LLB Notes Hindi - Law Study Material (Sem Wise)

BNS (भारतीय न्याय संहिता ) Part 4

बीएनएस की धारा 84 क्या है

(BNS Section 84)

किसी विवाहित महिला को आपराधिक इरादे से फुसलाना या ले जाना या हिरासत में रखना

       जो कोई किसी ऐसी महिला को, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसके बारे में वह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है, इस इरादे से ले जाता है या फुसलाता है कि वह किसी भी व्यक्ति के साथ अवैध संबंध बना सकती है, या उस इरादे से ऐसी किसी भी चीज़ को छुपाता है या हिरासत में रखता है। महिला को दो साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाएगा।

बीएनएस की धारा 85 क्या है

(BNS Section 85)

       किसी भी इंसान के लिए उसका घर व उसके परिवार के सदस्यों का साथ होना सबसे सुरक्षित माना जाता है। परन्तु कई बार देखा जाता है कि, कुछ महिलाएं अपने खुद के घर में भी सुरक्षित महसूस नहीं होती। वहाँ भी उसे मानसिक व शारीरिक रुप से परेशान किया जाता है, उनके पति या उनके रिश्तेदारों द्वारा। जी हाँ कुछ महिलाओं को हर दिन किसी ना किसी कारण से अपने ही घर में परेशान किया जाता है। महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों निपटने के लिए BNS के अंदर बहुत सारे कानून बनाए गए है। आज हम एक ऐसे ही मामले से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की एक मुख्य धारा के बारे में आपको जानकारी देंगे की, बीएनएस धारा 85 क्या है (BNS Section 85 ), यह कब लागू होती है – सजा, जमानत और बचाव?

         इससे पहले इस अपराध में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498a के तहत केस दर्ज किए जाते थे। लेकिन अब इस कानून को और भी सख्त करके भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 से बदल दिया गया है। इसलिए जिन महिलाओं को इन नए कानूनों की जानकारी नहीं है, उन्हें ऐसे अपराधों के खिलाफ कैसे कार्यवाही करनी है। आज हम इस लेख के द्वारा विस्तार से जानकारी देंगे, साथ ही ऐसे लोग जिन पर इस धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। उन्हें भी इस लेख की मदद से आगे की कार्यवाही की जानकारी प्राप्त हो सकेगी।

बीएनएस की धारा 85 क्या है – BNS Section 85  

      भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 में कहा गया है कि “जो कोई भी व्यक्ति किसी महिला का पति या पति का रिश्तेदार होने के नाते, किसी भी महिला के साथ क्रूरता (Cruelty) करता है, उस व्यक्ति पर बीएनएस की धारा 85 के तहत केस दर्ज कर कार्यवाही की जाएगी।

       सरल शब्दों में कहे तो, यह धारा ऐसे व्यक्ति पर लागू होती है जिसमें किसी महिला का पति या उसके पति का कोई भी रिश्तेदार उस महिला पर क्रूरता (किसी को पीड़ा पहुंचाना) करता है। इसमें महिला को पहुँचाया गया शारीरिक और मानसिक नुकसान दोनों शामिल हैं। शारीरिक क्रूरता (Physical Cruelty) में ऐसे कार्य शामिल होते है, जो शारीरिक दर्द या चोट पहुँचाते हैं, जबकि मानसिक क्रूरता में उत्पीड़न, अपमान करना, धमकी देना, जैसे कई अन्य गलत व्यवहार शामिल है।

बीएनएस की धारा 85 के जुर्म की मुख्य बातें।
  • यह कानून उन महिलाओं की मदद करने के लिए बनाया गया है जिनके साथ उनके पति या उनके पति के किसी रिश्तेदार द्वारा बुरा व्यवहार किया जाता है।
  • इसमें ऐसी चीजें शामिल हैं जो किसी महिला के शरीर को चोट (Injury) पहुँचाती हैं, जैसे मारना या धक्का देना, लेकिन ऐसी चीजें भी शामिल हैं। जो उसे अंदर से बुरा महसूस कराती हैं, जैसे बुरा-भला कहना, धमकी देना या महिला को लगातार अपमानित करना।
  • अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ ऐसा कोई भी काम करता है, तो उस पर धारा 85 के उल्लंघन (Violation) करने के तहत जेल व जुर्माने की सजा का सामना करना पड़ सकता है।
  • यह कानून यह सुनिश्चित करने के लिए है कि महिलाएँ अपने घरों में सुरक्षित महसूस करें और डरें नहीं। इसके साथ इस कानून का उद्देश्य होता है कि उन सभी महिलाओं को ऐसे अपराध होने पर समय पर न्याय (Justice) मिल सकें।
ऐसे कार्य जिनके करने पर BNS 85 के तहत कार्रवाई की जा सकती है
  • शारीरिक उत्पीड़न: इसमें मारना, पीटना, चोट पहुंचाना, या अन्य किसी प्रकार का शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाना शामिल है।
  • मानसिक उत्पीड़न: इसमें गाली देना, अपमान करना, धमकाना, डराना, मानसिक रूप से प्रताड़ित करना, या अन्य भावनात्मक (Emotional) रूप से प्रताड़ित करना शामिल है।
  • यौन उत्पीड़न: यौन उत्पीड़न, या यौन शोषण (Sexual Abuse) के किसी भी रूप को शामिल करना।
  • आर्थिक शोषण: अपनी पत्नी को धन, संपत्ति, या अन्य संसाधनों से वंचित करना।
  • सामाजिक बहिष्कार: अपनी पत्नी को परिवार, दोस्तों, या समाज से अलग कर देना, उन्हें किसी से भी मिलने या बात करने से रोकना।
  • घरेलू कामों में जबरदस्ती: इसमें किसी महिला ज्यादा से ज्यादा काम करने के लिए परेशान करना या अपमानजनक घरेलू काम करने के लिए मजबूर करना शामिल है।
  • संतान उत्पत्ति के लिए दबाव: एक पति द्वारा अपनी पत्नी की इच्छा ना होने पर भी एक या अधिक बच्चों को जन्म देने के लिए दबाव डालना।
  • दहेज उत्पीड़न: अपनी पत्नी से दहेज (Dowry) की मांग करना, दहेज के लिए प्रताड़ित करना, या दहेज के कारण नुकसान पहुंचाना शामिल है।
  • गैर-कानूनी तरीकों से पत्नी को घर से निकालना: किसी व्यक्ति के द्वारा पत्नी को घर से जबरदस्ती या अवैध (illegal) तरीके से निकालना।
इस धारा के जुर्म का उदाहरण

     एक बार अनिता नाम की एक शादीशुदा महिला (Married Women) होती है, उसकी शादी को हुए कुछ ही महीने हुए थे। लेकिन अनिता को उसके पति व उसके पति के परिवार के द्वारा रोजाना परेशान किया जाता था। रोजाना वो लोग उसके साथ बहुत ही गलत व्यवहार करते थे, इसके साथ ही उसको अपने माता-पिता के घर से पैसे मंगवाने के लिए भी परेशान करते थे। अनिता को उसके ससुराल वाले ना किसी से मिलने देते, व अगर कोई मिलने आए तो सब के सामने उसका अपमान करते थे।

      रोजाना होने वाले इस अत्याचार से परेशान होकर अनिता अपने पति व अपने पति के परिवार वालो की पुलिस में शिकायत दर्ज (Complaint Register) करवा देती है। जिसके बाद पुलिस उसके पति व उसके पति के परिवार के सदस्यों के खिलाफ BNS Section 85 के तहत कार्यवाही करती है।

बीएनएस धारा 85 में सज़ा – Punishment Of BNS Section 85 

      बीएनएस की धारा 85 में सजा (Punishment) के लिए बताया गया है, कि किसी महिला का पति या उसके पति के परिवार का कोई भी सदस्य उस महिला को किसी भी प्रकार से प्रताड़ित (Tortured) करने का दोषी (Guilty) पाया जाएगा। उसे ऐसा गंभीर अपराध करने के लिए 3 वर्ष तक की जेल की सजा व जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है।

      यदि पीड़ित महिला (Victim Women) के साथ इससे भी ज्यादा गंभीर कोई अपराध किया जाता है, तो ऐसे मामलों में अन्य आपराधिक धाराओं (Criminal Sections) के साथ सजा को बढ़ाया जा सकता है।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 में जमानत कब व कैसे मिलती है

    बीएनएस की धारा 85 महिलाओं के साथ क्रूरता के अपराध को बताने वाला एक गंभीर अपराध होता है, जिसे संज्ञेय अपराधों (Cognizable Offence) की श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब है कि पुलिस इस अपराध के आरोपी व्यक्ति (Accused Person) को बिना किसी वारंट या अनुमति के गिरफ्तार कर सकती है। परन्तु इस अपराध को जमानती (Bailable) रखा गया है। यानी इस अपराध का आरोपी व्यक्ति गिरफ्तारी के बाद जमानत के लिए आवेदन कर जमानत प्राप्त कर सकता है।

जमानत के लिए जानने योग्य कुछ बाते:-

किसी व्यक्ति को जमानत देनी है या नहीं इस पर न्यायालय का अंतिम निर्णय होता है। जिस के लिए कुछ बातों पर विचार किया जाता है।

  • क्रूरता के अधिक गंभीर कार्यों के कारण जमानत देने से इनकार किया जा सकता है।
  • यदि न्यायालय को लगता है कि आरोपी मुकदमे से पहले भाग सकता है, तो जमानत देने से इनकार किया जा सकता है।
  • ​​यदि अभियुक्त (Accused) द्वारा गवाहों (Witnesses) को बदलने या सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने का शक होता है, तो जमानत देने से इनकार किया जा सकता है।
  • न्यायालय पीड़ित की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। यदि आरोपी व्यक्ति को रिहा करने से पीड़ित को खतरा हो, तो जमानत अस्वीकार की जा सकती है।
महिला के साथ क्रूरता की शिकायत कैसे करें

      यदि किसी शादीशुदा महिला के साथ क्रूरता हुई है तो वो धारा 85 के तहत केस दर्ज करवा सकती है। आप नीचे दी गई बातों का पालन करके शिकायत दर्ज कर सकते हैं:-

  1. सबसे पहले अपने क्षेत्र के पुलिस स्टेशन में घटना की रिपोर्ट दर्ज (FIR) कराएं।
  2. उस रिपोर्ट में आपको घटना की सारी जानकारी देनी चाहिए जिसमें तारीख, समय, स्थान, और आपके साथ क्या हुआ, यह सारी बाते शामिल करें।
  3. यदि आपके पास कोई सबूत है, जैसे कि चोट के निशान, चिकित्सा रिपोर्ट, या गवाहों के बयान, तो उन्हें भी पुलिस को सौंप दें।
  4. यदि आपके शरीर पर कोई चोट लगी है, तो तुरंत डॉक्टर के पास जाकर मेडिकल जांच करवाएं।
  5. इसके बाद डॉक्टर द्वारा दी गई मेडिकल रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई गई FIR का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।
  6. इसके बाद आगे की कार्यवाही के लिए किसी अच्छे वकील की सलाह ले जो आगे चलकर आपकी बहुत मदद करेगा।
BNS Section 85 लगने पर बचाव के कुछ उपाय

        कभी-कभी कुछ मामले ऐसे भी देखे जाते है जिनमें कुछ महिलाओं के द्वारा इस प्रकार के कानूनों का गलत इस्तेमाल (झूठा केस) किया जाता है। जिसकी वजह से बेगुनाह (Innocent) लोगों पर कानूनी कार्यवाही की जाती है। इसलिए यदि आपने कोई अपराध नहीं किया है, तो आप अपने बचाव के लिए इन सभी उपायों का इस्तेमाल कर सकते है।

  1. मुकदमा दर्ज होने के बाद घबराएं नहीं और जल्दबाजी में कोई भी बयान न दें।
  2. इसके बाद सबसे पहले किसी अनुभवी वकील के पास जाए और उसको सारी बाते बताए।
  3. एक अनुभवी वकील आपकी कानूनी प्रक्रिया को समझने और आपके अधिकारों की रक्षा करने में मदद कर सकता है।
  4. आपके पास यदि कोई ऐसा सबूत है, जो आपको निर्दोष साबित कर सके। उस सबूत को संभाल कर रखे।
  5. यदि आपको गिरफ्तार किया गया है, तो जमानत के लिए जल्द से जल्द आवेदन करें। आपका वकील इस प्रक्रिया में आपकी सहायता कर सकता है।
  6. अदालत में सभी सुनवाईयों (Hearings) में उपस्थित रहें और अपने वकील के निर्देशों का पालन करें। अपनी बात स्पष्ट और ईमानदारी से रखें।
  7. यदि आपके पास कोई गवाह है जो गवाही दे सके कि आप निर्दोष है, तो अपने पक्ष में गवाह पेश करें।
  8. कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा रखे यदि आप सच में निर्दोष होगे तो आप पर दर्ज केस को खत्म कर दिया जाएगा। लेकिन अगर आपने अपराध किया होगा तो न्यायालय द्वारा आपको सजा भी दी जाएगी। इसलिए धैर्य रखें और अपने वकील पर भरोसा रखें।

       इसके अलावा भी बहुत से ऐसे कार्य हो सकते है जिनके द्वारा किसी महिला को प्रताड़ित किया जाता है। ऐसे अपराध करने वाले व्यक्तियों को सजा देने के लिए ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) की ये धारा बनाई गई है।

निष्कर्ष :- BNS Section 85 को महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय व क्रूरता को रोकने के लिए ही भारतीय कानून के तहत लागू किया गया है। जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को जल्द से जल्द न्याय दिलाकर उन्हें इस प्रकार के अपराधों से सुरक्षित रखना है। यदि आप भी किसी ऐसे मामले से जुड़ी कानूनी सहायता या परामर्श (Help or Advice) घर बैठे लेना चाहते है, तो आप हमारे काबिल वकीलों से बात कर सकते है।

बीएनएस की धारा 86 क्या है

(BNS Section 86)

क्रूरता की परिभाषा

धारा 85 के प्रयोजनों के लिए, “क्रूरता” का अर्थ है-

(ए) कोई भी जानबूझकर किया गया आचरण जो ऐसी प्रकृति का हो जिससे महिला को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित किया जा सके या महिला के जीवन, अंग या स्वास्थ्य (चाहे मानसिक या शारीरिक) को गंभीर चोट या खतरा हो; या

(बी) महिला का उत्पीड़न जहां ऐसा उत्पीड़न उसे या उससे संबंधित किसी व्यक्ति को किसी संपत्ति या मूल्यवान सुरक्षा की किसी भी गैरकानूनी मांग को पूरा करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से होता है या उसके या उससे संबंधित किसी भी व्यक्ति द्वारा इसे पूरा करने में विफलता के कारण होता है।

बीएनएस की धारा 87 क्या है

(BNS Section 87)

        हमारे देश में अकसर महिला सशक्तिकरण और उनके समान अधिकारों की बात की जाती है, लेकिन आज भी समाज में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं जो हमें झकझोर कर रख देती हैं। इनमें से एक अपराध है महिलाओं का अपहरण करके जबरदस्ती शादी करना। जी हाँ आज भी कुछ महिलाओं को जबरन या धोखे से किसी भी अंजान व्यक्ति के साथ शादी करने के लिए बेच दिया जाता है। यह न केवल महिलाओं की सुरक्षा के लिए बल्कि समाज के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। इसलिए ऐसे अपराधों से निपटने व नकारी होना बहुत ही आवश्यक है। इसलिए इस लेख में आज हम भारतीय न्याय संहिता की धारा 87 के बारे में जानकारी देंगे, कि बीएनएस की धारा 87 क्या है (BNS Section 87)? यह कब लगती है और इस धारा में जमानत, सजा और बचाव के उपाय?

       जबरदस्ती किसी महिला को शादी के लिए मजबूर करना एक गंभीर अपराध है जिसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा (IPC Section) 366 के तहत कार्यवाही की जाती थी। लेकिन आपराधिक कानून में हुए बदलावों के चलते BNS के लागू होते ही इस अपराध के सभी मामलों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 87 के तहत कार्यवाही की जाने लगी है। इसलिए इस अपराध से जुड़ी हर उपयोगी जानने व समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरुर पढ़े।

बीएनएस की धारा 87 क्या है व यह कब लगती है – BNS Section 87 

       भारतीय न्याय संहिता की धारा 87 एक विशेष प्रावधान (Provision) है, जो किसी व्यक्ति द्वारा किसी महिला का अपहरण (Kidnap) करके या उसे धोखे से कहीं ले जाने पर लागू होता है। इस धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी महिला का अपहरण करता है या उसे उसके घर से बाहर ले जाता है। जिसके पीछे उस व्यक्ति का उद्देश्य उस महिला को जबरदस्ती किसी के साथ विवाह करने या किसी अनैतिक कार्य के लिए मजबूर करने का होता है।

       आसान भाषा में समझे तो यह धारा उन व्यक्तियों पर लागू होती है, जो किसी महिला का अपहरण करके जबरदस्ती या धोखे से किसी और व्यक्ति से शादी करवाने या वेश्यावृत्ति जैसे कार्यों के लिए बेच देते है।

आइये विस्तार से जानते है कि बीएनएस धारा 87 कब लागू होती है:-
  • जब किसी महिला को विवाह के लिए जबरदस्ती या धोखे से ले जाया जाता है।
  • जब किसी महिला को अवैध यौन संबंध के लिए जबरदस्ती या धोखे से ले जाया जाता है।
  • जब किसी महिला को वेश्यावृत्ति (Prostitution) में धकेलने के लिए जबरन या धोखे से लेकर जाया जाता है।
  • जब किसी महिला को डराने-धमका कर या अधिकार का दुरुपयोग करके किसी स्थान से ले जाया जाता है और उसके साथ अवैध यौन संबंध बनाए जाते है।
धारा 87 के अपराध को लागू करने वाली कुछ आवश्यक बातें
  • अपहरण करना: यह धारा तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति किसी महिला का अपहरण करता है।
  • इरादा: आरोपी का किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध विवाह करने के लिए मजबूर करना, उसे अवैध संभोग करने के लिए मजबूर करना या बहकाना (Mislead) का इरादा (Intention) होना चाहिए।
  • दंड: धारा 87 के तहत दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को कठोर कारावास व जुर्माने की सजा से दंडित किया जा सकता है।
बीएनएस​ धारा 87 के तहत कुछ कार्य जो अपराध माने जा सकते है
  • किसी महिला के साथ जबरदस्ती करके उसे उसके माता-पिता व घर से कही दूर ले जाना।
  • किसी लड़की को किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करने के लिए मजबूर करना, जिससे वह विवाह नहीं करना चाहती।
  • किसी महिला को धोखे से किसी अज्ञात स्थान पर ले जाकर कैद करना।
  • महिला को जबरन किसी अनैतिक कार्य, जैसे वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करना।
  • नौकरी या अन्य चीजों का लालच देकर किसी महिला को अंजान जगह ले जाकर उसके साथ संभोग करना।
  • किसी महिला को बहला-फुसलाकर किसी दूसरे देश में ले जाना और वहाँ ले जाकर उसे बेच देना।
इस धारा के तहत अपराध का सरल उदाहरण

        प्रीति एक छोटे से शहर में अपने माता-पिता के साथ बहुत ही खुशहाल जीवन रही थी। एक दिन सोशल मीडिया के माध्यम से उसकी मुलाकात राहुल नाम के एक व्यक्ति से होती है। राहुल खुद को एक बहुत ही बड़ा व्यवसायी बताता है और धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हो जाती है। एक दिन राहुल प्रीति से कहता है कि वह उससे शादी करना चाहता है, और उसके सभी सपनों को पूरा करने में भी उसकी मदद करेगा।

       जिसके बाद वो प्रीति को अपने साथ शहर चलने के लिए बोलता है। प्रीति राहुल की बात पर भरोसा कर लेती है और शहर चली जाती है। शहर पहुंचने के बाद राहुल प्रीति को एक सुनसान जगह पर ले जाकर बंद कर लेता है और किसी अन्य व्यक्ति से पैसे लेकर बेच देता है। लेकिन प्रीति किसी तरह से वहां से भाग जाती है और पुलिस स्टेशन जाकर राहुल की खिलाफ BNS Section 87 के तहत शिकायत दर्ज करवा देती है।

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 के अपराध के लिए सजा

       BNS की धारा 87 में सजा के प्रावधान के लिए बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति जबरदस्ती किसी महिला को अपने साथ ले जाने या किसी को गलत कार्य के लिए बेचने का दोषी (Guilty) पाया जाएगा। उस व्यक्ति को दस साल के लिए जेल की कैद व जुर्माने के दंड से दंडित (Punished) किया जाएगा।

बीएनएस की धारा 87 में जमानत का प्रावधान

      बीएनएस सेक्शन 87 का यह अपराध गैर-जमानती (Non-Bailable) होता है। इसका मतलब है कि आरोपी को पुलिस द्वारा पीड़ित की शिकायत के बाद गिरफ्तार किया जा सकता है और उसे अदालत की अनुमति के बिना जमानत (Bail) नहीं मिल सकती है। इसके अलावा, यह अपराध संज्ञेय (Cognizable) होता है, यानी पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और जांच कर सकती है।

BNS 87 के जुर्म के आरोप झेल रहे आरोपी के लिए बचाव उपाय
  • इस प्रकार के अपराध के आरोप (Blame) लगने पर तुरन्त किसी अनुभवी वकील की सहायता ले।
  • एक अनुभवी वकील (Experienced Lawyer) की सहायता से कानूनी खामियों (Legal Loopholes) और अभियोजन पक्ष (Prosecutors) की कमजोरियों का पता करके बचाव किया जा सकता है।
  • इसके अलावा यदि आरोपी यह साबित कर सके कि महिला ने अपनी मर्जी से उसके साथ जाने का निर्णय लिया था, तो यह एक महत्वपूर्ण बचाव हो सकता है।
  • यदि आरोपी यह साबित कर सके कि उसका इरादा महिला का अपहरण या उसे जबरन विवाह या कोई गलत कार्य के लिए मजबूर करने का नहीं था, तो यह बात भी बचाव में काम आ सकती है।
  • अगर आरोपी यह साबित कर सके कि महिला या उसके परिवार द्वारा झूठे आरोप (False Blame) लगाए गए हैं, तो इसे बचाव के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • यदि आरोपी के पक्ष में कोई गवाह (Witness) मौजूद हो जो उसके निर्दोष (innocent) होने की गवाही दे सके, तो इससे भी बहुत सहायता हो सकती है।
  • यदि अभियोजन पक्ष के पास आरोपी व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं, तो आरोपी इस आधार पर बचाव किया जा सकता है।

निष्कर्ष:- BNS Section 87 को लागू करने का उद्देश्य देश की महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों को कम करना व पीड़ित महिलाओं को जल्द से जल्द न्याय दिलाना है। ऐसे अपराधों से जुड़ी किसी भी कानूनी समस्या के समाधान के लिए अनुभवी वकीलों की सहायता प्राप्त करने के लिए आप अभी हमसे संपर्क कर सकते है।

बीएनएस की धारा 88 क्या है

(BNS Section 88)

गर्भपात

     क्या आप जानते हैं कि गर्भपात करवाना एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है? हाँ, यह सच है। भारतीय दंड संहिता की धारा 88 के तहत कुछ स्थितियों में गर्भपात करवाना कानून अपराध माना जाता है। इस तरह के मामले देश में बहुत ही तेजी से बढ़ रहे हैं। चाहे वह लिंग चयन के लिए हो या फिर अनचाही प्रेगनेंसी के लिए, अबॉर्शन एक गंभीर समस्या बन चुका है। इसलिए इस लेख में हम इस तरह के अपराध से संबधित BNS की एक धारा के बारे में विस्तार से जानेंगे कि, बीएनएस की धारा 88 क्या है (BNS Section 88 )? यह कब लागू होती और इस धारा में सजा कितनी होती है? क्या धारा 88 लगने पर जमानत मिल सकती है?

     भारत में भी गर्भपात (Miscarriage) को लेकर कानून समय-समय पर बदलते रहे हैं। पहले ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 312 का इस्तेमाल होता था। लेकिन जब भारतीय दंड संहिता की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) आई तो गर्भपात से जुड़े मामलों के लिए धारा 88 लागू होने लगी। यह लेख उन सभी लोगों के लिए उपयोगी होगा जो इस अपराध के जुड़े कानून के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। चाहे आप एक छात्र हों, एक पेशेवर वकील हों या फिर एक आम नागरिक यह जानकारी आपके लिए महत्वपूर्ण है।

बीएनएस की धारा 88 क्या है – BNS Section 88 

    भारतीय न्याय संहिता की धारा 88 गर्भपात (Miscarriage) के अपराध के बारे में बताती है। यह धारा उन लोगों के बारे में बात करती है जो जानबूझकर किसी महिला का गर्भपात करवाते हैं। गर्भपात का मतलब है कि एक महिला अपने बच्चे को जन्म देने से पहले ही उसको अपने गर्भ से निकाल देती है।

क्यों है यह अपराध?

यह एक अपराध इसलिए है क्योंकि:

  • यह काम जानबूझकर (Intentionally) किया जाता है, यानी यह कोई गलती नहीं है।
  • कई बार महिला अपनी मर्जी से गर्भपात नहीं करवाना चाहती है।
  • हर बच्चे को जीने का अधिकार होता है, इसलिए गर्भ में ही किसी बच्चे को जीवन समाप्त कर देना कानून अपराध है।
बीएनएस धारा 88 के तहत अपराध के मुख्य तत्व
  • किसी महिला का जानबूझकर गर्भपात कराना इस धारा के तहत अपराध है। इसका मतलब है कि गर्भपात को जानबूझकर और इरादतन (Intentionally) किया गया हो।
  • महिला की सहमति से किया गया गर्भपात भी अपराध माना जा सकता है, जब तक कि यह किसी वैध चिकित्सा (Valid Medical) कारण के लिए न किया गया हो।
  • गर्भधारण (Pregnancy) का समय भी सजा की गंभीरता को प्रभावित करती है। शुरुआती अवस्था में गर्भपात की तुलना में बाद की अवस्था में अबॉर्शन के लिए अधिक सजा का प्रावधान (Provision) है।
  • यदि अबॉर्शन महिला की जान बचाने के लिए किया जाता है, तो यह अपराध नहीं माना जाता है।
धारा 88 के अनुसार गर्भपात के अपराध से संबंधित अन्य कुछ आपराधिक कार्य?
  • अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी महिला का Miscarriage करवाता है, तो यह अपराध है।
  • भले ही महिला की सहमति हो, लेकिन अगर गर्भपात का कोई वैध चिकित्सा कारण नहीं है, तो यह अपराध माना जा सकता है।
  • बिना डॉक्टर की सलाह के कोई ऐसी दवा देना जो गर्भपात करवा सकती है, यह भी अपराध है।
  • गर्भपात के लिए इस्तेमाल होने वाले किसी भी उपकरण (Equipment) को देना या बेचना अपराध है।
  • अगर कोई व्यक्ति किसी और को अबॉर्शन करवाने में मदद करता है, तो वह भी अपराध का भागीदार होता है।
  • अगर कोई व्यक्ति गर्भपात करवाने के लिए किसी जगह को किराए पर देता है या उसका इस्तेमाल करने देता है, तो यह भी अपराध है।
  • अगर कोई व्यक्ति गर्भपात के बारे में झूठी या गलत जानकारी देकर किसी को गुमराह (Mislead) करता है, तो यह भी अपराध है।
  • अगर कोई व्यक्ति Miscarriage करवाने के बदले में पैसे लेता है, तो यह भी अपराध है।
  • अगर कोई व्यक्ति किसी महिला को डरा धमकाकर या किसी और तरीके से अबॉर्शन करवाने के लिए मजबूर करता है, तो यह भी एक गंभीर अपराध है।
सेक्शन 88 के अपराध का उदाहरण

        रिया एक छोटे से शहर में रहती थी। उसकी शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी। वह अभी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाई थी और शादी के कुछ महीनों बाद ही उसे पता चला कि वह गर्भवती है। उसके पति और ससुराल वाले बच्चे को नहीं चाहते थे। उन्होंने रिया पर बहुत दबाव डाला कि वह गर्भपात करवा ले। रिया बहुत डरी हुई थी लेकिन उनके दबाव में आकर उसने एक अवैध तरीके से गर्भपात (Abortion) करवा लिया।

        रिया ने जो किया वह धारा 88 के तहत अपराध है। भले ही उसने अपनी मर्जी से गर्भपात न करवाया हो, लेकिन उसके पति और ससुराल वालों ने उसे मजबूर किया था। इसके अलावा, मिसकैरेज एक अवैध तरीके से किया गया था जो महिला की जान के लिए खतरा था।

बीएनएस की धारा 88 के तहत गर्भपात की सजा

        भारतीय न्याय संहिता में बताए गए अपराध के प्रावधान (Provision) अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी महिला का गर्भपात करवाने (Causing Abortion) का दोषी (Guilty) पाया जाता है तो उसे जेल की सजा हो सकती है। इस अपराध की सजा गर्भावस्था (Pregnancy) के समय के हिसाब से तय होती है कि गर्भपात किस समय किया गया था।

  • शुरुआती समय: अगर गर्भपात गर्भावस्था के शुरुआती समय में किया गया तो दोषी व्यक्ति को तीन साल तक की जेल हो सकती है, जुर्माना लग सकता है या दोनों ही सजा हो सकती है।
  • बाद का समय: अगर गर्भपात गर्भावस्था के बाद के समय (यानि कई हफ्तों या महीनों बाद) में किया गया है तो दोषी व्यक्ति को सात साल तक की जेल हो सकती है, जुर्माना लग सकता है या दोनों ही सजा (Punishment) हो सकती है।
गर्भपात करवाने पर कब सजा नहीं होती है?

       कुछ खास परिस्थितियों में गर्भपात करने पर सजा नहीं होती है। BNS की धारा 88 के तहत, महिला की जान बचाने के लिए किया गया गर्भपात कानूनन जायज (Legally Valid) माना जाता है। इसके अलावा कुछ और स्थितियों में भी मिसकैरेज की अनुमति होती है।

आम तौर पर निम्नलिखित स्थितियों में गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है:-
  1. महिला की जान को खतरा: अगर गर्भावस्था जारी रहने से महिला की जान को खतरा हो तो गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है।
  2. गर्भ में विकलांग बच्चे का होना: अगर गर्भ में पल रहे बच्चे को कोई गंभीर विकलांगता (Severe Disability) है और वह जीवन भर बीमार रह सकता है, तो माता-पिता को गर्भपात कराने की अनुमति दी जा सकती है।
  3. बलात्कार के कारण गर्भावस्था: अगर कोई महिला बलात्कार (Rape) की शिकार हुई है और उसके गर्भ में बच्चा है, तो उसे गर्भपात कराने की अनुमति दी जा सकती है।
भारत में गर्भपात कानून

भारत में गर्भपात कानून, 1971 (Medical Termination of Pregnancy Act, 1971) के तहत गर्भपात को कुछ खास परिस्थितियों में वैध (Valid) माना जाता है।

इस कानून के अनुसार:

12 सप्ताह तक: एक डॉक्टर की सलाह से 12 सप्ताह तक का गर्भपात कराया जा सकता है।
12 से 20 सप्ताह तक: दो डॉक्टरों की सलाह से 12 से 20 सप्ताह तक का गर्भपात कराया जा सकता है।
ये परिस्थितियां ऊपर बताई गई स्थितियों के समान हो सकती हैं, जैसे कि महिला की जान को खतरा, गर्भ में विकलांग बच्चे का होना, या बलात्कार के कारण गर्भावस्था।

ध्यान देने योग्य बातें:

गर्भपात के लेकर कानून समय के साथ बदलते रहते हैं। इसलिए किसी भी निर्णय लेने से पहले आपको एक वकील या डॉक्टर (Lawyer Or Doctor) से सलाह लेनी चाहिए। भारत में अलग-अलग राज्यों के अपने अलग-अलग कानून हो सकते हैं, इसलिए आपको अपने राज्य के कानूनों के बारे में भी जानकारी लेनी चाहिए।

गर्भपात के अपराध की धारा 88 में जमानत का प्रावधान

      बीएनएस की धारा 88 के अनुसार गर्भपात के इस अपराध को गैर-संज्ञेय और जमानती (Non-Cognizable Or Bailable) माना जाता है। इसका मतलब है कि पुलिस बिना अदालत के आदेश के इस अपराध के मामले में गिरफ्तारी नहीं कर सकती और आरोपी (Accused) को जमानत (Bail) मिल सकती है। यह अपराध प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय (Triable) होता है।

निष्कर्ष:- BNS Section 88 के अनुसार गर्भपात एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है। अगर आप बच्चा गिराने कराने के बारे में सोच रहे हैं, तो आपको एक योग्य डॉक्टर या कानूनी सलाहकार से संपर्क करना चाहिए। वे आपको आपके सभी विकल्पों के बारे में बता सकते हैं और आपको सही निर्णय लेने में मदद कर सकते हैं। ऐसे मामलों में सलाह प्राप्त करने के लिए अभी के अभी आप हमारे अनुभवी वकील से बात कर सकते है।

बीएनएस की धारा 88 क्या है

(BNS Section 88)

महिला की सहमति के बिना गर्भपात करना

       जो कोई भी महिला की सहमति के बिना धारा 88 के तहत अपराध करेगा, चाहे महिला जल्दी ही बच्चे पैदा कर रही हो या नहीं, उसे आजीवन कारावास या किसी एक अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसे दस साल तक बढ़ाया जा सकता है। और जुर्माना भी देना होगा।

बीएनएस की धारा 90 क्या है

(BNS Section 90)

गर्भपात कराने के इरादे से किए गए कार्य के कारण हुई मृत्यु

(1) जो कोई, किसी गर्भवती महिला का गर्भपात कराने के इरादे से, ऐसा कोई कार्य करेगा जिससे ऐसी महिला की मृत्यु हो जाए, उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी जिसे दस साल तक बढ़ाया जा सकता है, और उसे दंडित किया जाएगा। जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

(2) जहां उप-धारा (1) में निर्दिष्ट कार्य महिला की सहमति के बिना किया जाता है, तो आजीवन कारावास या उक्त उप-धारा में निर्दिष्ट दंड से दंडनीय होगा।

स्पष्टीकरण.- इस अपराध के लिए यह आवश्यक नहीं है कि अपराधी को पता हो कि उसके कार्य से मृत्यु होने की संभावना है।

बीएनएस की धारा 91 क्या है

(BNS Section 91)

बच्चे को जीवित पैदा होने से रोकने या जन्म के बाद उसकी मृत्यु का कारण बनने के इरादे से किया गया कार्य

       जो कोई किसी बच्चे के जन्म से पहले उस बच्चे को जीवित पैदा होने से रोकने या उसके जन्म के बाद उसे मरने से रोकने के इरादे से कोई कार्य करता है, और ऐसे कार्य के द्वारा उस बच्चे को जीवित पैदा होने से रोकता है, या ऐसा करता है। उसके जन्म के बाद मृत्यु हो जाती है, यदि ऐसा कार्य मां के जीवन को बचाने के उद्देश्य से सद्भावना से नहीं किया गया है, तो उसे दस साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों में से किसी एक अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जा सकता है। दोनों।

बीएनएस की धारा 92 क्या है

(BNS Section 92)

गैर इरादतन हत्या की श्रेणी में आने वाले अजन्मे बच्चे की मृत्यु का कारण बनना

         जो कोई ऐसी परिस्थितियों में कोई कार्य करता है, कि यदि उसने मृत्यु कारित की तो वह गैर इरादतन हत्या का दोषी होगा, और ऐसे कार्य से किसी अजन्मे बच्चे की मृत्यु कारित करता है, तो उसे एक अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा। दस साल तक की सजा हो सकती है और जुर्माना भी देना होगा।

रेखांकन

        ए, यह जानते हुए कि उससे एक गर्भवती महिला की मृत्यु होने की संभावना है, ऐसा कार्य करता है, जिससे यदि महिला की मृत्यु होती, तो वह गैर इरादतन हत्या की श्रेणी में आता। स्त्री घायल तो होती है, पर मरती नहीं; लेकिन इससे उसके गर्भ में पल रहे एक अजन्मे बच्चे की मृत्यु हो जाती है। ए इस धारा में परिभाषित अपराध का दोषी है। बच्चों के विरुद्ध अपराध के बारे में

बीएनएस की धारा 93 क्या है

(BNS Section 93)

बारह वर्ष से कम उम्र के बच्चे को माता-पिता या उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति द्वारा एक्सपोज़र और परित्याग

      जो कोई बारह वर्ष से कम उम्र के बच्चे का पिता या माता होते हुए, या ऐसे बच्चे की देखभाल करते हुए, ऐसे बच्चे को पूरी तरह से त्यागने के इरादे से किसी भी स्थान पर उजागर करेगा या छोड़ देगा, उसे कारावास से दंडित किया जाएगा। या तो एक अवधि के लिए विवरण जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है, या जुर्माना, या दोनों के साथ।

स्पष्टीकरण.- इस धारा का उद्देश्य अपराधी पर हत्या या गैर इरादतन हत्या, जैसा भी मामला हो, के मुकदमे को रोकना नहीं है, यदि जोखिम के परिणामस्वरूप बच्चे की मृत्यु हो जाती है।

बीएनएस की धारा 94 क्या है

(BNS Section 94)

मृत शरीर के गुप्त निपटान द्वारा जन्म को छिपाना

         जो कोई, किसी बच्चे के शव को गुप्त रूप से दफनाकर या अन्यथा निपटान करके, चाहे वह बच्चा उसके जन्म से पहले या बाद में या जन्म के दौरान मर गया हो, जानबूझकर ऐसे बच्चे के जन्म को छिपाएगा या छिपाने का प्रयास करेगा, उसे दोनों में से किसी भी तरह के कारावास से दंडित किया जाएगा। जिसकी अवधि दो वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है, या जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

बीएनएस की धारा 95 क्या है

(BNS Section 95)

अपराध करने के लिए बच्चे को काम पर रखना, नियोजित करना या नियुक्त करना

जो कोई भी अपराध करने के लिए अठारह वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को काम पर रखता है, नियोजित करता है या संलग्न करता है, उसे उस अपराध के लिए कारावास या जुर्माने से दंडित किया जाएगा जैसे कि अपराध ऐसे व्यक्ति द्वारा स्वयं किया गया हो।

स्पष्टीकरण.- यौन शोषण या अश्लील साहित्य के लिए किसी बच्चे को काम पर रखना, नियोजित करना, संलग्न करना या उपयोग करना इस धारा के अर्थ में शामिल है।

बीएनएस की धारा 96 क्या है

(BNS Section 96)

बच्चे की प्राप्ति

          जो कोई, किसी भी तरह से, अठारह वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे को किसी स्थान से जाने या कोई कार्य करने के लिए इस आशय से प्रेरित करेगा कि ऐसा बच्चा अठारह वर्ष से कम आयु का हो सकता है, या यह जानते हुए कि ऐसा होने की संभावना है। यदि किसी बच्चे को किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाएगा या बहकाया जाएगा तो उसे कारावास की सजा होगी, जिसे दस साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

बीएनएस की धारा 97 क्या है

(BNS Section 97)

दस साल से कम उम्र के बच्चे का अपहरण या उससे चोरी करने के इरादे से अपहरण करना

      जो कोई दस वर्ष से कम उम्र के किसी बच्चे का अपहरण या अपहरण ऐसे बच्चे से बेईमानी से कोई चल संपत्ति लेने के इरादे से करेगा, उसे सात साल तक की अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी, और उसे दंडित किया जाएगा। जुर्माना भी देना होगा.

बीएनएस की धारा 98 क्या है

(BNS Section 98)

वेश्यावृत्ति आदि के लिए बच्चे को बेचना

        जो कोई अठारह वर्ष से कम उम्र के बच्चे को बेचता है, किराए पर देता है, या अन्यथा निपटान करता है, इस इरादे से कि ऐसे बच्चे को किसी भी उम्र में वेश्यावृत्ति या किसी व्यक्ति के साथ अवैध संबंध या किसी गैरकानूनी और अनैतिक उद्देश्य के लिए नियोजित या उपयोग किया जाएगा। , या यह जानते हुए कि यह संभावना है कि ऐसे व्यक्ति को किसी भी उम्र में नियोजित किया जाएगा या ऐसे किसी उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाएगा, किसी एक अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा जिसे दस साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

स्पष्टीकरण 1.—जब अठारह वर्ष से कम आयु की महिला को किसी वेश्या को या वेश्यालय रखने या प्रबंधित करने वाले किसी व्यक्ति को बेच दिया जाता है, किराये पर दे दिया जाता है, या अन्यथा बेच दिया जाता है, तो ऐसी महिला का इस प्रकार निपटान करने वाला व्यक्ति, जब तक कि इसके विपरीत न हो साबित हो गया है, तो यह माना जाएगा कि उसे इस इरादे से ठिकाने लगाया गया है कि उसका उपयोग वेश्यावृत्ति के उद्देश्य के लिए किया जाएगा।

स्पष्टीकरण 2.—इस धारा के प्रयोजनों के लिए “अवैध संभोग” का अर्थ उन व्यक्तियों के बीच यौन संबंध है जो विवाह या किसी संघ या बंधन से एकजुट नहीं हैं, जो हालांकि विवाह की श्रेणी में नहीं आता है, लेकिन समुदाय के व्यक्तिगत कानून या रीति-रिवाज द्वारा मान्यता प्राप्त है। वे किससे संबंधित हैं या, जहां वे अलग-अलग समुदायों से संबंधित हैं, ऐसे दोनों समुदायों से, उनके बीच एक अर्ध-वैवाहिक संबंध बनता है।

बीएनएस की धारा 99 क्या है

(BNS Section 99)

वेश्यावृत्ति आदि के लिए बच्चे को खरीदना

       जो कोई अठारह वर्ष से कम उम्र के किसी बच्चे को इस इरादे से खरीदता है, किराये पर लेता है या अन्यथा कब्ज़ा प्राप्त करता है कि ऐसे व्यक्ति को किसी भी उम्र में वेश्यावृत्ति या किसी व्यक्ति के साथ अवैध संबंध या किसी गैरकानूनी और अनैतिक उद्देश्य के लिए नियोजित या उपयोग किया जाएगा। या यह जानते हुए कि ऐसे बच्चे को किसी भी उम्र में नियोजित किया जाएगा या ऐसे किसी उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाएगा, उसे किसी भी अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी जो सात साल से कम नहीं होगी लेकिन जिसे चौदह साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

स्पष्टीकरण 1.- कोई भी वेश्या या वेश्यालय चलाने या प्रबंधित करने वाला कोई भी व्यक्ति, जो अठारह वर्ष से कम आयु की महिला को खरीदता है, किराये पर लेता है या अन्यथा उसका कब्ज़ा प्राप्त करता है, जब तक कि विपरीत साबित न हो जाए, यह माना जाएगा कि उसने ऐसी महिला का कब्ज़ा प्राप्त कर लिया है। इरादा यह था कि उसका उपयोग वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से किया जाएगा।

स्पष्टीकरण 2.-“अवैध संभोग” का वही अर्थ है जो धारा 96 में है।

बीएनएस की धारा 100 क्या है

(BNS Section 100)

गैर इरादतन हत्या

        जो कोई अठारह वर्ष से कम उम्र के बच्चे को बेचता है, किराए पर देता है, या अन्यथा निपटान करता है, इस इरादे से कि ऐसे बच्चे को किसी भी उम्र में वेश्यावृत्ति या किसी व्यक्ति के साथ अवैध संबंध या किसी गैरकानूनी और अनैतिक उद्देश्य के लिए नियोजित या उपयोग किया जाएगा। , या यह जानते हुए कि यह संभावना है कि ऐसे व्यक्ति को किसी भी उम्र में नियोजित किया जाएगा या ऐसे किसी उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाएगा, किसी एक अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा जिसे दस साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

स्पष्टीकरण 1.—जब अठारह वर्ष से कम आयु की महिला को किसी वेश्या को या वेश्यालय रखने या प्रबंधित करने वाले किसी व्यक्ति को बेच दिया जाता है, किराये पर दे दिया जाता है, या अन्यथा बेच दिया जाता है, तो ऐसी महिला का इस प्रकार निपटान करने वाला व्यक्ति, जब तक कि इसके विपरीत न हो साबित हो गया है, तो यह माना जाएगा कि उसे इस इरादे से ठिकाने लगाया गया है कि उसका उपयोग वेश्यावृत्ति के उद्देश्य के लिए किया जाएगा।

स्पष्टीकरण 2.—इस धारा के प्रयोजनों के लिए “अवैध संभोग” का अर्थ उन व्यक्तियों के बीच यौन संबंध है जो विवाह या किसी संघ या बंधन से एकजुट नहीं हैं, जो हालांकि विवाह की श्रेणी में नहीं आता है, लेकिन समुदाय के व्यक्तिगत कानून या रीति-रिवाज द्वारा मान्यता प्राप्त है। वे किससे संबंधित हैं या, जहां वे अलग-अलग समुदायों से संबंधित हैं, ऐसे दोनों समुदायों से, उनके बीच एक अर्ध-वैवाहिक संबंध बनता है।

बीएनएस की धारा 101 क्या है

(BNS Section 101)

हत्या

        जो कोई अठारह वर्ष से कम उम्र के किसी बच्चे को इस इरादे से खरीदता है, किराये पर लेता है या अन्यथा कब्ज़ा प्राप्त करता है कि ऐसे व्यक्ति को किसी भी उम्र में वेश्यावृत्ति या किसी व्यक्ति के साथ अवैध संबंध या किसी गैरकानूनी और अनैतिक उद्देश्य के लिए नियोजित या उपयोग किया जाएगा। या यह जानते हुए कि ऐसे बच्चे को किसी भी उम्र में नियोजित किया जाएगा या ऐसे किसी उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाएगा, उसे किसी भी अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी जो सात साल से कम नहीं होगी लेकिन जिसे चौदह साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

स्पष्टीकरण 1.- कोई भी वेश्या या वेश्यालय चलाने या प्रबंधित करने वाला कोई भी व्यक्ति, जो अठारह वर्ष से कम आयु की महिला को खरीदता है, किराये पर लेता है या अन्यथा उसका कब्ज़ा प्राप्त करता है, जब तक कि विपरीत साबित न हो जाए, यह माना जाएगा कि उसने ऐसी महिला का कब्ज़ा प्राप्त कर लिया है। इरादा यह था कि उसका उपयोग वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से किया जाएगा।

स्पष्टीकरण 2.-“अवैध संभोग” का वही अर्थ है जो धारा 96 में है।

बीएनएस की धारा 102 क्या है

(BNS Section 102)

जिस व्यक्ति की मृत्यु का इरादा था उसके अलावा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित करके गैर इरादतन हत्या

        यदि कोई व्यक्ति, ऐसा कुछ भी करके, जिसका वह इरादा रखता है या जानता है कि मृत्यु कारित होने की संभावना है, किसी ऐसे व्यक्ति की मृत्यु कारित करके गैर इरादतन हत्या करता है, जिसकी मृत्यु न तो वह चाहता है और न ही जानता है कि मौत कारित होने की संभावना है, तो गैर इरादतन हत्या की जाती है। अपराधी द्वारा इस प्रकार का वर्णन किया गया है कि यह तब होता जब उसने उस व्यक्ति की मृत्यु कारित की होती जिसकी मृत्यु वह चाहता था या स्वयं जानता था कि वह मृत्यु कारित कर सकता है।

बीएनएस की धारा 103 क्या है

(BNS Section 103)

हत्या 

       हत्या किसी भी व्यक्ति द्वारा किए जाने वाला सबसे गंभीर अपराधों में से एक है। किसी व्यक्ति पर हमला कर उसे जान से मार देना आजकल आपराधिक मानसिकता रखने वाले लोगों के लिए एक आम सी बात हो गई है। लेकिन कई बार ऐसे अपराध गुस्से व पुरानी रंजिश (Old Rivalry) जैसे कारणों की वजह से भी हो जाते है। जिसका परिणाम हमारे साथ-साथ हमारे पूरे परिवार को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए आज हम ऐसे ही अपराध से जुड़ी भारतीय न्याय संहिता की धारा के बारे में जानेंगे, कि बीएनएस की धारा 103 (1) & (2) क्या है – BNS Section 103 और यह कब लागू होती है? हत्या के अपराध की सजा और जमानत के क्या प्रावधान है?

     एक अच्छा कानून किसी देश की नींव के रूप में कार्य करता है, व्यवस्था सुनिश्चित करता है और अपने नागरिकों के जीवन की रक्षा करता है। इसलिए हमारे देश में भी समय-समय पर अपराधों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाते है, जैसे पहले हत्या के मामलों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 के तहत दर्ज किया जाता था। लेकिन अब हत्या के मामलों को नए कानून यानि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103 के तहत दर्ज किया जाने लगा है। जिसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे इस आर्टिकल को अंत तक पढ़े।

बीएनएस की धारा 103 (1) क्या है – BNS Section 103 

       भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 हत्या (Murder) के अपराध को परिभाषित करती है, जिसमें बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर (Intentionally) किसी अन्य व्यक्ति को जान से मारने के लिए हमला करता है। व उस हमले से सामने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो वह हत्या कहलाती है। इसलिए जो कोई भी किसी व्यक्ति की हत्या करता है उस पर अब बीएनएस की धारा 103 के तहत कार्यवाही की जाती है।

NOTE:- कुछ समय पहले तक हत्या के मामलों में IPC Section 302 (पुराना कानून) लागू होती थी, लेकिन बीएनएस के लागू होने के बाद से अब भविष्य में हत्या के सभी मामलों को BNS Section 103 के दर्ज कर कार्यवाही की जाएगी।

हत्या के अपराध को समझने के लिए आवश्यक मुख्य बातें
  • जान-बूझकर हत्या: इसमें यह देखा जाता है कि हत्या करने वाले व्यक्ति का इरादा पहले से ही किसी को जान से मारने का था।
  • गैर-कानूनी तरीका: हत्या का कार्य गैर-कानूनी (illegal) होना चाहिए, यानी कि किसी वैध कारण (Valid Reason) के बिना और कानून के खिलाफ जाकर किया गया हो।
धारा 103 (1) के तहत हत्या के अपराध की सजा – Punishment Of BNS 103

       भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 हत्या के अपराध के लिए कठोर दंड निर्धारित करती है। हत्या जैसा गंभीर अपराध करने के दोषी व्यक्ति को दो प्रकार से दंडित किया जा सकता है:-

मृत्यु दंड: भारतीय कानून के अनुसार मृत्यु दंड (Death penalty) को सबसे कठोर दंड माना जाता है और विशेष रूप से जघन्य (Heinous) माने जाने वाले मामलों में ही दोषी (Guilty) व्यक्ति को दिया जाता है। ज्यादा क्रूरता, भाड़े पर हत्या, या जाति, धर्म, आदि के आधार पर हत्या जैसे मामलों में मृत्युदंड देने की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है।

आजीवन कारावास: इस सजा में व्यक्ति को अपना शेष यानी बचा हुआ जीवन जेल में ही बिताना पड़ता है। यह दंड अकसर तब लगाया जाता है जब हत्या के अपराध में मृत्युदंड को उचित ठहराने वाली बातों या सबूतों (Evidences) की कमी पाई जाती है। इसके साथ ही, BNS Section 103 कारावास की सजा के साथ-साथ जुर्माना लगाने की अनुमति भी देती है।

बीएनएस धारा 103 के तहत हत्या के अपराध का उदाहरण

        एक गांव में राजू नाम का एक बहुत ही शांत स्वभाव का इंसान रहता था। राजू अपनी पत्नी राधा और अपने छोटे बेटे के साथ वहाँ रहता था। उनके जीवन में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन एक शाम ने सब कुछ बदल दिया। राजू का पड़ोसी श्याम एक गुस्सैल स्वभाव का व्यक्ति था। कई हफ़्तों से वह एक छोटे से ज़मीन विवाद को लेकर राजू से नाराज़ था।

       एक रात गुस्से में श्याम ने राजू से लड़ाई करने का फैसला किया। जिसके बाद वो चाकू लेकर राजू के घर में घुस गया और उसके साथ बहस करने लगा। बहस जल्दी ही इतनी बढ़ गई, कि गुस्से में श्याम ने राजू को चाकू मार दिया। जिससे राजू बेजान होकर ज़मीन पर गिर पड़ा, और वही पर उसकी मौत हो गई।

        जब ग्रामीणों को पता चला, तो पुलिस को बुलाया गया। जिसके बाद पुलिस ने आते ही श्याम को राजू की हत्या करने के अपराध में बीएनएस की धारा 103 के तहत गिरफ्तार कर लिया।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 की उपधारा 2 क्या है
भेदभावपूर्ण इरादे से भीड़ द्वारा हत्या 103 (2) (lynching with discriminatory intent)

      बीएनएस की धारा 103 की उपधारा 2 (Sub Section2) में बताया गया है कि जब पाँच लोग या उससे अधिक समूह (Group) के लोग किसी व्यक्ति की हत्या करने में एक साथ मिलकर काम को करते है, तो यह धारा उन सभी व्यक्तियों पर समान रुप से लागू होती है।

हत्या की धारा 103 (2) के मुख्य बिन्दु
  • पाँच या अधिक लोगों का समूह: यह उपधारा विशेष रूप से उन स्थितियों पर लागू होती है जहाँ पाँच या अधिक लोगों का समूह एक साथ काम करता है।
  • एक साथ काम करना: समूह के सभी सदस्यों का लक्ष्य किसी एक व्यक्ति को जान से मारने का होना चाहिए।
  • भेदभावपूर्ण आधार पर हत्या: हत्या नस्ल, जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान, भाषा या इसी तरह के आधार पर होनी चाहिए।
बीएनएस सेक्शन 103(2) के तहत सजा क्या है

        धारा 103 की उपधारा 2 में सजा के लिए बताया गया है कि यदि किसी व्यक्ति की हत्या में पाँच या कोई समूह के लोग शामिल होते है, तो उस समूह के प्रत्येक सदस्य को जुर्माने (Fine) के साथ-साथ मौत या आजीवन कारावास (life imprisonment) तक की सजा (Punishment) दी जा सकती है। आइये इसे एक उदाहरण द्वारा समझने का प्रयास करते है।

उदाहरण :- मान लीजिए प्रदीप नाम के एक व्यक्ति को मारने के लिए 5 लोग एक साथ तैयारी करते है। एक दिन वे 5 लोग मिलकर प्रदीप को पकड़ लेते है, और उनमें एक व्यक्ति प्रदीप को चाकू मार देता है। जिसके बाद प्रदीप की वही पर मृत्यु हो जाती है। कुछ दिनों बाद पुलिस उन सभी लोगों को गिरफ्तार कर लेती है। जिसके बाद न्यायालय द्वारा उन सभी 5 लोगों को उम्रकैद की सजा दे दी जाती है, इसमें ध्यान रखने योग्य बात यह है कि भले ही प्रदीप को चाकू एक ही व्यक्ति ने मारा था। लेकिन प्रदीप की हत्या की योजना सभी की थी।

BNS Section 103 (1) & (2) में जमानत कैसे मिलती है

        बीएनएस की धारा 103 के अनुसार हत्या के मामलों में जमानत (Bail) देना एक बेहद संवेदनशील (Sensitive) मामला है। किसी भी व्यक्ति को जान से मार देना एक जघन्य अपराध (Heinous offence) होता है, इसी कारण यह एक संज्ञेय श्रेणी (Cognizable) का अपराध कहलाता है। हत्या जैसे अपराध की गंभीरता को देखते हुए ही सेक्शन 103 को गैर-जमानती (Non-bailable) रखा गया है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को हत्या के अपराध के लिए गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे जमानत मिलना बहुत ही मुश्किल हो जाता है।

     लेकिन न्यायालय के पास कुछ असाधारण परिस्थितियों में जमानत देने का विवेक है, आइये जानते है वे स्थिति कौन सी है:-

  • साक्ष्य की ताकत: यदि अभियुक्त (Accused) के खिलाफ अभियोजन पक्ष (Prosecutors) का मामला कमजोर लगता है, तो जमानत पर विचार किया जा सकता है। जैसे:- सबूतों की कमी, गलत जानकारी प्राप्त होना, आदि।
  • भागने का जोखिम: जमानत पर रहते हुए अभियुक्त के फरार होने की संभावना एक बड़ी चिंता का विषय है। इसलिए यदि न्यायालय को लगता है कि आरोपी व्यक्ति जमानत के बाद कही भागेगा नहीं तो कुछ विशेष स्थितियों में जमानत मिलने की उम्मीद हो सकती है।
  • सार्वजनिक हित: न्यायालय सार्वजनिक सुरक्षा (Public Security) को प्राथमिकता (Priority) दे सकता है और यदि अभियुक्त को रिहा करने से खतरा पैदा होता है तो जमानत देने से इनकार कर सकता है।
भारत में हत्या के अपराध को न्यायालय में साबित करने के लिए मुख्य बिंदु
  • मृत्यु का प्रमाण: मृत व्यक्ति का शव और उसके मृत्यु का प्रमाण (Death Certificate) होना आवश्यक है। बिना शव (Dead Body) के इस जुर्म को साबित करना बहुत कठिन होता है।
  • मृत्यु का कारण: पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के माध्यम से यह पता लगाना कि मृत व्यक्ति की मृत्यु कैसे हुई, जैसे कि गोली मारना, चाकू मारना, जहर देना, आदि।
  • हत्या का कारण: यह साबित करना कि आरोपी के पास हत्या करने का कोई कारण था, जैसे कि बदला, पैसे की लालच, व्यक्तिगत दुश्मनी, आदि।
  • मौका और समय: आरोपी का घटना के समय और स्थान पर मौजूद होना, इसे साबित करने के लिए गवाहों और तकनीकी प्रमाणों (Technical Evidences) का सहारा लिया जाता है।
  • गवाहों के बयान: चश्मदीद गवाहों (Eye witnesses) के बयान जो घटना के समय वहां मौजूद थे और जिन्होंने अपराध को देखा।
  • डीएनए और फॉरेंसिक साक्ष्य: डीएनए, फिंगरप्रिंट, खून के धब्बे, बाल, और अन्य फॉरेंसिक साक्ष्य जो आरोपी को अपराध स्थल से जोड़ सकते हैं।
  • अपराध स्थल की जाँच: अपराध स्थल की जाँच से प्राप्त हुए साक्ष्य, जैसे कि हथियार, खून के धब्बे, और अन्य सुराग जो अपराध को साबित करने में मदद करते हैं।
  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य: मोबाइल फोन रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, ईमेल, और सोशल मीडिया संदेश जो आरोपी के अपराध में शामिल होने को दर्शाता है।
  • आरोपी का बयान: आरोपी द्वारा दिया गया बयान और अगर उसने अपराध को स्वीकार किया हो, तो उसका रिकॉर्ड।
  • पहले के आपराधिक रिकॉर्ड :- आरोपी का पहले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड होना, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी पहले भी किसी अपराध में शामिल रहा है।

        इन सभी बातों के द्वारा हत्या के अपराध को अदालत में साबित किया जा सकता है। हत्या की धारा 103 से संबधित आम पूछे जाने वाले आम सवालों के जवाब हमने नीचे दिए है।

बीएनएस की धारा 104 क्या है

(BNS Section 104)

आजीवन कारावास की सजा

       जो कोई भी, आजीवन कारावास की सजा के तहत, हत्या करेगा, उसे मौत या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा, जिसका अर्थ उस व्यक्ति के प्राकृतिक जीवन का शेष भाग होगा।

बीएनएस की धारा 105 क्या है

(BNS Section 105)

गैर इरादतन हत्या

        मान लीजिए, कुछ दोस्त एक साथ किसी यात्रा पर जाते है और वहाँ हंसी-मजाक के दौरान उनमें से कोई भी व्यक्ति अंजाने में ऐसा काम कर देता है। जिसके कारण किसी व्यक्ति की जान चली जाती है। ऐसे में एक पल की लापरवाही किसी आम इंसान को पूरी जिंदगी के लिए अपराधी बना सकती है। इस लेख द्वारा हम समझेंगे कि कानून इस तरह की घटनाओं को कैसे देखता है और कोई भी व्यक्ति इस तरह की मुसीबत से कैसे बच सकते हैं। इस तरह के मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 105 के तहत कार्यवाही की जाती है। इसलिए आज हम आपको बताएंगे की बीएनएस की धारा 105 क्या है (BNS Section 105)? गैर इरादतन हत्या के बीएनएस सेक्शन में सजा, जमानत और बचाव की पूरी जानकारी।

        गैर-इरादतन हत्या यानी बिना किसी इरादे के हत्या का यह अपराध पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 के तहत लागू किया जाता था। लेकिन इन सभी कानूनों को बीएनएस से बदलने के बाद से इस अपराध को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 के तहत लागू किया जाने लगा है। इसलिए जिन लोगों पर इस धारा के तहत आरोप लगाए गए है, उनको इस अपराध के सभी प्रावधानों व बचाव उपायों की जानकारी होना बहुत ही आवश्यक है। साथ ही आम लोगों से लेकर कानूनी पढ़ाई करने वाले छात्रों तक सभी के लिए यह लेख बहुत उपयोगी होने वाला है। इसलिए बिना समय गवाए ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए इस लेख को पूरा जरुर पढ़े।

बीएनएस धारा 105 क्या है और यह कब लागू होती है – BNS Section 105 

        भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 में गैर इरादतन हत्या (Culpable Homicide) के अपराध को परिभाषित किया गया है। इसमें कहा गया है जो कोई भी किसी व्यक्ति की गैर इरादतन हत्या करता है। जो हत्या (Murder) के अपराध से अलग होती है, तो ऐसे अपराध को करने वाले व्यक्ति पर बीएनएस की धारा 105 के अंतर्गत कार्यवाही की जाती है। आइये गैर इरादतन हत्या को आसान भाषा में विस्तार से समझते है।

        जब भी कोई व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करता है, जिसको करते समय उसे पता होता है कि उसके किए गए कार्य के द्वारा किसी व्यक्ति की जान जा सकती है, तो वह गैर इरादतन हत्या का अपराध कहलाता है। लेकिन यह हत्या के अपराध की धारा से अलग होता है, क्योंकि हत्या के अपराध में आरोपी का किसी व्यक्ति को जान से मारने का पहले से ही इरादा (Intention) होता है।

उदाहरण:- जैसे कोई व्यक्ति लापरवाही से गाड़ी चलाता है और लापरवाही के कारण ही उसकी गाड़ी किसी को टक्कर मार देती है। जिसके बाद आरोपी व्यक्ति को पता होता है कि अब उस व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है या हो जाती है। तो वह गैर-इरादतन हत्या कहलाती है।

गैर इरादतन हत्या व हत्या में क्या अंतर है?

अकसर लोग गैर इरादतन हत्या (Culpable Homicide) व हत्या (Murder) के बारे में जानकारी ना होने के कारण विचलित हो जाते है। इसलिए इस लेख में आगे की और बढ़ने से पहले आपका इन दोनों के बीच के अंतर को जानना बहुत ही जरुरी है।

  • गैर इरादतन हत्या :- गैर इरादतन हत्या भी किसी व्यक्ति की जान लेने से ही संबंधित होती है। लेकिन यह हत्या के अपराध से अलग इसलिए होती है क्योंकि इसमें जानबूझकर (Intentionally) किसी व्यक्ति की हत्या करने का पहले से ही कोई इरादा नहीं होता है। इसमें कोई व्यक्ति अचानक ऐसा कार्य कर देता है। जिसको किए जाने के बाद उसे पता चल जाता है, कि जो उसने किया है उससे सामने वाले व्यक्ति की मौत होने की पुरी संभावना है।
  • हत्या:- हत्या के अपराध में आरोपी व्यक्ति (Accused Person) का पहले से ही किसी व्यक्ति को जानबूझकर मारने का इरादा होता है। जिसमें वो व्यक्ति पहले स पुरी योजना बनाकर आता है और किसी व्यक्ति को जान से मार देता है।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 के आवश्यक तत्व (Key Point)
  • आरोपी अपने किए गए कार्यों के द्वारा किसी इंसान की मौत का कारण बना होगा।
  • व्यक्ति यह जानता था कि उसके कार्यों से गंभीर चोट या मृत्यु हो सकती है, भले ही वह हत्या नहीं करना चाहता हो।
  • आरोपी का पहले से किसी व्यक्ति की जान लेने का इरादा नहीं होगा।
  • यदि कोई व्यक्ति इस अपराध को दोषी (Guilty) पाया जाता है तो उसे गंभीर सजा का सामना करना पड़ सकता है।
BNS 105 के तहत अपराध में शामिल मुख्य कार्य
  • यदि कोई व्यक्ति लापरवाही (Negligence) से अपने वाहन को चलाता है, जिससे किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए।
  • गुस्से में आकर किसी पर हमला (Attack) करना और उससे किसी व्यक्ति की मौत जाना।
  • यदि कोई व्यक्ति किसी भारी वस्तु को ऊंचाई से गिराता है और वो वस्तु किसी व्यक्ति पर गिर जाती है, और उसकी मौत हो जाती है।
  • यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को कई दिनों तक भूखा या प्यासा रखता है और उसकी मौत हो जाती है।
  • यदि कोई व्यक्ति शादी या अन्य किसी समारोह में कोई हथियार (Weapon) चलाता है, जिससे किसी की मौत हो जाती है।
  • किसी व्यक्ति को अनजाने में पानी में डुबा देना।
  • किसी को खेलते समय मजाक में धक्का दे देना।

इनसे अलग भी कई ऐसे कार्य हो सकते है जिनको करने पर गैर इरादतन हत्या के अपराध की धारा 105 के तहत किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है। इसलिए अंजाने में भी कोई ऐसा कार्य ना करें, जिससे किसी व्यक्ति को गंभीर चोट लगने या मृत्यु होने की संभावना बन जाए।

बीएनएस सेक्शन 105 के जुर्म का उदाहरण

        राहुल और सविता दोनों पति-पत्नी थे। उनकी शादी को हुए काफी समय हो गया था, लेकिन एक दिन दोनों के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हो जाता है। कुछ ही देर बाद दोनों के बीच झगड़ा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, और राहुल गुस्से में सविता को पास ही पड़ी एक मजबूत वस्तु उठाकर मार देता है। जिसके कारण सविता को बहुत ही गंभीर चोट लग जाती है, और कुछ ही समय बात उसकी मृत्यु हो जाती है।

      जिसके बाद पुलिस राहुल को सविता को मारने के अपराध में गिरफ्तार कर लेती है। इसके साथ ही पुलिस राहुल पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 के तहत गैर-इरादतन हत्या के अपराध के तहत मामला दर्ज कर लेती है। क्योंकि राहुल का पहले से ही जानबूझकर सविता को मारने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन वह जानता था कि अगर किसी मजबूत वस्तु से हमला करेगा तो वह सामने वाले व्यक्ति के लिए खतरनाक हो सकता है।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 में सजा कितनी होती है

       भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 के अनुसार गैर इरादतन हत्या के अपराध के दोषी (Guilty) पाये जाने वाले व्यक्ति को कम से कम 5 वर्ष की सजा से लेकर आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा से दंडित (Punished) किया जा सकता है। जिसमें दोषी व्यक्ति को अपनी पूरी जिंदगी जेल में ही रहने पड़ सकता है। इसके अलावा अदालत द्वारा दोषी पाये जाने वाले व्यक्ति पर जुर्माना (Fine) भी लगा सकती है। जिसमें जुर्माने की राशि अपराध की गंभीरता को देखते हुए तय की जा सकती है।

BNS Section 105 में जमानत कब व कैसे मिलती है

      बीएनएस की धारा 105 का यह अपराध किसी व्यक्ति की जान लेने से जुड़ा हुआ है, इसी कारण से इसे गंभीर अपराध माना जाता है। गैर-इरादतन हत्या के अपराध की गंभीरता के कारण ही इसे संज्ञेय व गैर-जमानती (Cognizable or Non-Bailable) अपराध की श्रेणी में रखा गया है। जिसका मतलब है कि इस अपराध के तहत गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को जमानत नहीं दी जा सकती।

      ऐसे अपराध करने वाले व्यक्तियों को समाज के लिए खतरा मानते हुए व जमानत (Bail) मिलने पर भाग जाने जैसी बातों के कारण जमानत नहीं दी जा सकती। परन्तु कुछ विशेष परिस्थितियों में अदालत द्वारा जमानत के लिए विचार किया जा सकता है, जिनकी ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए आप हमारे वकील (Lawyer) की सहायता ले सकते है।

धारा 105 के तहत आरोपी व्यक्तियों के लिए बचाव के उपाय
  • इस प्रकार के अपराधों के आरोप लगने पर सबसे पहले किसी ऐसे वकील को अपने केस के लिए चुने जो हत्या के मामलों में विशेषज्ञ (Expert) हो।
  • इसके बाद अपने वकील को अपने मामले से जुड़ी सारी जानकारी विस्तार से बताए।
  • यदि आपने कोई अपराध नहीं किया है तो अपने बचाव (Defence) से संबंधित जो भी सबूत (Evidence) आपके पास हो उन्हें इकट्ठा करें।
  • यदि अपराध किसी अन्य व्यक्ति ने किया है और आरोप (Blame) आप पर लगाए गए है तो उस व्यक्ति के खिलाफ सबूत जरुर पेश करें।
  • अगर आपने अपनी आत्मरक्षा (Self Defence) में की कार्य किया था तो इस बात को भी न्यायालय में जरुर रखें।
  • ऐसे लोगों को ढूंढें जो आपके पक्ष में गवाही दे सकें।
  • पुलिस की जांच के दौरान भी अपना पूरा सहयोग करें व अपने अधिकारों के प्रति जागरुक रहे।
  • अगर आप निर्दोष (Innocent) है और यदि निचली अदालत आप दोषी ठहराती है, तो आप उच्च न्यायालय (High Court) में अपील कर सकते हैं।
निष्कर्ष :- BNS Section 105 गैर- इरादतन हत्या के दोषी व्यक्तियों के लिए कठोर से कठोर सजा का प्रावधान (Provision) करती है। जिसका उद्देश्य ऐसे अपराधों को रोकना व समाज के सभी लोगों को सुरक्षित रखना है। अगर आप इस अपराध से संबंधित कोई भी कानूनी सहायता (Legal Help) प्राप्त करना चाहते है तो हमारे वकीलों से आज ही घर बैठे बात कर सकते है।

बीएनएस की धारा 106 क्या है

(BNS Section 106)

        दोस्तों जैसा की आप सभी जानते है, हमारे देश में कुछ समय पहले ही 3 बड़े कानूनों को बनाया गया है। जिन्हें 1 जुलाई 2024 से संपूर्ण भारत देश में लागू कर दिया गया है। हमारे देश में अभी तक भारतीय दंड संहिता (IPC) लागू था, जिसके तहत आपराधिक मामलों को दर्ज किया जाता था और दोषी पाये जाने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाता था। लेकिन अब भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) को भारतीय न्याय संहिता (Bhartiya Nyaya Sanhita) से बदल दिया गया है। आज हम आपको भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106 के बारे में बताएंगे कि धारा 106 (1) और (2) क्या है? (BNS Section 106 in Hindi), बीएनएस 106 कब लगती है? इस धारा में सजा और जमानत कैसे मिलती है?

       किसी भी प्रकार की लापरवाही (Negligence) से होने वाली मौतों को भारत में बहुत ही गंभीरता से लिया जाता है, अक्सर देखा जाता है कि कई बार किसी व्यक्ति के द्वारा की गई लापरवाही या जल्दबाजी किसी मासूम व्यक्ति की मृत्यु का कारण बन जाती है। ऐसे ही अपराधों का जल्द से जल्द निपटान करने व दोषी व्यक्ति को सख्त से सख्त सजा (Punishment) देने के प्रावधान बीएनएस 106 के अंदर बताया गया है।

भारतीय न्याय संहिता धारा 106 – BNS Section 106 

        हाल ही में हुए कानूनी बदलाव से पहले लापरवाही के कारण होने वाली मौत के अपराध के लिए आईपीसी की धारा 304ए के तहत कार्यवाही की जाती थी। परन्तु अब इस आपराधिक मामले को BNS Section 106 के तहत दर्ज कर कार्यवाही की जाएगी। बीएनएस सेक्शन 106 को दो उपधारा (Sub Sections) में बाँटा गया है BNS 106 (1) और BNS 106 (2)।

      नए कानून लागू होने की वजह से आप और हम जैसे बहुत से लोगों को नए कानूनों की जानकारी खोजने के लिए बहुत परेशान होना पड़ता है। इसलिए आज हम आप सभी की इस समस्या का समाधान करते हुए भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 व इसकी उपधाराओं को विस्तार से जानते हुए संपूर्ण जानकारी बहुत ही सरल भाषा में आपको देंगे।

BNS Section 106 (1) क्या है – यह धारा कब लगती है?

         भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (1) में बताया गया है यदि किसी व्यक्ति के द्वारा की गई लापरवाही या जल्दबाजी से किसी व्यक्ति की मृत्यु (Causing Death by Negligence) हो जाती है तो उस व्यक्ति पर BNS Section 106 (1) के तहत कार्यवाही की जाएगी। जिसका अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति लापरवाही से कोई भी ऐसा कार्य करता है जिससे किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उस पर BNS 106 (1) लागू कर आगे की कानूनी कार्यवाही (Legal Proceedings) की जाती है।

      भारतीय न्याय संहिता के लागू होने से पहले लापरवाही के कारण होने वाली मृत्यु के अपराधों में IPC Section 304a के तहत कार्यवाही की जाती थी। परन्तु भविष्य में लापरवाही (Negligence) के कारण होने वाली मौत के सभी मामलों को BNS 106 (1) के तहत दर्ज कर दंड देने की कार्यवाही की जाएगी।

डाक्टर की लापरवाही से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर विशेष कानून

      भारतीय दंड संहिता (पुराने कानून) की धारा 304a में लापरवाही से होने वाली मृत्यु के अपराध के बारे में तो बताया गया था। लेकिन उसमें डाक्टरों के लिए अलग से किसी प्रकार के नियमों या कानूनों की सजा का प्रावधान (Provision Of Punishment) देखने को नहीं मिलता था।

        भारतीय न्याय संहिता सेक्शन 106 (1) में डाक्टरों के लिए भी इस कानून को विशेष रुप से लागू किया गया है। जिसमें बताया गया है कि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु किसी डाक्टर के द्वारा किए जाने वाले इलाज (Medical Negligence) के दौरान की गई लापरवाही के दौरान हो जाती है तो ऐसे में उस डाक्टर पर भी बीएनएस की धारा 106 के तहत कार्यवाही की जाएगी।

बीएनएस सेक्शन 106 (1) अपराधिक उदाहरण

       एक दिन अमित अपने दोस्तों के साथ पिकनिक पर गया। वहाँ सब लोग नदी के किनारे मस्ती कर रहे थे। नदी का पानी ज्यादा गहरा था और पानी का बहाव भी बहुत तेज था। अमित ने अपने दोस्त राहुल से कहा की चल नदी में नहाते है और वो अपने साथ राहुल को लेकर नदी में कूद गया। उसके दोस्त उसे मना करते रहे, लेकिन उसने उनकी बात नहीं सुनी। पानी का बहाव बहुत तेज था। जिस कारण राहुल अपना नियंत्रण खो बैठा और पानी में डूब गया और अमित के द्वारा की गई लापरवाही के कारण उसकी मौत हो गई। इसलिए लापरवाही के चलते हुए मौत के अपराध में अमित पर बीएनएस 106 लगती है।

       चिकित्सा लापरवाही: कई बार डॉक्टरों या चिकित्सा कर्मियों (Medical Personnel) की लापरवाही से मरीज (Patient) को गलत इलाज (Wrong Treatment) दिया जाता है जिससे उसकी स्थिति बिगड़ सकती है और यह भी उसकी मौत का कारण बन सकता है। चिकित्सा लापरवाही के मामले में भी BNS 106 (1) लग सकती है।

धारा 106 (1) में सजा – BNS 106 (1) Punishment 

       भारतीय न्याय संहिता की धारा 106(1) में सजा (Punishment) के बारे में बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति लापरवाही द्वारा या जल्दबाजी के कारण किसी व्यक्ति की मौत का कारण बनता है। तो उस व्यक्ति को दोषी (Guilty) पाए जाने पर 5 वर्ष की सजा से दंडित किया जाएगा।

       इससे पहले जब IPC 304a के तहत लापरवाही के मामलों में कार्यवाही की जाती थी तो दोषी व्यक्ति को केवल 2 साल की सजा व जुर्माने का दंड लगाया जाता था। भारतीय न्याय संहिता की सैक्शन 106 लागू होने के बाद इस अपराध की सजा को 2 साल से बढ़ा कर 5 साल कर दिया गया है, और इसे पहले से ज्यादा गंभीरता से लिया जाने लगा है।

डाक्टर द्वारा इलाज के दौरान की गई लापरवाही के कारण हुई मृत्यु के लिए सजा

       BNS Section 106 (1) में किसी भी डाक्टर के द्वारा की गई लापरवाही के लिए सजा को अलग से बताया गया है, अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु डॉक्टरके द्वारा किए जाने वाले इलाज में की गई लापरवाही के दौरान हो जाती है तो ऐसे में उस डाक्टर को 2 साल की सजा व जुर्माने (Fine) से दंडित किया जा सकता है।

BNS Section 106 (2) क्या है – यह धारा कब लगती है

       Bhartiya Nyaya Sanhita की धारा 106(2) में बताया गया है कि अगर कोई व्यक्ति गलत तरीके से या लापरवाही से गाड़ी या कोई अन्य वाहन (Vehicle) चलाता है जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। जिसके बाद वो व्यक्ति या ड्राइवर बिना पुलिस या मजिस्ट्रेट को इस घटना की जानकारी दिए घटना स्थल से भाग जाता है, तो पकड़े जाने पर उस व्यक्ति के खिलाफ BNS 106 (2) के तहत मुकदमा दर्ज (Case Filled) कर जल्द से जल्द सजा देने के लिए कार्यवाही की जाती है।

बीएनएस सेक्शन 106 (2 ) अपराधिक उदाहरण

        रमेश नाम का व्यक्ति एक दिन अपने आफिस जाने के लिए बहुत देर हो गया था। जिस कारण वो जल्द से जल्द आफिस पहुंचने के लिए अपनी कार को बहुत ही तेजी से चलाने लगा। रमेश अपनी गाड़ी को इतनी तेजी से चला रहा था कि उसे सामने से आ रहे एक बच्चे को अचानक टक्कर मार दी। जिसके बाद रमेश बहुत घबरा गया और लोगों से व पुलिस से बचने के लिए उसी समय वहाँ से भाग गया।

      इस घटना के बाद पुलिस सीसीटीवी कैमरे से जाँच करती है और लापरवाही से वाहन चलाकर (Driving Recklessly) बच्चे को टक्कर मारने व बिना पुलिस को इस घटना की सूचना दिए भाग जाने के जुर्म में सैक्शन 106(2) के तहत गिरफ्तार कर कार्यवाही करती है।

धारा 106 (2) में सजा – BNS 106 (2) Punishment 

       यदि कोई व्यक्ति जल्दबाजी में या वाहन चलाते समय किसी भी प्रकार की लापरवाही करता है। जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और वो व्यक्ति बिना उस घटना (Accident) की सूचना पुलिस या मजिस्ट्रेट को दर्ज कराए घटना स्थल से भाग जाता है तो उस व्यक्ति को न्यायालय द्वारा दोषी पाये जाने पर 10 वर्ष तक की सजा व जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

BNS 106 (1) & (2) में जमानत कब और कैसे मिलती है

        भारतीय न्याय संहिता की धारा 106(1) & (2) दोनों संज्ञेय अपराध (Cognizable offence) की श्रेणी में आती है, यानी वे अपराध जो गंभीर मामलों में लागू होते है। इसीलिए BNS Section 106(1) &106 (2) दोनों ही गैर-जमानती (Non Bailable) है, ऐसे मामलों में आरोपी व्यक्ति को जमानत मिलने में परेशानी का सामना करना पड़ता है।

          ऐसे गंभीर मामलों में जमानत (Bail) के लिए आपको एक अनुभवी वकील की सहायता की जरुरत पड़ सकती है। जो पहले आरोपी व्यक्ति के केस को समझेगा और किसी भी प्रकार की कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल कर जमानत दिलाने में आपकी मदद करेगा।

      लापरवाही से मौत की बीएनएस धारा 106 लगने के कुछ अन्य मामले
  • तेज गति व शराब पीकर गाड़ी चलाना, मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए ड्राइविंग करना।
  • किसी व्यक्ति को समय पर चिकित्सीय सहायता (Medical Aid) नहीं देना, या गलत दवाइयों दे देना जिससे सामने वाले व्यक्ति के जीवन पर खतरा बन जाए।
  • किसी ऐसी जगह जहाँ किसी घर का या बिल्डिंग का निर्माण हो रहा हो और अपने कारीगरों को बिना हेलमेट, सेफ्टी गियर के काम करवाने के लिए मजबूर कर उनकी जान को खतरे में डालना।
  • किसी व्यक्ति पर शारीरिक और मानसिक रुप से किसी भी भारी कार्य को करने के लिए दबाव डालना।
  • गंदा पानी और भोजन किसी इंसान को दे देना जो उसके स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाए।
  • सड़क नियमों व पैदल चलने वाले यात्रियों को वाहन चलाते समय अनदेखा करना।

      ऐसे अन्य बहुत से कारण हो सकते है जो हमारे द्वारा की गई जल्दबाजी या लापरवाही के कारण किसी की मृत्यु का कारण बन सकते है। अगर आपको लापरवाही से होने वाली मौत की धारा से संबधित कोई मदद या सुझाव चाहिए तो हमारे अनुभवी वकील से बात कर सकते है।

 

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