहतर ढंग से लागू किया जाए।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (31 से 50)


प्रश्न 31: पंचाट (Arbitration) के कितने प्रकार होते हैं?

उत्तर:
पंचाट मुख्यतः दो प्रकार का होता है:

  1. संवैधानिक पंचाट (Statutory Arbitration) – जब किसी कानून के तहत विवाद को पंचाट में भेजा जाता है।
  2. संविदात्मक पंचाट (Contractual Arbitration) – जब दो पक्ष किसी अनुबंध के तहत स्वयं पंचाट को विवाद समाधान का माध्यम चुनते हैं।

इनके अतिरिक्त, पंचाट को निम्नलिखित रूपों में भी वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • अनौपचारिक पंचाट (Ad-hoc Arbitration)
  • संस्थागत पंचाट (Institutional Arbitration)
  • घरेलू पंचाट (Domestic Arbitration)
  • अंतरराष्ट्रीय पंचाट (International Arbitration)

प्रश्न 32: संस्थागत पंचाट (Institutional Arbitration) और अनौपचारिक पंचाट (Ad-hoc Arbitration) में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • संस्थागत पंचाट किसी विशेष संस्था जैसे भारतीय पंचाट परिषद (ICA) या अंतरराष्ट्रीय पंचाट परिषद (ICCA) द्वारा संचालित किया जाता है।
  • अनौपचारिक पंचाट में कोई पूर्व निर्धारित संस्था नहीं होती, बल्कि पक्षकार स्वयं पंच की नियुक्ति करते हैं।

संस्थागत पंचाट अधिक सुव्यवस्थित और विश्वसनीय होता है, जबकि अनौपचारिक पंचाट अधिक लचीला और कम खर्चीला होता है।


प्रश्न 33: अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ADR का क्या महत्व है?

उत्तर:
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ADR विवादों को शीघ्र और प्रभावी ढंग से सुलझाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके लाभ हैं:

  • विभिन्न न्यायिक प्रणालियों से बचाव।
  • गोपनीयता बनाए रखना।
  • त्वरित और प्रभावी समाधान।
  • व्यापारिक संबंधों को बनाए रखना।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अधिकतर विवादों का समाधान न्यूयॉर्क कन्वेंशन, 1958 के तहत किया जाता है।


प्रश्न 34: पंचाट न्यायालय (Arbitral Tribunal) की संरचना क्या होती है?

उत्तर:
पंचाट न्यायालय में एक या अधिक पंच होते हैं, जिन्हें पक्षकारों की सहमति से नियुक्त किया जाता है।

  • यदि पक्षकार एक पंच नियुक्त करने में असमर्थ होते हैं, तो न्यायालय पंच की नियुक्ति कर सकता है।
  • पंचाट न्यायालय स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए।
  • पंचाट न्यायालय का निर्णय बाध्यकारी होता है।

प्रश्न 35: पंचाट पुरस्कार (Arbitral Award) को कब और कैसे चुनौती दी जा सकती है?

उत्तर:
पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत पंचाट पुरस्कार को निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी जा सकती है:

  • पक्षपातपूर्ण निर्णय।
  • सार्वजनिक नीति के विरुद्ध निर्णय।
  • पंचाट प्रक्रिया में गड़बड़ी।
  • अनुबंध के बाहर जाकर निर्णय देना।

चुनौती देने के लिए पक्षकार को न्यायालय में अपील करनी होती है।


प्रश्न 36: मध्यस्थता (Mediation) में कौन-कौन भाग ले सकता है?

उत्तर:
मध्यस्थता में निम्नलिखित भाग ले सकते हैं:

  • विवाद के दोनों पक्ष।
  • एक तटस्थ मध्यस्थ।
  • अधिवक्ता (यदि आवश्यक हो)।

मध्यस्थ की भूमिका केवल संवाद स्थापित करना और समाधान सुझाना होता है।


प्रश्न 37: लोक अदालत (Lok Adalat) क्या है?

उत्तर:
लोक अदालत ADR का एक महत्वपूर्ण रूप है, जिसमें विवादों का निपटारा त्वरित और बिना किसी शुल्क के किया जाता है।

  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत लोक अदालतों की स्थापना की गई।
  • लोक अदालत में पारित निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता है।
  • इसमें अपील की कोई गुंजाइश नहीं होती।

प्रश्न 38: उपभोक्ता विवादों के समाधान में ADR की भूमिका क्या है?

उत्तर:
ADR उपभोक्ता विवादों को शीघ्र और लागत-कम तरीके से हल करने में सहायक है।

  • उपभोक्ता अदालतों में मध्यस्थता और सुलह का प्रयोग किया जाता है।
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत ADR को बढ़ावा दिया गया है।
  • इससे न्यायिक बोझ कम होता है और उपभोक्ताओं को त्वरित न्याय मिलता है।

प्रश्न 39: पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर:
इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ हैं:

  • पंचाट की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना।
  • संस्थागत और अनौपचारिक पंचाट को मान्यता देना।
  • पंचाट पुरस्कार को न्यायालय में लागू करने की प्रक्रिया निर्धारित करना।
  • अंतरराष्ट्रीय पंचाट को मान्यता देना।

प्रश्न 40: ADR का न्यायिक प्रणाली पर क्या प्रभाव पड़ा है?

उत्तर:
ADR के कारण न्यायालयों का बोझ कम हुआ है और विवादों का शीघ्र समाधान हो रहा है।

  • लंबित मामलों में कमी आई है।
  • न्याय प्रक्रिया सरल हुई है।
  • लोगों को शीघ्र और सस्ता न्याय मिल रहा है।

प्रश्न 41: सुलह (Conciliation) किन मामलों में उपयोगी होती है?

उत्तर:
सुलह निम्नलिखित मामलों में उपयोगी होती है:

  • व्यावसायिक अनुबंध विवाद।
  • श्रम विवाद।
  • परिवारिक विवाद।
  • भूमि और संपत्ति विवाद।

प्रश्न 42: पंचाट और सुलह के बीच क्या अंतर है?

उत्तर:

  • पंचाट में पंच निर्णय देता है, जो बाध्यकारी होता है।
  • सुलह में सुलहकर्ता समाधान सुझाता है, जो बाध्यकारी नहीं होता।

प्रश्न 43: मध्यस्थता और पंचाट में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • मध्यस्थता में मध्यस्थ पक्षकारों को समझौते तक पहुँचने में सहायता करता है।
  • पंचाट में पंच अंतिम निर्णय सुनाता है।

प्रश्न 44: ADR के क्या सीमाएँ हैं?

उत्तर:

  • सभी विवाद ADR के तहत हल नहीं किए जा सकते।
  • पंचाट में पक्षपात की संभावना होती है।
  • समझौते के उल्लंघन की स्थिति में न्यायालय का सहारा लेना पड़ता है।

प्रश्न 45: भारत में ADR के कानूनी ढाँचे को कैसे मजबूत किया जा सकता है?

उत्तर:

  • ADR में अधिक पेशेवर विशेषज्ञों को शामिल करना।
  • ऑनलाइन ADR प्लेटफार्म विकसित करना।
  • कानूनी सुधार और पारदर्शिता बढ़ाना।

प्रश्न 46: क्या आपराधिक मामलों में ADR का उपयोग किया जा सकता है?

उत्तर:
आपराधिक मामलों में ADR का सीमित उपयोग होता है। केवल सौम्य अपराधों में समझौते के रूप में ADR का उपयोग किया जा सकता है।


प्रश्न 47: अंतरराष्ट्रीय पंचाट कैसे कार्य करता है?

उत्तर:
अंतरराष्ट्रीय पंचाट न्यूयॉर्क कन्वेंशन, 1958 के तहत संचालित होता है। इसमें विभिन्न देशों के पक्षकारों के विवादों का समाधान किया जाता है।


प्रश्न 48: भारत में ADR के लिए कौन-कौन से संस्थान कार्यरत हैं?

उत्तर:

  • भारतीय पंचाट परिषद (ICA)
  • दिल्ली अंतरराष्ट्रीय पंचाट केंद्र (DIAC)
  • मुंबई केंद्र पंचाट (MCIA)

प्रश्न 49: क्या ADR का निर्णय न्यायालय में लागू किया जा सकता है?

उत्तर:
हाँ, ADR के निर्णयों को न्यायालय में लागू किया जा सकता है, विशेषकर पंचाट और लोक अदालतों के फैसलों को।


प्रश्न 50: ADR न्यायपालिका के लिए क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
ADR न्यायपालिका पर बोझ कम करता है और त्वरित, प्रभावी और सस्ता न्याय प्रदान करता है।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (51 से 60)


प्रश्न 51: क्या ADR न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन होता है?

उत्तर:
हाँ, ADR न्यायिक समीक्षा के अधीन होता है, लेकिन इसकी सीमाएँ होती हैं। न्यायालय केवल निम्नलिखित परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर सकता है:

  • यदि पंचाट या सुलह की प्रक्रिया में किसी प्रकार की गड़बड़ी हुई हो।
  • यदि निर्णय सार्वजनिक नीति के खिलाफ हो।
  • यदि न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया हो।
  • यदि पंचाट का निर्णय पक्षपातपूर्ण हो या किसी अनुचित तरीके से पारित किया गया हो।

भारत में, पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत पंचाट पुरस्कार को चुनौती दी जा सकती है।


प्रश्न 52: पंचाट न्यायालय (Arbitral Tribunal) का क्षेत्राधिकार कैसे निर्धारित किया जाता है?

उत्तर:
पंचाट न्यायालय का क्षेत्राधिकार निम्नलिखित आधारों पर निर्धारित किया जाता है:

  • अनुबंध (Contractual Agreement): यदि पक्षकारों ने किसी अनुबंध में पंचाट के लिए सहमति दी हो।
  • कानूनी प्रावधान (Statutory Provisions): कुछ मामलों में, कानून स्वयं पंचाट प्रक्रिया को अनिवार्य बनाता है, जैसे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
  • न्यायालय का हस्तक्षेप (Judicial Intervention): यदि पक्षकारों के बीच विवाद हो कि पंचाट होना चाहिए या नहीं, तो न्यायालय निर्णय कर सकता है।

यदि पक्षकारों के बीच विवाद उत्पन्न होता है कि पंचाट न्यायालय का क्षेत्राधिकार है या नहीं, तो पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 16 के तहत इसे निर्धारित किया जाता है।


प्रश्न 53: पंचाट निर्णय (Arbitral Award) को लागू करने की प्रक्रिया क्या है?

उत्तर:
पंचाट निर्णय को लागू करने की प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में होती है:

  1. निर्णय पारित होना: पंच या पंचाट न्यायालय द्वारा निर्णय सुनाया जाता है।
  2. न्यायालय में मान्यता: यदि कोई पक्ष निर्णय को लागू करने से इंकार करता है, तो विजेता पक्ष न्यायालय में इसे लागू करने के लिए आवेदन कर सकता है।
  3. न्यायालय का आदेश: यदि पंचाट निर्णय मान्य पाया जाता है, तो इसे अदालत द्वारा लागू किया जाता है।
  4. संपत्ति कुर्की (Enforcement): यदि हारने वाला पक्ष निर्णय को लागू करने में असफल रहता है, तो अदालत उसकी संपत्ति कुर्क कर सकती है।

पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 36 में पंचाट निर्णय के प्रवर्तन का प्रावधान दिया गया है।


प्रश्न 54: ADR में ऑनलाइन विवाद समाधान (Online Dispute Resolution – ODR) क्या है?

उत्तर:
ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR) ADR की एक नवीनतम तकनीक-आधारित विधि है, जिसमें विवादों का समाधान ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से किया जाता है।
ODR में शामिल प्रक्रियाएँ हैं:

  • ई-मेल और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मध्यस्थता।
  • ऑनलाइन पंचाट प्रक्रिया।
  • डिजिटल दस्तावेज़ों का इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रस्तुत करना।

ODR विशेष रूप से ई-कॉमर्स, वित्तीय विवादों, और छोटे व्यापारिक विवादों के लिए उपयोगी है। भारत में, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) ODR को बढ़ावा दे रहा है।


प्रश्न 55: ADR प्रक्रिया के दौरान गोपनीयता (Confidentiality) कैसे बनाए रखी जाती है?

उत्तर:
ADR प्रक्रिया के दौरान गोपनीयता बनाए रखने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जाते हैं:

  • पंचाट और मध्यस्थता के दौरान पेश किए गए दस्तावेज़ और साक्ष्य गोपनीय रखे जाते हैं।
  • पक्षकारों और मध्यस्थों/पंचों को गोपनीयता बनाए रखने की शपथ दिलाई जाती है।
  • संवेदनशील जानकारी को सार्वजनिक करने पर दंड का प्रावधान होता है।
  • ADR का निर्णय केवल संबंधित पक्षकारों को ही प्रदान किया जाता है, जब तक कि कोई कानूनी बाध्यता न हो।

यह गोपनीयता ADR को पारंपरिक न्याय प्रणाली से अधिक आकर्षक बनाती है।


प्रश्न 56: पंचाट प्रक्रिया में ‘वीटो पावर’ क्या होती है?

उत्तर:
पंचाट प्रक्रिया में ‘वीटो पावर’ आमतौर पर पंचों को प्राप्त नहीं होती। हालाँकि, कुछ मामलों में, यदि पंच समिति में बहुमत का मत आवश्यक हो, तो एक पंच के मत का प्रभाव पूरे निर्णय को रोक सकता है।

इसके अतिरिक्त, यदि अनुबंध में किसी पक्षकार को विशेष अधिकार दिया गया हो कि वह किसी पंचाट निर्णय को अस्वीकार कर सकता है, तो इसे अप्रत्यक्ष वीटो कहा जा सकता है।


प्रश्न 57: क्या ADR के माध्यम से सरकारी विवादों को सुलझाया जा सकता है?

उत्तर:
हाँ, सरकार और सरकारी संस्थाएँ भी ADR का उपयोग कर सकती हैं, विशेषकर व्यावसायिक विवादों और अनुबंध-सम्बंधी मामलों में।

  • भारत में, सरकारी विवाद समाधान नियम, 2010 के तहत ADR का उपयोग किया जाता है।
  • सरकार पंचाट के माध्यम से ठेकेदारों और कंपनियों के साथ विवादों को हल कर सकती है।
  • भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय विवादों में भी ADR का प्रयोग किया जाता है।

हालाँकि, संवैधानिक मामलों या आपराधिक मामलों में सरकार ADR का उपयोग नहीं कर सकती।


प्रश्न 58: ADR के तहत सबसे अधिक उपयोग होने वाली विधियाँ कौन-कौन सी हैं?

उत्तर:
ADR के अंतर्गत निम्नलिखित विधियाँ सबसे अधिक उपयोग होती हैं:

  1. पंचाट (Arbitration): व्यावसायिक अनुबंधों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों में।
  2. मध्यस्थता (Mediation): पारिवारिक विवादों और संपत्ति विवादों में।
  3. सुलह (Conciliation): उपभोक्ता विवादों और श्रम विवादों में।
  4. लोक अदालत (Lok Adalat): छोटे आपराधिक मामलों और सिविल मामलों में।

प्रश्न 59: क्या ADR केवल सिविल मामलों तक सीमित है?

उत्तर:
मुख्य रूप से ADR का उपयोग सिविल मामलों में किया जाता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में इसे आपराधिक मामलों में भी लागू किया जा सकता है:

  • मामूली आपराधिक अपराधों में: जैसे चेक बाउंस, मानहानि, घरेलू हिंसा आदि।
  • पारिवारिक विवादों में: जैसे तलाक, भरण-पोषण, संपत्ति विवाद।
  • व्यावसायिक अपराधों में: जैसे कॉर्पोरेट धोखाधड़ी, अनुबंध उल्लंघन।

हालाँकि, हत्या, बलात्कार, देशद्रोह, और अन्य गंभीर अपराधों के मामलों में ADR की अनुमति नहीं होती।


प्रश्न 60: भारत में ADR के भविष्य की संभावनाएँ क्या हैं?

उत्तर:
भारत में ADR का भविष्य उज्ज्वल है, क्योंकि यह न्यायपालिका के भार को कम करने में सहायक है।

  • ऑनलाइन ADR प्लेटफार्मों का विकास।
  • वाणिज्यिक और कॉर्पोरेट विवादों में ADR का व्यापक उपयोग।
  • सरकारी विवादों को हल करने के लिए ADR को कानूनी समर्थन।
  • वैश्विक स्तर पर भारत को ADR केंद्र के रूप में विकसित करना।

सरकार और न्यायपालिका ADR को प्रोत्साहित कर रही है, जिससे भविष्य में यह न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग बन सकता है।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (61 से 70)


प्रश्न 61: मध्यस्थता (Mediation) और सुलह (Conciliation) में क्या अंतर है?

उत्तर:
मध्यस्थता (Mediation) और सुलह (Conciliation) दोनों ही ADR की विधियाँ हैं, लेकिन इनमें कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं:

  1. भूमिका:
    • मध्यस्थ (Mediator) केवल पक्षकारों के बीच बातचीत को सुगम बनाता है और किसी निर्णय का प्रस्ताव नहीं देता।
    • सुलहकर्ता (Conciliator) विवाद सुलझाने के लिए समाधान प्रस्तावित कर सकता है।
  2. प्रक्रिया:
    • मध्यस्थता अनौपचारिक होती है, और इसमें पक्षकार अधिक स्वतंत्रता रखते हैं।
    • सुलह प्रक्रिया में सुलहकर्ता एक निष्कर्ष निकाल सकता है, जिसे पक्षकार स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
  3. विधिक प्रभाव:
    • मध्यस्थता का निर्णय केवल पक्षकारों की सहमति से ही लागू किया जाता है।
    • सुलह का निर्णय अक्सर पंचाट की तरह बाध्यकारी नहीं होता, लेकिन यदि पक्षकार इसे स्वीकार कर लेते हैं, तो यह बाध्यकारी हो सकता है।

प्रश्न 62: ADR प्रक्रिया में न्यायालय की भूमिका क्या होती है?

उत्तर:
हालाँकि ADR एक न्यायालय से बाहर का समाधान है, लेकिन न्यायालय की इसमें कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ होती हैं:

  1. ADR प्रक्रिया का समर्थन:
    • न्यायालय पक्षकारों को ADR अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
  2. पंचाट न्यायालय की नियुक्ति:
    • यदि पक्षकारों में सहमति न बने, तो न्यायालय पंच नियुक्त कर सकता है।
  3. पंचाट निर्णय की समीक्षा:
    • यदि निर्णय में किसी प्रकार की अनियमितता हो, तो न्यायालय इसे रद्द कर सकता है।
  4. निष्पादन (Enforcement):
    • न्यायालय ADR के तहत हुए समझौतों और पंचाट निर्णयों को लागू करने में सहायता करता है।

ADR को कानूनी रूप से अधिक प्रभावी बनाने के लिए न्यायालय की भूमिका आवश्यक होती है।


प्रश्न 63: ADR प्रक्रिया का सबसे अधिक उपयोग किन विवादों में किया जाता है?

उत्तर:
ADR का उपयोग विभिन्न प्रकार के विवादों में किया जाता है, जिनमें प्रमुख हैं:

  1. व्यावसायिक विवाद: अनुबंध उल्लंघन, व्यापारिक सौदे।
  2. श्रम विवाद: कंपनी और कर्मचारियों के बीच विवाद।
  3. पारिवारिक विवाद: तलाक, भरण-पोषण, संपत्ति विवाद।
  4. उपभोक्ता विवाद: दोषपूर्ण उत्पाद या सेवाओं से जुड़ी शिकायतें।
  5. बैंकिंग और वित्तीय विवाद: ऋण, बीमा, निवेश विवाद।
  6. भूमि और संपत्ति विवाद: किरायेदारी, ज़मीन का स्वामित्व।
  7. अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवाद: सीमा-पार व्यापार समझौतों से जुड़े मामले।

ADR की बहुमुखी प्रकृति इसे कई कानूनी क्षेत्रों में उपयोगी बनाती है।


प्रश्न 64: क्या ADR प्रक्रिया में कानूनी प्रतिनिधि (Lawyer) की आवश्यकता होती है?

उत्तर:
ADR में कानूनी प्रतिनिधि की आवश्यकता अनिवार्य नहीं होती, लेकिन जटिल मामलों में यह उपयोगी हो सकता है।

  1. जहाँ वकील आवश्यक नहीं:
    • छोटे पारिवारिक विवाद
    • छोटे उपभोक्ता विवाद
    • श्रम विवाद
  2. जहाँ वकील सहायक होते हैं:
    • बड़े व्यावसायिक विवाद
    • अंतरराष्ट्रीय पंचाट
    • जटिल संपत्ति विवाद

हालाँकि ADR को सरल और सुलभ बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है, लेकिन वकीलों की सहायता से प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है।


प्रश्न 65: भारत में ADR को बढ़ावा देने के लिए कौन-कौन से कानूनी प्रावधान हैं?

उत्तर:
भारत में ADR को बढ़ावा देने के लिए कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं:

  1. पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 – पंचाट और सुलह की प्रक्रिया को विनियमित करता है।
  2. सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (संशोधित धारा 89) – अदालतों को ADR के माध्यम से मामले निपटाने की अनुमति देता है।
  3. लोक अदालत अधिनियम, 1987 – लोक अदालतों की स्थापना और उनके निर्णयों की मान्यता।
  4. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 – उपभोक्ता विवादों के समाधान के लिए ADR का उपयोग।
  5. व्यावसायिक न्यायालय अधिनियम, 2015 – व्यापारिक विवादों में ADR का उपयोग प्रोत्साहित करता है।

इन प्रावधानों के माध्यम से ADR को कानूनी रूप से मान्यता और समर्थन प्राप्त हुआ है।


प्रश्न 66: क्या ADR प्रक्रिया की अपील (Appeal) की जा सकती है?

उत्तर:
ADR के विभिन्न रूपों में अपील की संभावनाएँ अलग-अलग होती हैं:

  1. पंचाट:
    • अपील केवल सीमित आधारों पर की जा सकती है (जैसे, निर्णय अवैध हो या प्रक्रिया में अनियमितता हो)।
    • पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
  2. मध्यस्थता और सुलह:
    • इन विधियों में अपील की संभावना कम होती है, क्योंकि समझौते आमतौर पर स्वैच्छिक होते हैं।
  3. लोक अदालत:
    • लोक अदालत के फैसले अंतिम होते हैं और उनके खिलाफ अपील नहीं की जा सकती।

इसलिए, ADR प्रक्रिया की अपील केवल विशेष परिस्थितियों में ही की जा सकती है।


प्रश्न 67: भारत में पंचाट (Arbitration) की प्रमुख संस्थाएँ कौन-सी हैं?

उत्तर:
भारत में पंचाट (Arbitration) के लिए कई प्रमुख संस्थाएँ कार्यरत हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  1. इंटरनेशनल सेंटर फॉर अल्टरनेटिव डिस्प्यूट रिजोल्यूशन (ICADR) – भारत सरकार द्वारा समर्थित प्रमुख पंचाट संस्था।
  2. दिल्ली इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर (DIAC) – दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा संचालित।
  3. मुंबई सेंटर फॉर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन (MCIA) – अंतरराष्ट्रीय पंचाट के लिए एक प्रमुख संस्थान।
  4. इंडियन काउंसिल ऑफ आर्बिट्रेशन (ICA) – व्यावसायिक विवादों को हल करने में सहायक।

ये संस्थाएँ ADR की प्रक्रिया को व्यवस्थित और कुशल बनाती हैं।


प्रश्न 68: क्या ADR प्रक्रिया का उपयोग सीमा-पार (Cross-border) विवादों में किया जा सकता है?

उत्तर:
हाँ, ADR प्रक्रिया का उपयोग सीमा-पार विवादों में किया जाता है, विशेषकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और व्यावसायिक विवादों में।

  1. संयुक्त राष्ट्र पंचाट मॉडल कानून (UNCITRAL) – कई देशों में पंचाट के लिए मानक दिशानिर्देश प्रदान करता है।
  2. न्यूयॉर्क कन्वेंशन, 1958 – अंतरराष्ट्रीय पंचाट निर्णयों को लागू करने के लिए वैश्विक मान्यता प्रदान करता है।
  3. विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ – सीमा-पार निवेश विवादों में ADR का उपयोग करती हैं।

सीमा-पार विवादों के समाधान में ADR एक प्रभावी और विश्वसनीय विधि है।


प्रश्न 69: क्या ADR प्रक्रिया को डिजिटल किया जा सकता है?

उत्तर:
हाँ, ADR को डिजिटल रूप से संचालित किया जा सकता है, जिसे ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR) कहा जाता है।

  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मध्यस्थता।
  • ऑनलाइन दस्तावेज़ीकरण और इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर।
  • डिजिटल प्रमाण और गवाहों की रिकॉर्डिंग।

COVID-19 के बाद ODR को वैश्विक स्तर पर अधिक मान्यता मिली है।


प्रश्न 70: ADR की सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?

उत्तर:
ADR की प्रमुख चुनौतियाँ हैं:

  1. कानूनी जागरूकता की कमी।
  2. कुछ मामलों में कानूनी मान्यता की अनिश्चितता।
  3. पेशेवर मध्यस्थों और पंचों की कमी।
  4. संभावित पक्षपात और अनुचित प्रभाव।

इन चुनौतियों को दूर करने के लिए ADR प्रणाली में सुधार आवश्यक है।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (71 से 80)


प्रश्न 71: ADR में गोपनीयता (Confidentiality) का क्या महत्व है?

उत्तर:
ADR प्रक्रिया में गोपनीयता एक महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि यह पक्षकारों को खुलकर अपनी बात रखने और समाधान तक पहुँचने में मदद करता है। गोपनीयता का महत्व निम्नलिखित कारणों से है:

  1. पक्षकारों की सुरक्षा: संवेदनशील सूचनाएँ सार्वजनिक नहीं होतीं, जिससे उनकी प्रतिष्ठा और व्यवसाय सुरक्षित रहता है।
  2. खुले संचार को बढ़ावा: पक्षकार बिना किसी डर के अपनी बात रख सकते हैं।
  3. न्यायिक प्रक्रिया से अलग: अदालती मामलों के विपरीत, ADR प्रक्रिया में सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं बनाए जाते।
  4. व्यापारिक मामलों में फायदेमंद: कंपनियों के व्यापारिक रहस्य सुरक्षित रहते हैं।

मध्यस्थता (Mediation) और सुलह (Conciliation) में गोपनीयता अधिक होती है, जबकि पंचाट (Arbitration) में यह पक्षकारों के समझौते पर निर्भर करती है।


प्रश्न 72: ADR में निष्पक्षता (Impartiality) सुनिश्चित करने के लिए क्या उपाय किए जाते हैं?

उत्तर:
ADR में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं:

  1. स्वतंत्र और निष्पक्ष तटस्थ (Neutral) का चयन: मध्यस्थ, सुलहकर्ता या पंच को पक्षपात से बचना होता है।
  2. हितों का टकराव (Conflict of Interest) से बचाव: ADR अधिकारी को किसी भी निजी संबंध या हित को प्रकट करना होता है।
  3. स्पष्ट प्रक्रिया: सभी पक्षों को समान अवसर दिया जाता है।
  4. निष्पक्ष निर्णय: पंचाट में न्यायसंगत कानूनी सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
  5. न्यायालय की समीक्षा: यदि पक्षपात होता है, तो न्यायालय में अपील की जा सकती है।

इन उपायों से ADR प्रक्रिया निष्पक्ष और विश्वसनीय बनी रहती है।


प्रश्न 73: भारत में ADR के भविष्य की संभावनाएँ क्या हैं?

उत्तर:
भारत में ADR की संभावनाएँ उज्ज्वल हैं, क्योंकि यह न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते बोझ को कम करने में सहायक है। भविष्य में:

  1. डिजिटल ADR (ODR) का विकास: ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR) का अधिक उपयोग होगा।
  2. विधिक सुधार: ADR कानूनों को और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा।
  3. व्यापार और कॉर्पोरेट सेक्टर में वृद्धि: व्यावसायिक विवादों के समाधान के लिए ADR को प्राथमिकता मिलेगी।
  4. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता: भारत में अंतरराष्ट्रीय पंचाट केंद्रों की स्थापना होगी।
  5. सरकारी विवादों का निपटारा: सरकार अपने विवादों को हल करने के लिए ADR को बढ़ावा दे सकती है।

ADR की बढ़ती लोकप्रियता इसे भारतीय न्याय प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रही है।


प्रश्न 74: पंचाट निर्णय को लागू (Enforcement) करने की प्रक्रिया क्या है?

उत्तर:
भारत में पंचाट निर्णय को लागू करने की प्रक्रिया निम्नलिखित है:

  1. घरेलू पंचाट निर्णय (Domestic Arbitration Awards):
    • पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 36 के तहत न्यायालय में आवेदन करके लागू किया जाता है।
    • न्यायालय द्वारा निष्पादन (Execution) आदेश जारी किया जाता है।
  2. अंतरराष्ट्रीय पंचाट निर्णय (International Arbitration Awards):
    • न्यूयॉर्क कन्वेंशन और जिनेवा कन्वेंशन के तहत लागू किया जाता है।
    • उच्च न्यायालय में आवेदन देकर इसे भारतीय न्यायालयों में मान्यता प्राप्त कराई जाती है।

यदि कोई पक्षकार पंचाट निर्णय को लागू करने से इनकार करता है, तो न्यायालय उसे बाध्य कर सकता है।


प्रश्न 75: ADR में लोक अदालत (Lok Adalat) की भूमिका क्या है?

उत्तर:
लोक अदालत ADR की एक महत्वपूर्ण विधि है, जो समाज में त्वरित और सस्ता न्याय प्रदान करती है। इसकी भूमिकाएँ निम्नलिखित हैं:

  1. मामलों का शीघ्र समाधान: लंबित और नए मामलों को जल्दी निपटाने में सहायक।
  2. कम लागत: कोई अदालती शुल्क नहीं लगता और यदि मामला सुलझ जाता है, तो अदालत शुल्क भी वापस कर दिया जाता है।
  3. सुलहकारी दृष्टिकोण: विवाद समाधान के लिए सौहार्दपूर्ण तरीका अपनाया जाता है।
  4. निर्णय बाध्यकारी (Binding) होता है: लोक अदालत का निर्णय अंतिम होता है और इसके विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती।
  5. सामाजिक न्याय: गरीब और वंचित वर्ग के लोगों को न्याय दिलाने में मदद करता है।

लोक अदालतें विशेष रूप से छोटे मामलों जैसे पारिवारिक विवाद, मोटर दुर्घटना मुआवजा और श्रम विवाद के लिए प्रभावी होती हैं।


प्रश्न 76: क्या ADR प्रक्रिया को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन लाया जा सकता है?

उत्तर:
हाँ, ADR प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के अधीन होती है, लेकिन कुछ सीमित आधारों पर:

  1. यदि पंचाट न्यायालय की नियुक्ति में अनियमितता हो।
  2. यदि निर्णय धोखाधड़ी (Fraud) या पक्षपातपूर्ण (Biased) तरीके से दिया गया हो।
  3. यदि पंचाट न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय दिया हो।
  4. यदि निर्णय सार्वजनिक नीति (Public Policy) के विरुद्ध हो।
  5. यदि सुलह या मध्यस्थता प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव हो।

न्यायालय ADR के निर्णय को पूरी तरह से बदल नहीं सकता, लेकिन यदि कोई गंभीर त्रुटि हो, तो उसे रद्द कर सकता है।


प्रश्न 77: क्या आपराधिक मामलों में ADR का उपयोग किया जा सकता है?

उत्तर:
आपराधिक मामलों में ADR का सीमित उपयोग किया जाता है, क्योंकि इसमें सार्वजनिक हित (Public Interest) शामिल होता है।

  1. सुलह योग्य अपराध (Compoundable Offences): जैसे कि मानहानि, झगड़े, और विवाह से जुड़े अपराध।
  2. परिवारिक विवाद: पारिवारिक न्यायालय मध्यस्थता का उपयोग कर सकते हैं।
  3. किशोर न्याय प्रणाली: किशोर अपराधियों के मामलों में पुनर्वास (Rehabilitation) के लिए ADR अपनाया जाता है।
  4. पीड़ित-आरोपी पुनर्स्थापन (Victim-Offender Mediation): कुछ मामलों में समझौते के माध्यम से समाधान निकाला जाता है।

हालाँकि, गंभीर आपराधिक मामलों (जैसे हत्या, बलात्कार, और देशद्रोह) में ADR संभव नहीं होता।


प्रश्न 78: ADR के कौन-कौन से क्षेत्र अभी भी कम विकसित हैं?

उत्तर:
ADR अभी भी कुछ क्षेत्रों में सीमित रूप से विकसित हुआ है, जैसे:

  1. साइबर अपराध और डिजिटल विवाद।
  2. पर्यावरणीय विवाद।
  3. बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) से जुड़े विवाद।
  4. संविधानिक कानून से जुड़े मामले।
  5. सीमा विवाद और भूमि अधिग्रहण विवाद।

इन क्षेत्रों में ADR के प्रभावी उपयोग के लिए नए कानून और प्रक्रियाएँ विकसित की जानी चाहिए।


प्रश्न 79: क्या ADR न्यायिक प्रणाली का पूर्ण विकल्प बन सकता है?

उत्तर:
नहीं, ADR न्यायिक प्रणाली का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता, लेकिन यह न्यायिक प्रक्रिया का एक पूरक साधन है।

  1. गंभीर आपराधिक मामलों में ADR का उपयोग सीमित होता है।
  2. संवैधानिक और मौलिक अधिकारों से जुड़े मामलों के लिए न्यायालय आवश्यक होते हैं।
  3. यदि पक्षकारों में समझौता नहीं होता, तो अदालती हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है।

ADR अदालतों का कार्यभार कम करता है, लेकिन न्यायालयों का स्थान पूरी तरह से नहीं ले सकता।


प्रश्न 80: ADR को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?

उत्तर:
भारत सरकार ने ADR को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए हैं:

  1. पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 का अधिनियमन।
  2. लोक अदालतों का गठन।
  3. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पंचाट केंद्रों की स्थापना।
  4. डिजिटल ADR (ODR) को बढ़ावा देना।
  5. वाणिज्यिक विवादों में ADR को अनिवार्य करना।

इन प्रयासों से ADR प्रणाली को अधिक प्रभावी और लोकप्रिय बनाया गया है।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (81 से 90)


प्रश्न 81: ADR और पारंपरिक न्यायिक प्रणाली में मुख्य अंतर क्या हैं?

उत्तर:
ADR और पारंपरिक न्यायिक प्रणाली में निम्नलिखित मुख्य अंतर हैं:

  1. समय – न्यायालयों में मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं, जबकि ADR में विवाद का निपटारा जल्दी होता है।
  2. लागत – अदालत की तुलना में ADR प्रक्रिया सस्ती होती है।
  3. गोपनीयता – ADR में निर्णय निजी रहते हैं, जबकि न्यायालय में मुकदमे सार्वजनिक होते हैं।
  4. अनुकूलता – ADR में लचीलापन अधिक होता है, जबकि अदालत में कठोर कानूनी प्रक्रियाएँ होती हैं।
  5. निष्पादन – ADR के निर्णय आमतौर पर अदालत के फैसले की तरह बाध्यकारी नहीं होते, सिवाय पंचाट (Arbitration) के।

इस प्रकार, ADR अधिक लचीला और प्रभावी विवाद समाधान माध्यम प्रदान करता है।


प्रश्न 82: पंचाट न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) क्या होता है?

उत्तर:
पंचाट न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) वह निकाय होता है, जो पक्षकारों के बीच हुए विवाद को हल करने के लिए गठित किया जाता है। इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

  1. संरचना: इसमें एक या अधिक पंच (Arbitrators) हो सकते हैं।
  2. नियुक्ति: पक्षकार सहमति से पंचों का चयन कर सकते हैं या किसी संस्था से नियुक्त करवा सकते हैं।
  3. भूमिका: पंच प्रमाणों की समीक्षा कर निर्णय (Award) देते हैं।
  4. बाध्यकारी प्रभाव: पंचाट निर्णय कानूनी रूप से लागू किया जा सकता है।
  5. स्वतंत्रता: यह न्यायिक प्रणाली से अलग होकर तटस्थ रूप से काम करता है।

पंचाट न्यायाधिकरण वाणिज्यिक विवादों के समाधान के लिए एक प्रभावी साधन है।


प्रश्न 83: मध्यस्थता (Mediation) में मध्यस्थ (Mediator) की भूमिका क्या होती है?

उत्तर:
मध्यस्थ (Mediator) ADR प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग होता है, जिसकी भूमिका निम्नलिखित होती है:

  1. तटस्थ सुविधा प्रदाता: मध्यस्थ विवाद को हल करने में मदद करता है, लेकिन निर्णय नहीं देता।
  2. संचार को सुगम बनाना: दोनों पक्षों के बीच प्रभावी संवाद स्थापित करता है।
  3. समझौता कराने में मदद: विवाद के समाधान के लिए सहमति बनाने का प्रयास करता है।
  4. गोपनीयता बनाए रखना: सभी चर्चाएँ गोपनीय रखता है।
  5. कानूनी और व्यावसायिक सुझाव देना: पक्षकारों को वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करता है।

मध्यस्थ का कार्य निष्पक्ष रहकर एक समझौते की ओर दोनों पक्षों को मार्गदर्शित करना होता है।


प्रश्न 84: क्या ADR का उपयोग सरकारी मामलों के समाधान के लिए किया जा सकता है?

उत्तर:
हाँ, ADR का उपयोग सरकारी मामलों के समाधान के लिए किया जा सकता है, विशेषकर निम्नलिखित मामलों में:

  1. सरकारी अनुबंध विवाद: सरकार और निजी कंपनियों के बीच अनुबंध विवादों का समाधान।
  2. कर और राजस्व मामले: कर विभाग और करदाताओं के बीच सुलह।
  3. भूमि अधिग्रहण विवाद: लोक अदालतों के माध्यम से समाधान।
  4. नागरिक शिकायतें: लोकपाल (Ombudsman) के माध्यम से समाधान।
  5. सरकारी श्रमिक विवाद: श्रम विवादों को हल करने के लिए मध्यस्थता और सुलह प्रक्रिया का उपयोग।

ADR सरकार को प्रभावी और त्वरित न्यायिक समाधान प्रदान करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।


प्रश्न 85: ADR के तहत सुलह (Conciliation) और मध्यस्थता (Mediation) में क्या अंतर है?

उत्तर:
सुलह और मध्यस्थता में निम्नलिखित अंतर होते हैं:

  1. भूमिका – मध्यस्थ (Mediator) केवल पक्षकारों को समाधान खोजने में मदद करता है, जबकि सुलहकर्ता (Conciliator) समाधान सुझा सकता है।
  2. औपचारिकता – मध्यस्थता अनौपचारिक होती है, जबकि सुलह अधिक औपचारिक होती है।
  3. समझौते की स्थिति – सुलह प्रक्रिया में प्राप्त समझौते का कानूनी प्रभाव अधिक होता है।
  4. नियुक्ति – सुलहकर्ता को पक्षकार या किसी संस्था द्वारा नियुक्त किया जाता है, जबकि मध्यस्थता में पक्षकार खुद मध्यस्थ चुन सकते हैं।
  5. कानूनी आधार – सुलह भारतीय पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत विनियमित होती है, जबकि मध्यस्थता सामान्य रूप से अपनाई जाती है।

सुलह और मध्यस्थता दोनों ही विवाद समाधान के प्रभावी तरीके हैं।


प्रश्न 86: अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक विवादों में ADR की क्या भूमिका है?

उत्तर:
अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक विवादों में ADR की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह त्वरित और प्रभावी समाधान प्रदान करता है। इसकी प्रमुख भूमिकाएँ हैं:

  1. समय और लागत की बचत: अंतरराष्ट्रीय मुकदमों की तुलना में ADR सस्ता और तेज़ होता है।
  2. गोपनीयता: व्यापारिक मामलों में गोपनीयता बनी रहती है।
  3. निष्पक्षता: पंचाट और सुलह प्रक्रियाओं में तटस्थ तटस्थता बनाए रखी जाती है।
  4. क्रॉस-बॉर्डर लागू: न्यूयॉर्क कन्वेंशन और UNCITRAL मॉडल कानून के तहत पंचाट निर्णयों को लागू किया जा सकता है।
  5. व्यापार संबंधों को बनाए रखना: ADR व्यापारिक भागीदारों को आपसी संबंध बनाए रखने में मदद करता है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ADR एक प्रभावी समाधान उपकरण बन चुका है।


प्रश्न 87: क्या ADR का उपयोग श्रम विवादों (Labour Disputes) के समाधान के लिए किया जा सकता है?

उत्तर:
हाँ, श्रम विवादों के समाधान के लिए ADR का उपयोग किया जा सकता है, जैसे:

  1. मध्यस्थता और सुलह: श्रमिक और नियोक्ता के बीच समझौता करने के लिए।
  2. पंचाट: श्रमिकों और प्रबंधन के बीच विवादों के समाधान के लिए औद्योगिक पंचाट।
  3. लोक अदालतें: श्रम संबंधी मामलों को शीघ्रता से हल करने के लिए।
  4. श्रम न्यायाधिकरण: विशेष श्रम विवादों के समाधान के लिए।

ADR प्रक्रिया श्रमिक विवादों को शीघ्र और संतोषजनक रूप से हल करने में सहायक होती है।


प्रश्न 88: भारत में ADR को बढ़ावा देने के लिए कौन-कौन से संगठन कार्यरत हैं?

उत्तर:
भारत में ADR को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित संगठन कार्यरत हैं:

  1. भारतीय पंचाट परिषद (Indian Council of Arbitration – ICA)
  2. दिल्ली अंतरराष्ट्रीय पंचाट केंद्र (Delhi International Arbitration Centre – DIAC)
  3. मुंबई केंद्र पंचाट (Mumbai Centre for International Arbitration – MCIA)
  4. राष्ट्रीय विधि सेवा प्राधिकरण (NALSA) – लोक अदालतों के माध्यम से
  5. इंटरनेशनल सेंटर फॉर अल्टरनेटिव डिस्प्यूट रिजोल्यूशन (ICADR)

ये संस्थाएँ ADR को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न पहल करती हैं।


प्रश्न 89: क्या ADR प्रक्रिया में वकील की आवश्यकता होती है?

उत्तर:
ADR प्रक्रिया में वकील की आवश्यकता अनिवार्य नहीं होती, लेकिन जटिल मामलों में वकील की मदद ली जा सकती है। वकील की भूमिका:

  1. कानूनी सलाह देना।
  2. प्रक्रिया को समझने में सहायता करना।
  3. पक्षकार की ओर से वार्ता करना।
  4. समझौते को कानूनी रूप से तैयार करना।

ADR प्रक्रिया वकीलों के बिना भी प्रभावी हो सकती है, लेकिन जटिल मामलों में उनकी सहायता लाभकारी होती है।


प्रश्न 90: ADR प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने के लिए क्या सुधार किए जा सकते हैं?

उत्तर:
ADR को और प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित सुधार आवश्यक हैं:

  1. डिजिटल ADR को बढ़ावा देना।
  2. सभी स्तरों पर जागरूकता अभियान।
  3. न्यायालयों द्वारा अनिवार्य ADR प्रक्रिया।
  4. तेजी से लागू करने की प्रणाली विकसित करना।
  5. ADR केंद्रों की संख्या बढ़ाना।

ये सुधार ADR को अधिक लोकप्रिय और प्रभावी बना सकते हैं।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (91 से 100)


प्रश्न 91: ADR का उपयोग कर अपराध संबंधी मामलों को हल किया जा सकता है या नहीं?

उत्तर:
ADR का उपयोग मुख्य रूप से दीवानी (Civil) मामलों के समाधान के लिए किया जाता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में यह अपराध (Criminal) मामलों में भी उपयोगी हो सकता है।

  1. हल्के अपराध (Petty Offences): समझौते और मध्यस्थता के माध्यम से छोटे-मोटे अपराधों को हल किया जा सकता है।
  2. पारिवारिक विवाद: घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना, और विवाह संबंधी मामलों में ADR का उपयोग किया जा सकता है।
  3. समुदाय-आधारित समाधान: पंचायतें और लोक अदालतें आपराधिक मामलों के सामाजिक समाधान में मदद कर सकती हैं।
  4. सहमति-आधारित निपटान: कुछ अपराधों में अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष के बीच आपसी सहमति से समझौता किया जा सकता है।
  5. क्षतिपूर्ति आधारित समाधान: अपराध से प्रभावित व्यक्ति को मुआवजा दिलाने के लिए ADR का उपयोग किया जा सकता है।

हालांकि, गंभीर आपराधिक मामलों (जैसे हत्या, बलात्कार, या संगठित अपराध) में ADR की अनुमति नहीं होती।


प्रश्न 92: लोक अदालतों (Lok Adalats) की भूमिका और महत्व क्या है?

उत्तर:
लोक अदालतें ADR का एक प्रभावी रूप हैं, जो विवादों को त्वरित और कम लागत में हल करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम प्रदान करती हैं।

  1. भूमिका:
    • लोक अदालतें पक्षकारों के आपसी सहमति से विवादों का समाधान करती हैं।
    • इनमें कोई कठोर न्यायिक प्रक्रिया नहीं होती।
    • यह सुलह और वार्ता आधारित विधि पर कार्य करती हैं।
  2. महत्व:
    • तेजी से न्याय: मामलों का शीघ्र समाधान होता है।
    • कम लागत: कोई कोर्ट फीस नहीं होती।
    • गोपनीयता: विवाद का निपटारा सार्वजनिक रूप से नहीं किया जाता।
    • बाध्यकारी निर्णय: लोक अदालत में किया गया समझौता अंतिम और बाध्यकारी होता है।
    • मानव संसाधन की बचत: न्यायपालिका के बोझ को कम करती है।

लोक अदालतें विशेष रूप से छोटे दीवानी और आपराधिक मामलों के निपटारे के लिए उपयुक्त होती हैं।


प्रश्न 93: क्या ADR अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मामलों में प्रभावी हो सकता है?

उत्तर:
हाँ, ADR अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मामलों में प्रभावी हो सकता है, खासकर निम्नलिखित परिस्थितियों में:

  1. शरणार्थी विवादों का समाधान: शरणार्थियों और मेज़बान देशों के बीच संघर्षों को हल करने में मदद करता है।
  2. युद्ध अपराध समाधान: युद्ध के बाद पुनर्निर्माण और न्याय प्रक्रिया में ADR की भूमिका होती है।
  3. सांप्रदायिक और नस्लीय विवाद: ADR विभिन्न समुदायों के बीच शांति स्थापित करने में सहायक होता है।
  4. मानवाधिकार उल्लंघन पर वार्ता: सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के बीच बातचीत को सुगम बनाता है।
  5. सार्वजनिक क्षमा (Public Apology) और मुआवजा: पीड़ितों के लिए न्याय प्राप्ति में ADR सहायक हो सकता है।

हालांकि, मानवाधिकार के गंभीर उल्लंघन (जैसे नरसंहार) में ADR की सीमाएँ होती हैं।


प्रश्न 94: पंचाट (Arbitration) और सुलह (Conciliation) में क्या अंतर है?

उत्तर:
पंचाट और सुलह, दोनों ADR के रूप हैं, लेकिन इनमें मुख्यतः निम्नलिखित अंतर होते हैं:

  1. निर्णय का प्रकार:
    • पंचाट में पंच (Arbitrator) अंतिम और बाध्यकारी निर्णय देता है।
    • सुलह में सुलहकर्ता (Conciliator) केवल पक्षकारों के बीच समझौते का प्रयास करता है।
  2. प्रक्रिया की औपचारिकता:
    • पंचाट अधिक औपचारिक प्रक्रिया है।
    • सुलह में प्रक्रिया अधिक लचीली होती है।
  3. कानूनी प्रभाव:
    • पंचाट निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है।
    • सुलह में प्राप्त समाधान पक्षकारों की स्वेच्छा पर निर्भर करता है।
  4. सरकार द्वारा विनियमन:
    • पंचाट भारतीय पंचाट और सुलह अधिनियम, 1996 के अंतर्गत आता है।
    • सुलह भी इसी अधिनियम के तहत विनियमित होती है, लेकिन कम कठोरता के साथ।

पंचाट व्यापारिक मामलों में अधिक उपयुक्त होता है, जबकि सुलह आपसी विवादों के हल के लिए प्रभावी है।


प्रश्न 95: क्या ADR का उपयोग पर्यावरणीय विवादों के समाधान में किया जा सकता है?

उत्तर:
हाँ, ADR का उपयोग पर्यावरणीय विवादों के समाधान में किया जा सकता है। इसके प्रमुख लाभ हैं:

  1. समय और लागत की बचत: अदालतों में लंबित मामलों की तुलना में पर्यावरणीय विवादों का तेजी से समाधान।
  2. तकनीकी विशेषज्ञता: पर्यावरणीय पंचाट और मध्यस्थता में विशेषज्ञों की राय ली जा सकती है।
  3. संतुलित समाधान: विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में सहायक।
  4. सरकारी और निजी पक्षों की भागीदारी: सरकार, उद्योग, और स्थानीय समुदायों के बीच संवाद को बढ़ावा।

भारत में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) पर्यावरणीय मामलों के समाधान के लिए कार्यरत है।


प्रश्न 96: ADR में पार्टियों की स्वायत्तता (Party Autonomy) का क्या महत्व है?

उत्तर:
ADR में पार्टियों की स्वायत्तता (Party Autonomy) का बहुत अधिक महत्व है, क्योंकि:

  1. स्वतंत्र निर्णय: पक्षकार अपनी शर्तों के अनुसार विवाद सुलझा सकते हैं।
  2. मुक्ति कानूनी जटिलताओं से: पारंपरिक न्यायालय की कठोर प्रक्रियाओं से बचाव।
  3. पंचाटकर्ता या मध्यस्थ का चयन: पक्षकार अपनी पसंद के विशेषज्ञों का चयन कर सकते हैं।
  4. अनुकूल समाधान: पक्षकार अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान तय कर सकते हैं।

पार्टियों की स्वायत्तता ADR की प्रमुख विशेषताओं में से एक है।


प्रश्न 97: ADR का उपयोग संपत्ति विवादों (Property Disputes) में कैसे किया जा सकता है?

उत्तर:
ADR का उपयोग संपत्ति विवादों के समाधान में प्रभावी रूप से किया जा सकता है, जैसे:

  1. मध्यस्थता (Mediation): पारिवारिक संपत्ति विवादों का सौहार्दपूर्ण समाधान।
  2. पंचाट (Arbitration): वाणिज्यिक संपत्ति विवादों में अनुबंधित समाधान।
  3. सुलह (Conciliation): पक्षकारों के बीच आपसी सहमति से विवाद का हल।
  4. लोक अदालतें: छोटे संपत्ति विवादों का त्वरित निपटारा।

ADR संपत्ति विवादों को कानूनी मुकदमों से बचाने में मदद करता है।


प्रश्न 98: ADR से संबंधित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संधियाँ कौन-सी हैं?

उत्तर:
ADR से संबंधित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संधियाँ निम्नलिखित हैं:

  1. न्यूयॉर्क कन्वेंशन (1958): अंतरराष्ट्रीय पंचाट निर्णयों को लागू करने के लिए।
  2. UNCITRAL मॉडल लॉ (1985): अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों के लिए।
  3. ICSID कन्वेंशन (1965): निवेश विवादों के समाधान के लिए।

प्रश्न 99: ADR के बढ़ते उपयोग के क्या कारण हैं?

उत्तर:
ADR के बढ़ते उपयोग के मुख्य कारण हैं:

  1. न्यायालयों पर बढ़ता बोझ।
  2. तेजी से न्याय की आवश्यकता।
  3. कम लागत।
  4. गोपनीयता का संरक्षण।

प्रश्न 100: ADR का भविष्य क्या है?

उत्तर:
ADR का भविष्य उज्ज्वल है क्योंकि यह पारंपरिक न्याय प्रणाली का एक प्रभावी विकल्प बन रहा है। डिजिटल ADR, अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान, और विशेष पंचाट अधिक प्रचलित होते जा रहे हैं।

वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (101 से 110)


प्रश्न 101: अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों में ADR की भूमिका क्या है?

उत्तर:
अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों में ADR की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह व्यापारिक समझौतों में विवादों के शीघ्र और कुशल समाधान की सुविधा प्रदान करता है।

  1. सीमाओं से परे समाधान: ADR एक ऐसा मंच प्रदान करता है, जहां विभिन्न देशों के पक्षकार अपने विवादों को बिना राष्ट्रीय न्यायालयों के हल कर सकते हैं।
  2. गोपनीयता: व्यापारिक विवादों में संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
  3. लागत प्रभावी: पारंपरिक मुकदमेबाजी की तुलना में ADR अधिक किफायती है।
  4. पारस्परिक संबंधों का संरक्षण: व्यापारिक साझेदारों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने में सहायक।
  5. न्यूयॉर्क कन्वेंशन (1958): अंतरराष्ट्रीय पंचाट पुरस्कारों को लागू करने में सहायक।

इसलिए, ADR अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक विवादों के समाधान का एक पसंदीदा तरीका बन गया है।


प्रश्न 102: साइबर विवादों के समाधान में ADR की भूमिका क्या है?

उत्तर:
डिजिटल युग में साइबर विवादों के समाधान के लिए ADR एक प्रभावी साधन है।

  1. ऑनलाइन मध्यस्थता (Online Mediation): इंटरनेट आधारित विवादों को हल करने का एक तरीका।
  2. तेजी से समाधान: साइबर अपराध और अनुबंध विवादों को तेजी से हल किया जा सकता है।
  3. तकनीकी विशेषज्ञता: ADR के तहत विशेषज्ञ मध्यस्थ नियुक्त किए जा सकते हैं।
  4. कम लागत: साइबर विवादों के समाधान में पारंपरिक मुकदमेबाजी की तुलना में ADR कम खर्चीला होता है।
  5. अंतरराष्ट्रीय विवाद निपटान: साइबर अपराधों में विभिन्न देशों के कानून लागू होते हैं, ऐसे में ADR प्रभावी हो सकता है।

प्रश्न 103: क्या ADR का उपयोग श्रम विवादों के समाधान में किया जा सकता है?

उत्तर:
हाँ, ADR का उपयोग श्रम विवादों के समाधान में किया जा सकता है।

  1. मध्यस्थता (Mediation): कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच विवादों का समाधान।
  2. सुलह (Conciliation): सरकार द्वारा नियुक्त सुलह अधिकारियों की सहायता से श्रमिक विवादों का हल।
  3. पंचाट (Arbitration): श्रमिक संघों और नियोक्ताओं के बीच विवादों के लिए।
  4. लोक अदालतें: छोटे श्रम विवादों का त्वरित समाधान।

ADR के माध्यम से श्रम विवादों को कानूनी मुकदमों में जाने से पहले सुलझाया जा सकता है, जिससे श्रमिकों और उद्योगों दोनों को लाभ मिलता है।


प्रश्न 104: क्या ADR पारिवारिक कानून के मामलों में प्रभावी है?

उत्तर:
हाँ, ADR पारिवारिक विवादों को हल करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है, खासकर निम्नलिखित मामलों में:

  1. विवाह-विच्छेद (Divorce) और भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े विवाद।
  2. संपत्ति के बंटवारे के मामले।
  3. बच्चों की अभिरक्षा और भरण-पोषण से जुड़े विवाद।
  4. घरेलू हिंसा से संबंधित समाधान।
  5. संबंध सुधारने के प्रयास।

ADR परिवार के सदस्यों को कानूनी जटिलताओं से बचाकर सौहार्दपूर्ण समाधान प्रदान करता है।


प्रश्न 105: पंचाट और लोक अदालतों में क्या अंतर है?

उत्तर:

  1. प्रक्रिया: पंचाट में औपचारिक प्रक्रिया होती है, जबकि लोक अदालतें अनौपचारिक रूप से विवादों का समाधान करती हैं।
  2. निर्णय: पंचाट का निर्णय बाध्यकारी होता है, लेकिन लोक अदालतों में फैसला पक्षकारों की सहमति पर निर्भर करता है।
  3. लागत: पंचाट प्रक्रिया महंगी हो सकती है, जबकि लोक अदालतें पूरी तरह निःशुल्क होती हैं।
  4. अनुप्रयोग: पंचाट वाणिज्यिक और अनुबंध विवादों में उपयोगी होता है, जबकि लोक अदालतें सामान्य नागरिक विवादों को हल करने के लिए अधिक प्रभावी होती हैं।

प्रश्न 106: क्या ADR अनुबंध (Contracts) के विवादों में उपयोगी है?

उत्तर:
हाँ, ADR अनुबंध विवादों के समाधान के लिए प्रभावी है।

  1. व्यवसायिक अनुबंध: व्यापार और सेवा अनुबंधों में विवाद होने पर ADR उपयोगी होता है।
  2. निर्माण अनुबंध: ठेकेदारों और ग्राहकों के बीच विवादों के समाधान के लिए।
  3. अंतरराष्ट्रीय अनुबंध: देशों के बीच व्यापारिक अनुबंधों में विवाद होने पर।
  4. न्यायिक नियंत्रण से मुक्ति: पक्षकार स्वयं अपने विवाद का समाधान तय कर सकते हैं।

ADR का उपयोग अनुबंध कानून में विवादों के त्वरित और सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए किया जाता है।


प्रश्न 107: पंचाट (Arbitration) का निर्णय कब अवैध माना जा सकता है?

उत्तर:

  1. यदि यह कानून के विरुद्ध हो।
  2. यदि इसमें धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार शामिल हो।
  3. यदि पंचाटकर्ता पक्षपातपूर्ण हो।
  4. यदि निर्णय सार्वजनिक नीति के विरुद्ध हो।
  5. यदि पक्षकारों को सुनवाई का पूरा अवसर न मिला हो।

प्रश्न 108: ADR और न्यायालयी प्रक्रिया में क्या अंतर है?

उत्तर:

  1. समय: ADR प्रक्रिया तेज होती है, जबकि न्यायालयी प्रक्रिया लंबी होती है।
  2. लागत: ADR कम खर्चीला होता है, जबकि मुकदमेबाजी में अधिक खर्च होता है।
  3. गोपनीयता: ADR में गोपनीयता बनी रहती है, जबकि न्यायालयी प्रक्रिया सार्वजनिक होती है।
  4. लचीलापन: ADR की प्रक्रिया अधिक लचीली होती है, जबकि न्यायालय में कठोर प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है।
  5. निर्णय: न्यायालय का निर्णय बाध्यकारी होता है, जबकि ADR में पक्षकारों की सहमति से समाधान निकाला जाता है।

प्रश्न 109: ADR के तहत वार्ता (Negotiation) की प्रक्रिया क्या है?

उत्तर:
वार्ता (Negotiation) एक ADR तकनीक है जिसमें पक्षकार आपसी बातचीत के माध्यम से विवाद सुलझाते हैं।

  1. स्वतंत्र वार्ता: पक्षकार स्वयं विवाद का समाधान निकालते हैं।
  2. सहायता प्राप्त वार्ता: मध्यस्थ या तटस्थ व्यक्ति की सहायता ली जाती है।
  3. कानूनी प्रतिनिधित्व: वकील या सलाहकार शामिल हो सकते हैं।
  4. लचीलापन: समाधान का तरीका पक्षकारों की सहमति पर निर्भर करता है।
  5. लिखित समझौता: वार्ता सफल होने पर लिखित समझौता किया जाता है।

प्रश्न 110: ADR का भविष्य भारत में कैसा है?

उत्तर:
ADR का भविष्य भारत में अत्यधिक उज्ज्वल है क्योंकि:

  1. न्यायालयों का बढ़ता बोझ कम करने के लिए ADR को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  2. भारत में लोक अदालतें और राष्ट्रीय पंचाट (Arbitration) केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं।
  3. व्यापार और कॉर्पोरेट सेक्टर में ADR का महत्व बढ़ रहा है।
  4. डिजिटल ADR और ऑनलाइन मध्यस्थता लोकप्रिय हो रही है।
  5. सरकार ADR को कानूनी विवादों के त्वरित समाधान के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

ADR न्यायिक प्रणाली का एक अनिवार्य अंग बनता जा रहा है और यह आने वाले वर्षों में अधिक प्रभावी होगा।

निष्कर्ष:

वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) एक प्रभावी प्रणाली है, जो न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को कम कर सकती है। भारत में ADR को बढ़ावा देने के लिए कानूनी सुधारों, जागरूकता अभियानों और डिजिटल माध्यमों का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे विवादों का समाधान तेजी से और सौहार्दपूर्ण तरीके से संभव हो सकेगा।

– : लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :-

प्रश्न 1. विवाद निस्तारण के वैकल्पिक उपाय क्या हैं? बताइये। What is Alternative means of Dispute Redressal? Explain.

उत्तर– विवाद निस्तारण के वैकल्पिक उपाय की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें न तो कोई पक्षकार हारता है न ही किसी पक्षकार की इसमें विजय होती है। आपसी सद्भावना तथा आपसी लेनदेन के माध्यम से तनिक-सा त्याग भविष्य में उत्पन्न होने वाली महानतम् कठिनाइयों को निवारित करने का अवसर पक्षकारों के लिए यह माध्यस्थम् प्रदान करता है। इसमें पक्षकार स्वयं करार द्वारा न्यायालय की तकनीकी परेशानियों से अपना बचाव कर सकते हैं तथा थोड़ी-सी समझ अपनाकर बड़े से बड़े भावी संग्राम निवारित करने का अवसर प्रदान करते हैं।

    किसी विवाद के निस्तारण के निम्नलिखित वैकल्पिक उपाय हो सकते हैं-

(1) समझौता तथा मध्यस्थता द्वारा (Conciliation and Mediation)

(2) बातचीत के द्वारा (By Negotiation)

(3) मेडोला की प्रक्रिया द्वारा (By Medola)

(4) मध्य-मध्यस्थता द्वारा

(5) लघु विचारण द्वारा

(6) द्रुतगति माध्यस्थम् द्वारा ।

प्रश्न 2. अनुकल्पी विवाद निपटारा के लाभ बतलाइये?

Explain Advantage of Alternative Dispute Resolution (ADR).

उत्तर- अनुकल्पी विवाद निपटारा के लाभ-विवाद निस्तारण के वैकल्पिक उपायों के निम्न लाभ हैं-

(i) इसका उपयोग किसी भी समय किया जा सकता है, यहाँ तक कि यदि विवाद न्यायालय में लम्बित हों तो उन्हें विवाद के किसी पक्षकार द्वारा किसी भी समय समाप्त किया जा सकता है (बाध्यकारी माध्यस्थम् को छोड़कर) ।

(ii) इन विवादों का हल मुकदमेबाजी की अपेक्षा त्वरित रूप से तथा कम खर्च पर हो सकता है। इनसे विवाद को व्यक्तिगत विषय-वस्तु बनाये रखने में सहायता मिलती है। कभी-कभी इनसे विवाद का निस्तारण एक या दो दिनों में ही हो जाता है चूँकि विवादों के वैकल्पिक निस्तारण के उपायों की प्रक्रिया पक्षकारों के नियन्त्रण में रहती है अतः इनसे मामलों का सृजनात्मक तथा वास्तविक हल (Solution) प्राप्त होता है।

(iii) विवादों के निस्तारण के वैकल्पिक उपायों के अन्तर्गत प्रक्रिया लचीली (Flexible) होती है तथा जहाँ प्रक्रिया कठोर प्रक्रियात्मक नियमों से प्रभावी नहीं होती।

(iv) चूँकि विवादों के निस्तारण के वैकल्पिक उपायों (ADR) के अन्तर्गत विवाद ३ पक्षकारों को एक-दूसरे को समझाने में सहायता मिलती है। इसे समय के बर्बादी नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 3. माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 का संक्षिप्त इतिहास लिखिए। Write a brief History of Arbitration and Concilation Acts 1996.

उत्तर—माध्यस्थम् (Arbitration) एक ऐसा तरीका है जिसके अन्तर्गत विवाद के पक्षकार अपनी सहमति से करार करके, एक या अधिक माध्यस्थम् नियुक्त करके विवाद का उसके निर्णय के लिए सौंपते हैं या सन्दर्भित करते हैं। माध्यस्थम की प्रक्रिया को एक विधिक रूप वर्तमान समय में दिया गया है, वैसे इस बारे में प्रावधान प्राचीन समय से ही विद्यमान है। लेकिन इसे विधिक रूप देने का प्रयास 1859 की दीवानी प्रक्रिया संहिता के माध्यम से किया गया। लेकिन यहाँ पर भी किसी अन्य अधिनियम के माध्यम से माध्यस्थम् को संरक्षित करने का प्रयास नहीं किया गया। सन् 1899 का वर्ष माध्यस्थम् के लिए स्वर्णिम युग बनकर आया जब इस वर्ष माध्यस्थम् पर एक स्वतन्त्र अधिनियम बना जिसे “माध्यस्थम् अधिनियम, 1899” के नाम से जाना गया। इस अधिनियम में यह प्रावधान किया गया कि जिस माध्यस्थम् को विवाद या मतभेद का सन्दर्भ किया जाना हो, वह विवाद के पक्षकारों द्वारा नियुक्त किया जाएगा तथा न्यायालय के समक्ष लम्बित वादों को पक्षकारों के विरोध करने पर न्यायालय उसे माध्यस्थम् को सन्दर्भित नहीं कर सकता था। इस अधिनियम के माध्यम से प्रथम बार भविष्य में उत्पन्न होने वाले सम्भावित विवादों या मतभेदों को माध्यस्थम् को सौंपने की व्यवस्था की गयी। वर्ष 1940 में केन्द्रीय स्तर पर माध्यस्थम् अधिनियम का गठन किया गया। माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 घरेलू या राष्ट्रीय माध्यस्थम के सम्बन्धों में सम्पूर्ण भारत के लिए समान प्रावधान करता था। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि के फलस्वरूप एक ऐसी विधि की आवश्यकता महसूस की गयी जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् तथा विदेशी पंचाट को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हो। इस क्रम में जेनेवा अभिसमय, 1927 तथा न्यूयार्क अभिसमय, 1958 सम्पन्न हुआ। इन अभिसमयों की संस्तुति पर क्रमशः माध्यस्थम् अधिनियम, 1937 तथा विदेशी पंचाट अधिनियम, 1961 पारित हुए। अब भारतीय माध्यस्थम् अधिनियम को भी अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय तथा अन्तर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् के अनुरूप लाने के लिए संशोधन की आवश्यकता महसूस की गयी। यह आवश्यकता 1996 के माध्यस्थम् अधिनियम द्वारा पूरी हो गयी और इस समय यही विधि अस्तित्व में है।

प्रश्न 4. माध्यस्थम से आप क्या समझते हैं? What do you understand by Arbitration?

उत्तर- माध्यस्थम् – माध्यस्थम् का अर्थ है दो या दो से अधिक पक्षकारों द्वारा अपने विवादों को मध्यस्थ नामक एक तीसरे व्यक्ति को निर्णय करने के लिए सुपुर्द करना जो विवाद का निर्णय न्यायिक तरीके से करता है। माध्यस्थम् को परिभाषित करते हुए जान बी० साउण्डर्स ने कहा है कि-

     ‘माध्यस्थम् दो या दो से अधिक पक्षकारों के मध्य विवाद या मतभेद को दोनों पक्षकारों को न्यायिक रूप से सुनने के पश्चात् निर्णय के लिए ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को किया गया सन्दर्भ है जो सक्षम क्षेत्राधिकार का न्यायालय नहीं है।”

माध्यस्थम् अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (1) का खण्ड (क) माध्यस्थम् की निम्न परिभाषा करता है- “माध्यस्थम् से कोई माध्यस्थम् अभिप्रेत है जो चाहे स्थायी माध्यस्थम् संस्था द्वारा किया गया हो या नहीं।’

    उपरोक्त परिभाषाओं के निष्कर्ष स्वरूप देखें तो अधिनियम को परिभाषा स्पष्ट नहीं है। क्योंकि परिभाषा के अनुसार, माध्यस्थम् सिर्फ स्थायी या अस्थायी संस्था द्वारा प्रशासित हो सकता है जबकि यह आवश्यक नहीं है कि माध्यस्थम् स्थायी माध्यस्थम् संस्था द्वारा ही प्रशासित हो।

     अतः माध्यस्थम् ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को पक्षकारों के मतभेद या विवाद का सन्दर्भ है, जिसे मध्यस्थ कहा जाता है जिसकी नियुक्ति पक्षकार आपसी सहमति से करार द्वारा कर सकते हैं तथा जो सक्षम क्षेत्राधिकार का न्यायालय नहीं है। माध्यस्थम् न्यायिक प्रक्रिया के अन्तर्गत निर्णय के लिए न्यायलय में दाखिल किया गया बाद नहीं है।

प्रश्न 5. माध्यस्थम् करार से आप क्या समझते हैं? What do you understand by Arbitration Agreement?

उत्तर- माध्यस्थम् करार (Arbitration Agreement)— माध्यस्थम करार किन्हीं पक्षकारों के मध्य किया गया ऐसा करार होता है जिसके अन्तर्गत पक्षकार किसी ऐसे विवाद को माध्यस्थम् को सौंपते हैं जो उनके मध्य संविदात्मक या अन्य विशिष्ट विधिक सम्बन्धों से सन्दर्भित होते हैं। चाहे विवाद उत्पन्न हुआ हो या विवाद उत्पन्न होने की भविष्य में | सम्भावना हो। एक माध्यस्थम् करार में करार की सभी आवश्यक शर्तें विद्यमान होनी चाहिए। इस करार के लिए भी पक्षकारों के मध्य स्वतन्त्र सहमति होनी चाहिए। माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 2 (1) (ख) के अनुसार, माध्यस्थम करार से तात्पर्य इसी अधिनियम की धारा 7 को सन्दर्भित माध्यस्थम् करार से है। धारा 7 (1) माध्यस्थम् करार को दो पक्षकारों के बीच एक ऐसे करार के रूप में परिभाषित करती है जिसके द्वारा विवाद के | पक्षकार किसी ऐसे विवाद को माध्यस्थम् को सौंपते हैं जिसका अस्तित्व है या जिसका अस्तित्व भविष्य में दिखायी देता हो माध्यस्थम् करार के लिए जरूरी शर्त नहीं है कि पक्षकारों के बीच विवाद का अस्तित्व करार के समय हो। अगर पक्षकारों को इस बात की आशंका हो कि भविष्य में इनके बीच किसी भी प्रकार के विवाद उत्पन्न होने की सम्भावना है के इस प्रकार के विवाद को भी किसी माध्यस्थम् को सुपुर्द कर दिये जाने का उपबन्ध है।

प्रश्न 6. माध्यस्थम् करार के आवश्यक तत्व ।Essentials of arbitration agreements.

उत्तर- माध्यस्थम् करार के निम्नलिखित आवश्यक तत्व हैं-

(1) माध्यस्थम् करार का कोई निर्धारित प्रारूप न होना। (2) माध्यस्थम् करार का लिखित होना।

(3) माध्यस्थम् करार स्पष्ट व असंदिग्ध होना।

(4) माध्यस्थम् करार में संविदा के सारे तत्वों का होना।

(5) माध्यस्थम् करार के लिए पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित एवं लिखित स्वीकृति होना जरूरी नहीं।

(6) माध्यस्थम् करार को व्याख्या का उदारता पूर्वक किया जाना।

प्रश्न 7. एक मध्यस्थ पर आक्षेप के आधार । Ground for challenge of an Arbitrator.

उत्तर- एक मध्यस्थ पर आक्षेप के आधार (Grounds for challenge of an arbitrator)— माध्यस्थम् तथा सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 12 उन आधारों का वर्णन करती है जिनके अन्तर्गत मध्यस्थ पर आक्षेप किया जा सकता है तथा मध्यस्थ के प्राधिकार को चुनौती दी जा सकती है। धारा 12 के अनुसार निम्न चार आधार हैं-

(1) जब किसी व्यक्ति के पास उसकी मध्यस्थ के रूप में सम्भाव्य नियुक्ति के सम्बन्ध में पहुँचा जाया जाता है, तब वह ऐसी परिस्थितियों के विषय में लिखित में प्रकट करेगा जिनमें उसकी स्वतन्त्रता या निष्पक्षता के सम्बन्ध में न्यायोचित सन्देहों को जन्म देने की सम्भावना पायी जाती है।

(2) एक मध्यस्थ अपनी नियुक्ति की तिथि से और सम्पूर्ण माध्यस्थम् कार्यवाहियां के दौरान पक्षकारों के समक्ष उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी परिस्थिति के विषय में लिखित में, विलम्ब के बिना प्रकट कर देगा जब तक उन्हें उसके द्वारा पहले से ही संसूचित न कर दिया गया हो।

(3) एक मध्यस्थ को केवल तभी चुनौती दी जा सकती है, यदि- (क) वे परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जो उसकी स्वतन्त्रता या निष्पक्षता के सम्बन्ध में न्यायोचित सन्देहों को जन्म देती हैं, या

(ख) वह पक्षकारों द्वारा किये गये करार की योग्यताओं को धारण नहीं करता है ।

(4) एक पक्षकार अपने द्वारा नियुक्त किये गये मध्यस्थ या जिसकी नियुक्ति में उसने भाग लिया है, को केवल उन्हीं कारणों पर चुनौती दे सकता है जिसके विषय में उसे जानकारी उसको नियुक्ति के बाद होती है।

प्रश्न 8. मध्यस्थता एवं माध्यस्थम् Mediation and Arbitration.

उत्तर- मध्यस्थता (Mediation) – मध्यस्थता को बीच-बचाव के नाम से भी जाना जाता है। बीच-बचाव विवाद निस्तारण के वैकल्पिक उपायों में वार्तालाप के बाद आता है यानि वार्तालाप या बातचीत जब असफल हो जाती है तब बीच-बचाव की स्थिति आती है। बीच-बचाव के द्वारा विवाद के निस्तारण के लिए किसी निरपेक्ष व्यक्ति की सहायता ले ‘सकते हैं। इस माध्यम के अन्तर्गत एक तृतीय व्यक्ति जिसका विवाद से कोई सम्बन्ध नह रहता, पक्षकारों को एक हल पर पहुँचने के लिए प्रेरित करता है। इसके लिए वह अपने सद्भाव तथा प्रभाव का प्रयोग कर सकता है। इसका कार्य पक्षकारों को समझाना है। वह विवाद के पक्षकारों को विवाद की विषय वस्तु के सम्बन्ध में आदान-प्रदान के लिए प्रेरित करता है।

     माध्यस्थम् (Arbitration) – माध्यस्थम् का अर्थ दो या दो से अधिक पक्षकारों द्वारा अपने विवादों को माध्यस्थम् नामक एक तृतीय व्यक्ति को निर्णय के लिए सुपुर्द या सन्दर्भित करना है जो विवाद का निर्णय न्यायिक तरीके से करता है।

प्रश्न 9. माध्यस्थता का स्थान कौन-सा होगा? What should be the place of Arbitration?

उत्तर- माध्यस्थम् का स्थान (Place of Arbitration)- माध्यस्थम् तथा सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 20 यह प्रावधान करती है कि माध्यस्थम् के पक्षकार माध्यस्थम् का स्थान सहमति के आधार पर चुनने के लिए स्वतन्त्र हैं।

(1) पक्षकारगण माध्यस्थम् के स्थान के विषय में करार करने के लिए स्वतन्त्र हैं।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किये गये किसी करार को करने में असफल रहने पर माध्यस्थम् का स्थान, माध्यस्थम् न्यायाधिकरण द्वारा पक्षकारों की सुविधा के साथ-साथ मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अवधारित किया जायेगा।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी माध्यस्थम् न्यायालय, जब तक पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार नहीं किया जाता है, किसी भी ऐसे स्थान, जो वह उचित समझे, पर अपने सदस्यों के साथ परामर्श करने के लिए साक्षियों, विशेषज्ञ या पक्षकारों को सुनने के लिए या दस्तावेजों, मालों या अन्य सम्पत्ति या निरीक्षण करने के लिए बैठक (Meeting) कर सकेगा।

     इस प्रकार माध्यस्थम अधिकरण माध्यस्थम् कार्यवाही के स्थान के निर्धारण के लिए पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है। इस सहूलियत का लाभ यह है कि पक्षकार अपने उद्योग के स्थान का या सुविधाजनक स्थान का चयन करने में समर्थ होंगे उससे समय तथा धन की बचत होगी।

प्रश्न 10. मध्यस्थ की नियुक्ति । Appointment of Arbitrator.

उत्तर – मध्यस्थ की नियुक्ति (Appointment of Arbitrator) – माध्यस्थम् अधिकरण के लिए मध्यस्थों की नियुक्ति से सम्बन्धित उपबन्ध धारा 11 में किया गया है। मध्यस्थ की कोई विशिष्ट अर्हता निर्धारित नहीं की गयी है। अतः मध्यस्थ के रूप में कोई भी • व्यक्ति नियुक्त हो सकता है फिर भी यह ध्यान रखा जाता है कि मध्यस्थ विवादित विषय वस्तु में विशिष्ट जानकारी तथा कौशल रखने वाला ही होना चाहिए। यहाँ तक कि पक्षकारों के नाते – निश्तेदार तथा सम्बन्धी भी मध्यस्थ नियुक्त किये जा सकते हैं। अतः मध्यस्थ की • एकमात्र अर्हता उसकी निष्पक्षता, स्वतन्त्रता या नैतिकता तथा समर्पण है। मध्यस्थ के निर्णय को पक्षपात, भ्रष्टाचार या कपटपूर्ण आचरण के आधार पर अपास्त किया जा सकता है। विवाद के पक्षकार जितनी संख्या में चाहें, मध्यस्थ नियुक्त कर सकते हैं, परन्तु उनकी संख्या सम न हो जब तक कि पक्षकारों के मध्य अन्यथा करार न हो। विवाद के पक्षकार किसी भी राष्ट्र के नागरिकों का चुनाव कर सकते हैं। इस चुनाव प्रक्रिया का निर्धारण आपसी सहमति या करार द्वारा किया जा सकता है।

     कई मध्यस्थों से मिलकर माध्यस्थम् अधिकरण बनता है जिसमें तीन सदस्य होंगे। एक एक मध्यस्थ की नियुक्ति स्वयं पक्षकार करेंगे तथा तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति चुने गये मध्यस्थ ही करेंगे। परन्तु यह 30 दिनों के भीतर ही होना आवश्यक है। इसकी अवधि बीत जाने पर किसी एक पक्षकार के अनुरोध पर मुख्य न्यायाधीश या कोई नामित व्यक्ति ही कर सकता है।

प्रश्न 11. न्यायालय । Court.

उत्तर- न्यायालय (Court) – माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (1) का खण्ड (ङ) के अन्तर्गत दी गई न्यायालय की परिभाषा अत्यन्त विस्तृत है। इस परिभाषा की परिधि में जिले की दीवानी अदालत के साथ-साथ मूल दीवानी क्षेत्राधिकार वाले उच्च न्यायालय को भी सम्मिलित किया गया है। माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1998 की धारा 2 की उपधारा (1) खण्ड (ङ) द्वारा यह स्पष्ट किया गया है। कि कोई भी दोवानी न्यायालय जो जिले के मुख्य न्यायालय (Principal Court) से निम्नतर (Inferior) हो तो वह इस अधिनियम के अन्तर्गत न्यायालय नहीं कहा जा सकता है।

     नाचप्पा चेट्टीयार बनाम सुब्रमनियम चेट्टियार, ए० आई० आर० 1960 एस० सी० 2075 के मामले में यह स्पष्ट किया गया है कि न्यायालय शब्द के अन्तर्गत अपीलीय यायालय (Appellate Court) तथा पुनरीक्षणीय न्यायालय (Revisional Court) भी शामिल होते हैं। माध्यस्यम् अधिनियम, 1940 के अन्तर्गत माध्यस्थम् पंचाट केवल उसी न्यायालय में संस्थित किया जा सकता है जिस न्यायालय को विवादग्रस्त विषय-वस्तु को एक वाद (Suit) के रूप में क्षेत्राधिकार प्राप्त हो। वर्तमान अधिनियम, 1996 के अन्तर्गत माध्यस्थम् पंचाट को न्यायालय में संस्थित किये जाने की कोई बाध्यता नहीं है।

     इस प्रकार हम देखते हैं कि न्यायालय में निम्नलिखित न्यायालय सम्मिलित हैं –

(i) जिले के प्रमुख दीवानी न्यायालय (Principal Civil Court of District)

(ii) उच्च न्यायालय तथा अपीलीय न्यायालय (High Court and Appellate Court)

(iii) पुनरीक्षणकर्ता न्यायालय (Revisional Court)।

प्रश्न 12. माध्यस्थम् के प्रकारों को बतलाइये। Give the kinds of Arbitration.

उत्तर- माध्यस्थम् के प्रकार – माध्यस्थम् तीन प्रकार का होता है-

(i) व्यक्तिगत माध्यस्थम् या घरेलू माध्यस्थम् (Personal Arbitration Domestic Arbitration)

(ii) सांविधिक माध्यस्थम् या कानूनी माध्यस्थम् या अधिनियमिति माध्यस्थम् (Statutory Arbitration or Arbitration under Inactment)

(iii) अंतर्राष्ट्रीय माध्यस्थम् (International Arbitration)

प्रश्न 13.    माध्यस्थम् करार के पक्षकार को परिभाषित कीजिए। Define the parties of Arbitration Agreement.

उत्तर- पक्षकार (Parties) – माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (1) (ज) में पक्षकार को परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार ‘पक्षकार’ से तात्पर्य माध्यस्थम् करार के पक्षकार से है। सामान्यतः न्यायालय में पक्षकारों को वादी और प्रतिवादी कहा जाता है, जबकि माध्यस्थम् में पक्षकारों को दावेदार (claiment) और प्रत्यर्थी (respondent) कहा जाता है।

      इसी तरह की परिभाषा मद्रास उच्च न्यायालय ने यूनियन ऑफ इण्डिया बनाम मेसर्स सरवन कन्सट्रक्शन्स प्राईवेट लिमिटेड, ए० आई० आर० (2010) मद्रास 6 के बाद में दिया। जिसमें न्यायालय ने कहा कि माध्यस्थम् कार्यवाहियों का पक्षकार शब्द से तात्पर्य माध्यस्थम करार का कोई पक्षकार केवल या तो दावाकर्ता (claiment) या प्रत्युत्तरदाता respondent) हो सकता है, अन्य कोई व्यक्ति नहीं हो सकता है।

     भारत संघ बनाम देवको दिवकी इंजीनियर्स एण्ड कान्ट्रेक्टर्स, ए० आई० आर (2005) एस० सी० डब्ल्यू0 1635 सु० कौ० के बाद में न्यायालय ने पक्षकार को स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘पक्षकार’ एवं आवेदन करने वाला पक्षकार से तात्पर्य वह व्यक्ति जो प्रक्रियाओं में शामिल हो और उसके साथ सीधे जुड़ा होना चाहिए एवं जो माध्यस्थम् के समक्ष की प्रक्रियाओं के नियन्त्रण में हो।

      माध्यस्थम् करार के ‘पक्षकार’ के अन्तर्गत माध्यस्थम् के हितबद्ध पक्षकार को सम्मिलित नहीं किया गया है, क्योंकि हितबद्ध पक्षकार माध्यस्थम् विवाद में दावेदार या प्रत्यर्थी नहीं होता है, भले ही वह माध्यस्थम् पंचाट से प्रभावित हो, हितबद्ध माध्यस्थम् कार्यवाही में केवल गवाह के रूप में उपस्थित हो सकते हैं।

प्रश्न 14. माध्यस्थम् कार्यवाही। Arbitration Proceeding.

उत्तर- माध्यस्थम कार्यवाही (Arbitration proceeding) – माध्यस्थम् कार्यवाही वह प्रक्रिया है जिसका अनुसरण कर माध्यस्थ, किसी विवाद की विषय-वस्तु के सम्बन्ध में विवाद के पक्षकार के परस्पर विरोधी दावों तथा प्रतिदावों के आधार पर, विवाद के पक्षकारों के मध्य उनके दायित्व तथा अधिकार का विनिश्चयन या निर्णयन करते हैं। माध्यस्थम् प्रक्रिया क्या होगी इसका निर्धारण पक्षकार आपसी सहमति से करार द्वारा निर्धारित करने के लिए स्वतन्त्र हैं। यदि पक्षकारों ने माध्यस्थम के संचालन के लिए किसी विशिष्ट प्रक्रिया का निर्धारण नहीं किया है तो माध्यस्थम् उस प्रक्रिया का अनुसरण करेंगे जो उन्हें मामलों की परिस्थितियों में उचित प्रतीत हो। माध्यस्थम् प्रक्रिया में पक्षकारों की सुनवाई की प्रक्रिया, उसे समन करने या बुलाने की विधि तथा विवाद पर दस्तावेजी या मौखिक साक्ष्य का ग्रहण किया जाना सम्मिलित है।

प्रश्न 15. माध्यस्थम् के क्या लाभ हैं? What are the advantages of Arbitration?

उत्तर- माध्यस्थम् के निम्नलिखित लाभ या महत्व हैं जो इस प्रकार हैं-

(1) पारम्परिक तकनीकी प्रक्रिया का अभाव- न्यायालय की प्रक्रिया एक तकनीकी प्रक्रिया है। इसके संचालन के लिए विधि विशेषज्ञ की आवश्यकता होती है। माध्यस्थम् एक अति सरल तथा द्रुतगामी प्रक्रिया है। माध्यस्थम् प्रक्रिया पर दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 तथा साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तकनीकी प्रक्रियात्मक उपबन्ध लागू नहीं होते।

(2) माध्यस्थम् प्रक्रिया का द्रुतगामी तथा बोझिल न होना। (3) माध्यस्थम प्रक्रिया में निर्णायक की नियुक्ति पक्षकारों की सहमति से होना।

(4) माध्यस्थम् प्रक्रिया में माध्यस्थम् द्वारा विषय-वस्तु की व्यक्तिगत जाँच किया जाना।

(5) माध्यस्थम् प्रक्रिया का कम खर्चीली होना।

(6) माध्यस्थम् प्रक्रिया में प्रक्रिया के पूरा होने की समयावधि का निर्धारण सम्भव है।

प्रश्न 16. माध्यस्थम् अधिकरण को परिभाषित कीजिए।Define the Arbitral Tribunal.

उत्तर- माध्यस्थम् अधिकरण (Arbitral Tribunal) माध्यस्थम् अधिकरण (Arbitral Tribunal)  की परिभाषा माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 2 उपधारा (1) खण्ड (क) में दी गयी है। इस परिभाषा के अनुसार, माध्यस्थम् अधिकरण से तात्पर्य है एकमात्र माध्यस्थम् या मध्यस्थों का पैनल (Panel of Arbitrators)। अतः यह स्पष्ट है कि यदि कोई विवाद एकमात्र मध्यस्थ को सन्दर्भित है तो वह एक मात्र मध्यस्थ है। इस अधिनियम के (प्रयोजन) उद्देश्य के लिए माध्यस्थम् अधिकरण है। यदि किसी विवाद को पक्षकारों के बीच करार द्वारा एक से अधिक मध्यस्थों की पैनल (सूची) को सन्दर्भित किया गया है तो मध्यस्थों के इस पैनल को इस अधिनियम के प्रयोजन से माध्यस्थम् अधिकरण (Arbitral Tribunal) माना जायेगा। पक्षकारों को यह अधिकार है कि वे विवाद को एकमात्र माध्यस्थम् या मध्यस्थों के एक पैनल को सन्दर्भित कर दें। माध्यस्थम अधिनियम की उपर्युक्त परिभाषा संयुक्त राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक आयोग विधिक (United Nations Commission on International Trade Law-UNCITRAL) (अनसीट्राल) को आदर्श विधि (Model Law) के अनुच्छेद 2 के अधीन दी गयी परिभाषा से ली गयी है।

प्रश्न 17. माध्यस्थम् अधिकरण के कर्तव्य । Duty of Arbitration Tribunals.

उत्तर – माध्यस्थ कार्यवाही का स्वतन्त्रता, निष्पक्षता एवं निष्ठापूर्वक कार्य करना, पक्षकारों द्वारा करार में निर्धारित अर्हताओं को पूरा करना, माध्यस्थ कार्यवाही के संचालन में अविलम्ब कार्य करना, अपने क्षेत्राधिकार की सीमा में कार्य करना, अपने प्राधिकार (Authority) की सीमा के अन्तर्गत कार्य करना, बहुमत से निर्णय करना आदि माध्यस्थ अधिकरण के प्रमुख कर्तव्य हैं।

प्रश्न 18. माध्यस्थम् अधिकरण का क्या क्षेत्राधिकार होता है? What is the Jurisdiction of Arbitral Tribunal?

उत्तर- माध्यस्थम् अधिकरण का क्षेत्राधिकार- माध्यस्थम् तथा सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 16 अधिकरणों की अधिकारिता के बारे में प्रावधान करती है। धारा 16 के अनुसार-

(1) माध्यस्थम् न्यायाधिकरण, माध्यस्थम् करार के अस्तित्व या वैधता से सम्बन्धित किसी आपत्ति पर विनिर्णय के साथ-साथ अपनी अधिकारिता के सम्बन्ध में नियम बना सकेगा।

(2) यह अभिवचन कि माध्यस्थम् न्यायाधिकरण को अधिकारिता नहीं है, प्रतिरक्षा के कथन को प्रस्तुत करने के बाद नहीं उठाया जायेगा।

(3) यह अभिवचन कि माध्यस्थम् न्यायाधिकरण अपने प्राधिकार के परिक्षेत्र से बाहर जाकर कार्य कर रही है, उसी समय तुरन्त उठाया जाना चाहिए जबकि मामला जिसका अपने प्राधिकार के परिक्षेत्र से बाहर होना अभिकथित है, माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान उठाया जाता है।

(4) माध्यस्थम् न्यायाधिकरण उपधारा (2) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट किये गये। किसी भी मामले में पश्चात् अभिवचन को स्वीकृत कर सकेगा यदि वह लिम्को न्यायोचित समझता है।

(5) माध्यस्थम् न्यायाधिकरण उपधारा (2) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट किये गये अभिवचन पर विनिश्चय करेगा और जहाँ माध्यस्थम् न्यायाधिकरण, अभिवचन को अस्वीकृत करने का विनिश्चय करता है, वहाँ वह माध्यस्थम् कार्यवाहियों को जारी रखेगा और माध्यस्थम पंचाट निर्मित करेगा।

(6) एक पक्षकार, जो ऐसे माध्यस्थम् पंचाट से व्यथित है, धारा 34 के अनुसार, ऐसे माध्यस्थम् पंचाट को अपास्त करने का आवेदन-पत्र दाखिल कर सकेगा।

      इसके अलावा अधिनियम की धारा 16 यह प्रावधान करती है कि एक मध्यस्थ अपनी अधिकारिता के विरुद्ध पक्षकार द्वारा आपत्तियों को सुनकर उस पर निर्णय करने का अधिकार रखता है।

प्रश्न 19. मध्यस्थ कौन हो सकता है? Who can be Arbitrator?

उत्तर- मध्यस्थ (Arbitrator )– मध्यस्थं एक ऐसा न्यायाधीश है जो पक्षकारों के बीच के मतभेदों तथा विवादों के निर्णय के लिए आपसी सहमति द्वारा चुना जाता है। इन्हें मध्यस्थता का अधिकार होता है तथा उनके निर्णय भी निश्चित होते हैं। इसीलिए इनके विरुद्ध कोई अपील नहीं होती। मध्यस्थ के रूप में एक वकील या गंवार कोई भी व्यक्ति हो सकता है। मध्यस्थ की एकमात्र अर्हता उसकी स्वतन्त्रता एवं निष्पक्षता से है अर्थात् मध्यस्थ की कोई अर्हता निर्धारित नहीं की गयी है। परन्तु मध्यस्थ वही व्यक्ति होता है जिसे विवाद की विषयवस्तु का सम्यक् ज्ञान हो तथा वह विवादित विषय-वस्तु का विशेषज्ञ हो, यद्यपि मध्यस्थ के निर्णयों के विरुद्ध कोई अपील नहीं होती, परन्तु कुछ आपवादिक परिस्थितियाँ हैं जिसमें इसे अपास्त किया जा सकता है –

(i) मध्यस्थ ने कपटपूर्ण आचरण किया है।

(ii) मध्यस्थ भ्रष्ट आचरण का दोषी है।

(iii) मध्यस्थ के निर्णय में विधि की त्रुटि हो ।

प्रश्न 20. (a) घरेलू पंचाट । Domestic Award.

(b) पंच निर्णय को समझाइये। Explain Award.

उत्तर (a) – घरेलू पंचाट (Domestic Award) – माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 2 उपधारा 7 के अनुसार इस अधिनियम के भाग एक के अन्तर्गत किये गये। पंचाट घरेलू या देशी (Domestic Award) माने जायेंगे। जिस पंचाट का कोई भी पक्षकार विदेशी नहीं है, वह देशी या घरेलू पंचाट कहा जायेगा। इसके अतिरिक्त घरेलू पंचाट वह है। जो न्यूयार्क अभिसमय (Newyork Convention) के अन्तर्गत नहीं किया गया है।

उत्तर (b) – सामान्य अर्थों में पंचाट का तात्पर्य होता है फैसला या विनिश्चय। माध्यस्थम् अधिनियम के सन्दर्भ में पंचाट का अर्थ होता है माध्यस्थम् का अन्तिम फैसला या अन्तिम अभिनिश्चयन।

     माध्यस्थम् या अधिनिर्णायक द्वारा विवादित प्रश्न से सम्बन्धित मामले, उन्हें सन्दर्भित किये गये हों, पर किये गये फैसलों को पंचाट (Award) कहते हैं। पंचाट का समस्त मामलों में निर्णय का होना आवश्यक है।

    एक माध्यस्थम् पंचाट लिखित होना चाहिए तथा माध्यस्थम् अधिकरण के सदस्यों द्वारा इस पर हस्ताक्षर किया जाना आवश्यक है।

प्रश्न 21. विदेशी पंचाट और स्थानीय पंचाट में अन्तर कीजिए। Describe the difference between Foreign Award’ and ‘Domestic Award’.

उत्तर- विदेशी पंचाट और स्थानीय पंचाट में निम्नलिखित अन्तर हैं जो इस प्रकार हैं- सामान्यतः विदेशी पंचाट ऐसा पंचाट होता है, जो विदेश में किया गया होता है एवं यह विदेशी कानून के द्वारा ही शासित होता है, किन्तु माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 के अनुसार तथा 1961 के अधिनियम के अनुसार विदेशी पंचाट ऐसा पंचाट होता है जो कि ऐसे देश के अन्तर्गत किया गया हो जो कि न्यूयार्क अभिसमय पर हस्ताक्षर करने वाला सदस्य हो जबकि स्थानीय पंचाट या देशी या घरेलू पंचाट ऐसा पंचाट होता है जिसमें पंचाट का कोई भी पक्षकार विदेशी नहीं है, वह देशी या घरेलू पंचाट कहा जायेगा। इसके अतिरिक्त देशी पंचाट वह पंचाट है जो न्यूयार्क अभिसमय के अन्तर्गत नहीं किया गया है। घरेलू पंचाट के सन्दर्भ में माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (7) में प्रावधान किया गया है।

प्रश्न 22. माध्यस्थम् पंचाट का प्ररूप तथा अन्तर्वस्तु क्या होती है? What is the form and contents of an Award?

उत्तर- पंचाट का प्रारूप तथा अन्तर्वस्तु – (1) पंचाट लिखित किया जायेगा तथा (सभी) माध्यस्थ या माध्यस्थों द्वारा हस्ताक्षरित होगा। एक से अधिक मध्यस्थ वाली मध्यस्थ कार्यवाही अधिकरण के सदस्यों के बहुमत (Majority) के हस्ताक्षर पर्याप्त होंगे। यदि लुप्त (Omitted Signature) का कारण दिया गया हो।

(2) पंचाट में उन आधारों का उल्लेख होगा जिस पर पंचाट किया गया है जब तक कि अनुच्छेद 30 के अन्तर्गत पक्षकारों ने यह करार न किया हो कि पंचाट के कारण नहीं दिये जायेंगे या पंचाट सहमत (agreed ) शर्तों (निबन्धनों पर है।

(3) पंचाट पर अनुच्छेद 20 (1) के अनुसार निर्धारित समय तथा स्थान का उल्लेख होगा तथा पंचाट उस स्थान पर किया हुआ माना जायेगा।

(4) पंचाट किये जाने के पश्चात् तथा पैरा (1) के अनुसार हस्ताक्षरित होने के पश्चात् प्रत्येक पक्षकार को दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 23. क्या पंचाट अथवा अतिरिक्त पंचाट में संशोधन एवं निर्वचन सम्भव है? Is correction and interpretation of Award or Additional Award possible.

उत्तर- पंचाट एवं अतिरिक्त पंचाट में संशोधन एवं क्रियान्वयन (Correction and interpretation of Award and Additional Award) – पंचाट एवं अतिरिक्त पंचाट में संशोधन एवं निर्वचन के सम्बन्ध में माध्यस्थम एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 33 में प्रावधान किया गया है। इस धारा में पंचाट एवं अतिरिक्त पंचाट के संशोधन तथा व्याख्या के सम्बन्ध में उपबन्ध किया गया है। अधिनियम की यह धारा संयुक्त राष्ट्र संघ अन्तर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्य आयोग की आदर्श विधि के अनुच्छेद 33 पर आधारित है। इस धारा में पंचाट एवं अतिरिक्त पंचाट के संशोधन एवं व्याख्या के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है। जब माध्यस्थम् कार्यवाही इस अधिनियम की धारा 32 के अधीन समाप्त हो जाती है। तब धारा 33 मुख्य रूप से माध्यस्थम् अधिकरण को निम्नलिखित कार्य सौंप देती है-

1. गणना, लिपिकीय या टाइप सम्बन्धी त्रुटि करने का अधिकार।

2. पंचाट के किसी भाग या पंचाट के किसी बिन्दु की व्याख्या करने का अधिकार

3. मूल पंचाट में छोड़े गये (सुप्त) दावे के सम्बन्ध में अतिरिक्त पंचाट करने का अधिकार ।

प्रश्न 24 (क) दावे एवं प्रतिरक्षा के कथनों के सम्बन्ध में माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 के अन्तर्गत क्या प्रावधान किये गये हैं? What Provisions have been made in Arbitration and Concilation Act, 1996 regarding statements of claims and defence?

(ख) निपटारा करार क्या है? समझाइये। What is Settlement Agreement? Explain.

उत्तर (क)  – दावे तथा प्रतिरक्षा के कथनों के सम्बन्ध में माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 के अन्तर्गत धारा 23 में प्रावधान किया गया है। माध्यस्थम् कार्यवाही के दौरान दावा करने वाले व्यक्ति को अपने दावे के समर्थन में तथ्यों का कथन दाखिल करना होता है। इसे दावा पत्र भी कहते हैं। दावा पत्र की प्राप्ति के पश्चात् प्रतिवादी या प्रत्यर्थी दावे में उल्लिखित विवरण के सम्बन्ध में अपना प्रतिवाद या बचाव दाखिल करता है। माध्यस्थम् कार्यवाही के पक्षकार किसी अन्य प्रक्रिया का निर्धारण करने के लिए स्वतन्त्र हैं जिसके द्वारा वे विवाद के तथ्यों को माध्यस्थम् अधिकरण के संज्ञान में लायें। इन प्रपत्रों को दाखिल करने की समय सीमा पक्षकार करार द्वारा तय कर सकते हैं या उसे माध्यस्थम् द्वारा तय किया जा सकता है।

      धारा 23 उपधारा (1) यह प्रावधान करती है कि करार के माध्यम से निर्धारित या माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा निर्धारित समयावधि के भीतर दावेदार अपने दावे के समर्थन करने वाले तथ्यों, विवाद्यक मुद्दों तथा वांछित अनुतोष या उपचार का कथन करेगा और प्रत्यर्थी इन विवरणों के सम्बन्ध में अपनी प्रतिरक्षा (बचाव) का कथन करेगा, जब तक कि पक्षकारों ने उन कथनों के अपेक्षित तत्वों के बारे में अन्यथा करार न किया हो। इस प्रकार पक्षकारों को यह स्वतन्त्रता है कि वे समय सीमा का निर्धारण करें जिसके अन्तर्गत दावा आदि माध्यस्थम् अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किया जाना है। यदि पक्षकार करार द्वारा ऐसा नहीं करते तो इस समय सीमा का निर्धारण माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा किया जायेगा।

      धारा 23 उपधारा (2) के अनुसार माध्यस्थम् के पक्षकार अपने कथनों के साथ, सभी दस्तावेजों को जिन्हें वे सुसंगत समझते हैं (दावे के साथ) प्रस्तुत कर सकते हैं।

उत्तर (ख) – निपटारा करार (Settlement Agreement) – सफल सुलह कार्यवाही का परिणाम समझौता करार है जो विवाद के हल को सहमत शर्तों को परिलक्षित करता है तथा सुलहकर्ता के प्रयासों से विवाद के पक्षकारों के मध्य होता है। समझौता करार के बारे में प्रावधान धारा 73 में किया गया है।

     धारा 73 की उपधारा (1) के अनुसार जब सुलहकर्ता को ऐसा प्रतीत होता है कि मझौते में कुछ ऐसे तत्व विद्यमान हैं जो विवाद के पक्षकारों को स्वीकार्य हैं तो वह समझौते की सम्भावित शर्तों को तैयार करेगा तथा उन्हें पक्षकारों को उनके विचार व्यक्त करने के लिए देगा। पक्षकारों के विचार प्राप्त हो जाने के पश्चात् सुलहकर्ता पक्षकारों द्वारा व्यक्त विचारों के प्रकाश में सम्भावित समझौते की शर्तों को पुनः तैयार कर सकेगा।

      धारा 73 को उपधारा (2) यह उपबन्ध करती है कि यदि विवाद के पक्षकार विवाद के किसी समझौते पर सहमत होते हैं तो वे एक लिखित समझौता करार तैयार करा सकेंगे तथा उस समझौता करार पर हस्ताक्षर कर सकेंगे।

     धारा 73 को उपधारा (3) समझौते के अस्तित्व तथा उसकी बाध्यकारी प्रकृति की चर्चा करती है। इस उपधारा के अनुसार जब पक्षकार समझौते के करार पर हस्ताक्षर कर देते हैं तो वह उनके मध्य अन्तिम समझौता होता है। यह अन्तिम समझौता विवाद के पक्षकारों पर तथा उनके अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों पर हस्ताक्षर करने की तिथि से बाध्यकर होता है तथा समझौते पर हस्ताक्षर करने की तिथि से समझौता कार्यवाही समाप्त हो जाती है।

       धारा 73 को उपधारा (4) सुलहकर्ता को अधिकार देती है कि वह पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित समझौता को अधिप्रमाणित करेगा तथा उसकी एक प्रति प्रत्येक पक्षकार को देगा।

प्रश्न 25 सांविधिक माध्यस्थम क्या है? What is Statutory Arbitration?

उत्तर- सांविधिक माध्यस्थम् (Statutory Arbitration) – विधायिका द्वारा पारित अधिनियम में, अधिनियम के अन्तर्गत भविष्य में उत्पन्न होने वाले विवाद के हल के लिए माध्यस्थम् प्रक्रिया के सम्बन्ध में ऐसे अधिनियम के अन्तर्गत सृजित माध्यस्थम् को सांविधिक माध्यस्थम / कानूनी माध्यस्थम् (Statutory Arbitration) की संज्ञा दी जाती है। सांविधिक माध्यस्थ के मामले में पक्षकारों की सहमति या इच्छा का कोई महत्व नहीं होता। सांविधिक माध्यस्थम में माध्यस्थ की नियुक्ति, माध्यस्थ का स्थान, पंचाट निर्गत करने की समयावधि, पंचाट का प्रवर्तन, माध्यस्थम् प्रक्रिया पर लागू होने वाली विधि, माध्यस्थ का शुल्क अथवा निर्धारण अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार होता है।

प्रश्न 26. माध्यस्थम् प्रक्रिया एवं न्यायिक प्रक्रिया में क्या अन्तर है? What is the difference between arbitral proceeding and judicial proceeding?

उत्तर- माध्यस्थम् प्रक्रिया विवादों के हल की सरल तथा द्रुतगामी प्रक्रिया है जबकि न्यायिक प्रक्रिया विवादों के हल की तकनीकी तथा विलम्बकारी प्रक्रिया है। माध्यस्थम् के अन्तर्गत विवाद का हल पक्षकारों द्वारा चयनित न्यायाधीश (मध्यस्थ) द्वारा किया जाता है। जबकि न्यायिक प्रक्रिया में न्यायाधीशों का चयन सरकार द्वारा किया जाता है। माध्यस्थम् प्रक्रिया पर सिविल प्रक्रिया संहिता एवं साक्ष्य अधिनियम लागू नहीं होते हैं जबकि न्यायिक प्रक्रिया लिखित प्रक्रिया संहिता, साक्ष्य अधिनियम के नियमों के अनुसार संचालित होती है। माध्यस्थम् प्रक्रिया को वैधता माध्यस्थम् अधिनियम के प्रावधानों से मिलती है जबकि न्यायिक प्रक्रिया एक परम्परागत प्रक्रिया है जिसे संसद या विधायिका के अधिनियम से वैधता प्राप्त होती है।

प्रश्न 27. माध्यस्थम् पंचाट को अपास्त करने के लिए कदाचरण अच्छा आधार है? Misconduct is a good ground for setting aside an award.

उत्तर- कदाचरण (Misconduct) शब्द का प्रयोग माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 12 एवं 13 के अधीन किया गया है जिसे मध्यस्थ के प्राधिकार की समाप्ति हेतु या उसे अनर्ह (Disqualified) घोषित करके उसके प्राधिकार को चुनौती देने के सन्दर्भ में किया गया है। इसका प्रयोग माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996 में पंचाट को अपास्त करने के आधार के रूप में किया गया है और माध्यस्थम् प्राधिकार को चुनौती देने के आधार के रूप में किया गया है। कदाचार शब्द के अन्तर्गत मध्यस्थ में निष्पक्षता तथा स्वतन्त्रता की कमी शामिल होती है। यदि कोई मध्यस्थ मामले का निर्णय स्वतन्त्रतापूर्वक तथा निष्पक्षतापूर्वक नहीं करता है तो वह कदाचार या कदाचरण का दोषी होगा। कदाचार की उत्पत्ति में कई परिस्थितियाँ उत्तरदायी हो सकती हैं। जैसे मध्यस्थ पंचाट में सभी बिन्दुओं पर विचार करने में असफल रहा हो या उसने पंचाट में आकस्मिक त्रुटि की हो या वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों की अवहेलना का दोषी है। वह तब भी कदाचार का दोषी होगा यदि उसने अपनी अधिकारिता से हटकर कार्य किया हो या उसने ऐसे किसी मामले में निर्णय दिया हो जो उसे निर्णय के लिए सन्दर्भित न किया गया हो। यदि मध्यस्थ इस प्रकार का कोई आचरण करता है. वो उसकी निष्पक्षता पर सन्देह उत्पन्न हो जाता है और ऐसी स्थिति में उसके पंचाट को अपास्त किया जा सकता है।

प्रश्न 28. क्या पक्षकार की मृत्यु होने पर माध्यस्थम् करार उन्मोचित हो जाता है? Whether Arbitration Agreement is discharged by death of the Party ?

उत्तर- माध्यस्थम् तथा सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 40 की उपधारा (1) यह स्पष्ट एवं अभिव्यक्त प्रावधान करती है कि माध्यस्थम् करार करार के किसी पक्षकार की मृत्यु के कारण न तो मृतक पक्षकार के तथा न किसी अन्य पक्षकार के सम्बन्ध में प्रभावोन्मुक्त या उन्मोचित (Discharged) होगा। माध्यस्थ करार के किसी पक्षकार को मृत्यु की दशा में करार मृतक के विधिक प्रतिनिधि (Legal Representative) के द्वारा या विधिक प्रतिनिधि के विरुद्ध प्रवर्तनीय होगा।

     धारा 40 की उपधारा (2) के अनुसार किसी माध्यस्थ (Arbitrator) का प्राधिकार (Authority), माध्यस्थ की नियुक्ति करने वाले पक्षकार की मृत्यु पर प्रतिसंहृत (Revoked) या खण्डित नहीं होगा।

      धारा 40 की उपधारा (3) के अनुसार, इस धारा की कोई बात ऐसी विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी जिसके आधार पर कि कार्यवाही का कोई अधिकार किसी व्यक्ति की मृत्यु के कारण निर्वाचित (समाप्त) हो जाता है।

प्रश्न 29. विधिक सेवा पाने के लिए क्या औपचारिकताएं आवश्यक हैं? What formalities are required for entitlement of legal services?

उत्तर— विधिक सेवा पाने के लिए पक्षकारों को उन औपचारिकताओं को पूरा करना होता हैं जो कि अधिनियम में उल्लिखित कर दिये गये हैं। एक माध्यस्थ अपने पंचाट की रचना के लिए विधिक सहायता ले सकता है। यदि उसे यह सन्देह है कि उसे निधिक सहायता लेने का अधिकार है या नहीं वह उसके लिए माध्यस्थम् कार्यवाही के पक्षकारों को सुन सकता है। अन्यथा पंचाट को अपास्त किया जा सकता है।

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