उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006
(Uttar Pradesh Revenue Code, 2006)
भूमि में साम्पत्तिक अधिकार (Property Right in Land)
प्रश्न 1. हिन्दू काल में साम्पत्तिक अधिकार का उद्गम एवं विकास कैसे हुआ? स्पष्ट करें। How did origin and development of Proprietary right in Hindu Period? Explain.
उत्तर- उद्गम- भूमि में साम्पत्तिक अधिकार का उद्गम “अध्यसन वाद” पर आधारित है। इस सिद्धान्त के अनुसार जब किसी वस्तु का कोई स्वामी नहीं होता तो उसका स्वामी वह होता है जो उस पर सर्वप्रथम काबिज था। मनुस्मृति के अनुसार, “पुराविद् (ज्ञानी) पहले वृक्ष काटने वाले का खेत मानते हैं और पहले घायल करने वाले का मृग ।” इस प्रकार जो व्यक्ति शाखाविहीन सूखे पेड़ को खोदकर भूमि को जोतने और बोने योग्य भूमि बना देता है, उसी को उस भूमि अथवा खेत का स्वामी माना गया। जो शिकारी किसी मृग को पहले मारता है उसे ही उस मृग को पाने का अधिकारी माना गया। सबसे पहले इस सिद्धान्त को मनु ने नहीं कहा है वरन् उनके समय के विद्वानों का यह विचार था जिनका समर्थन मनु ने किया है। मनु के इस ‘अध्यसन वाद’ का समर्थन बाद वाले रोमन विधिशास्त्री करते हैं।
विकास
राजा भूमि का स्वामी नहीं – हिन्दू मनीषियों एवं विधिशास्त्रियों के अनुसार, “राजा भूमि का स्वामी नहीं है।” वह प्रजा के कब्जे की भूमि की उपज में ही हकदार माना गया। उसका उपज में भाग प्राप्ति का अधिकार इसलिए नहीं था कि वह भूमि का स्वामी था वरन् इसलिए था कि वह प्रजा के जीवन, स्वतन्त्रता एवं सम्पति की रक्षा करता था। स्मृतिकार नारद के शब्दों में, ” यह मालगुजारी (उपज भाग) प्रजापालन वेतन था।”
क्या राजा भूमि का दान कर सकता है?— मीमांसाकार जैमिनी का कथन है कि भूमि दान में नहीं दी जा सकती, क्योंकि वह सभी की सम्पत्ति है। भूमि के विशिष्ट भाग पर जो काबिज व्यक्ति हो सकते हैं, वे उसके स्वामी होंगे। सारी भूमियों पर कोई काबिज नहीं हो सकता।” अतएव उसका कोई स्वामी नहीं हो सकता।
मनुस्मृति के अनुसार, राजा को भूमि को उपज का छठा भाग प्राप्त करने का अधिकार था।
खेती पर बल दिया जाता था (Cultivation Insisted on ) — कोई व्यक्ति कृषियोग्य भूमि में खेती नहीं करता और न किसी से करवाता था, तो राजा ऐसे व्यक्ति से अपना वह हिस्सा पाने का हकदार था जो यदि क्षेत्रपति खेती करता और उस उपज का भाग राजा को मिलता। इस उपज भाग के अतिरिक्त राजा उस व्यक्ति से जुर्माना भी वसूल सकता था। यदि कोई व्यक्ति भूमि की उर्वरा शक्ति बनाये रखने में लापरवाही करता था या उसने समय पर जुताई- बुवाई न की तो उसके ऊपर राजा के हिस्से का दस गुना जुर्माना किया जाता था। मनुस्मृति के अनुसार, यदि उसकी बिना जानकारी में नौकरों द्वारा यह गलती की गई है तो क्षेत्रपति के ऊपर केवल पांच गुना ही जुर्माना किया जाता था।
कृषक भूमि का स्वामी होता था – भूमि में जो कृषि करता था. वह भूमि उसी की होती थी। भूमि में सर्वनिष्ठ स्वामित्व तो नहीं था, किन्तु पूरे परिवार का स्वामित्व था। खेतिहर भूमि की सबसे छोटी इकाई कुटुम्ब श्री. न कि गाँव मनुस्मृति में मनु का प्रसिद्ध 1 श्लोक यह था कि ‘पुराविद ऋषि लोग घोषित करते हैं कि कृषित भूमि उसकी है जिसने जंगल साफ किया या उस पर कृषि की अर्थात् मनुस्मृति के अनुसार भूमि में व्यक्तिगत स्वामित्व को ही बताता है।
जैमिनी ने अपने प्रसिद्ध सूत्र में कहा कि “न भूमिः स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात्” अर्थात् राजा भूमि का स्वामी नहीं है बल्कि भूमि उसकी है जो उस पर कृषि करता है। प्राचीन काल में हिन्दुओं में भूमि का स्वामित्व संयुक्त परिवार में निहित था, न कि संयुक्त गाँव- समाज में खेतिहर भूमि के अतिरिक्त परती भूमि पूरे गाँव-समाज की सम्पत्ति होती थी। सार्वजनिक चारागाह, जलाशय, मन्दिर एवं देवता ग्राम- समुदाय की सम्पत्ति माने जाते थे।
प्रारम्भ में जब सम्पत्ति पैतृक होती थी या संयुक्त परिवार द्वारा धारित होती थी, तो असंक्राम्य होती थी। बाजारी प्रतियोगिता का अभाव एवं विक्रय मूल्य के अभाव के कारण भी व्यावहारिक रूप में भूमि अन्तरणीय नहीं थी।
हिन्दू काल में मालगुजारी व्यवस्था – शासन की सबसे छोटी इकाई “गाँव” थी। गाँव का एक मुखिया हुआ करता था जिसे “ग्रामाधिपति या मुखिया” कहते थे। भूमि-उपज में राजभाग या मालगुजारी पूरे गाँव में निर्धारित की जाती थी। यह पूरी मालगुजारी मुखिया द्वारा व्यक्तिगत कृषकों पर भूमि के क्षेत्रफल एवं उर्वरा शक्ति के आधार पर विभाजित कर दी जाती थी। गाँव के स्थायी निवासियों का संयुक्त दायित्व था कि गाँव की मालगुजारी अदा करें। गाँव के मुखिया की हैसियत बहुत महत्त्वपूर्ण थी। यह न केवल मालगुजारी की अदायगी के लिए जिम्मेदार था वरन् कृषकों में मालगुजारी के समान एवं उचित विभाजन के लिए भी थी।
प्रश्न 2. मुस्लिम काल में साम्पत्तिक अधिकार का विकास कैसे हुआ? संक्षेप में वर्णन कीजिए। How did develop of Proprietary right in Muslim Period? Describe in brief.
उत्तर- मुस्लिम काल में साम्पत्तिक अधिकार का विकास (Development of Proprietary right in Muslim Period) – भूमि में साम्पत्तिक अधिकार के सन्दर्भ में मुस्लिम धर्म के प्रवर्तक मुहम्मद साहब ने कहा कि “बंजर भूमि को जो कृषि योग्य बनाता है, वह उसमें सम्पत्ति का हक प्राप्त करता है।” उनके इस वाक्य का अर्थ विधिशास्त्री अलग- अलग करते हैं। प्रसिद्ध विधिशास्त्री अबू हनीफा के अनुसार बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाकर कृषि करने मात्र से भूमि में भौमिक अधिकार प्राप्त नहीं होते वरन् राज्य की अनुज्ञा (अनुमति) भी आवश्यक है।
मुस्लिम काल में भूमि व्यवस्था उसी प्रकार थी जैसा कि हिन्दू काल में थी। आरम्भ में मुसलमानों ने विजित हिन्दू राजाओं को कर के अधीन रखा। उनके राज्य के अन्दरूनी शासन में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। ये राजा लोग पहले की भाँति गाँव के मुखिया के माध्यम से खेतिहरों से अपनी मालगुजारी उगाहा करते थे। यह राजा या तो कर देने वाला हो जाता था और मुखिया के माध्यम से मालगुजारी उगाहा करता था राजा मालगुजारी वसूलने वाला प्रवर (Chief) हो जाता था और मुस्लिम शासक के प्रति अपने को उत्तरदायी बनाता था। इन करदाता राजाओं या सरदारों ने अपने को गाँव के मुखिया से श्रेष्ठतर माना और गाँव के मुखिया के अधिकारों एवं कर्त्तव्यों को समाप्त कर दिया। इस प्रकार ये लोग राज्य एवं कृषक के बीच मध्यवर्ती बन गये।
उस समय के राजा या सरदार सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक रूप में राज्य अधिकारी या कर एकत्रक तो थे परन्तु उनका भूमि पर कोई स्वामित्व नहीं था। कृषक भूमि में स्थायी, वंशानुगामी एवं संक्राम्य अधिकार रखते थे और परम्परागत या परगना दर से मालगुजारी के देनदार थे।
मुस्लिम धर्म का सिद्धान्त था कि “यदि इमाम किसी देश को बल से जीत ले तो वह चाहे तो विजित निवासियों से भूमि छीन कर मुस्लिमों या सिपाहियों में बाँट दे या मूल स्वामियों के पास रहने दे और उससे जजिया (विजित व्यक्तियों से कर) वसूल करे एवं उसकी भूमि पर ‘खिराज’ नामक कर लगाये” खिराज कर पहले गैर-मुस्लिम से वसूल किया जाता था, किन्तु बाद में मुस्लिमों पर भी लगाया गया। भारत में कोई भी भूमि विजित निवासियों से छीन कर मुसलमानों में नहीं बांटी गई। सेना को बहुत कम भाग जागीर के रूप में दी गई और वह भी परती या बंजर भूमि थी। मुसलमानों ने भूमि पर ‘खिराज’ लगाया। यह खिराज दो किस्म का होता था-
(1) मुकस्सिमा खिराज – जो उपज का वास्तविक भाग होता था और प्रत्येक – फसल पर लिया जाता था।
(2) वजीफा खिराज- यह निश्चित रकम होती थी जो साल में एक बार ली जाती थी। यह कृषक की भूमि के क्षेत्रफल के अनुसार लगायी जाती थी: चाहे कृषक भूमि में जोताई बोवाई करे या न करे।
मुकस्सिमा खिराज भी शीघ्र रकम में बदल दी गई। परिणाम यह हुआ कि राजा व्यवहार में भूमि का स्वामी न होकर केवल मालगुजारी का हकदार ही रहा। हिन्दू काल में राजा का भाग- उपज का 1/6 था, जब कि मुस्लिम काल में 1/3, औरंगजेब के समय में यह धनराशि बढ़ाकर 1/2 कर दी गई थी।
टोडरमल – बन्दोबस्त – भूमि-विधि में अकबर-काल में किया गया टोडरमल- बन्दोबस्त बहुत महत्वपूर्ण है। इस मालगुजारी व्यवस्था में सब स्वेच्छाचारी कर हटा दिये। गये और भूमि की उर्वरा शक्ति और क्षेत्रफल के अनुसार मालगुजारी निर्धारित की गई।
टोडरमल द्वारा किया गया बन्दोबस्त रैयतवाड़ी बन्दोबस्त था। कृषक भूमि के स्वामी थे। 1 कोई व्यक्ति भूमि में श्रेष्ठतर अधिकार नहीं रखता था। गाँव के मुखिया या कर उगाहने वाले मध्यवर्तियों को उनकी सेवाओं के बदले में जिन्हें कुछ धनराशि नकद दी जाती थी या उन्हें कुछ मालगुजारी मुक्त भूमि दी जाती थी, जिसे सेवार्थ भूमि कहते थे।
प्रश्न 3. ब्रिटिश काल में सम्पत्ति के अधिकार का विकास कैसे हुआ? संक्षेप में वर्णन कीजिए। Describe in brief how did develop of Proprietary right in British Period?
उत्तर- ब्रिटिश काल में सम्पत्ति के अधिकार का विकास– ब्रिटिश काल में उत्तर प्रदेश के भू-भाग अंग्रेजों के कब्जे में 1775 ई० से 1857 ई० के बीच एक-एक कर कई बार में आये। प्राचीन बनारस प्रान्त अंग्रेजों को अवध के नवाब से सन्धि में प्राप्त हुआ। 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेजों के पास केवल बनारस डिविजन (सोनभद्र को छोड़कर) और इलाहाबाद का किला था। बाद में 1801 ई० में अवध के नवाब द्वारा आजमगढ़, मऊलायभंजन, देवरिया, गोरखपुर बस्ती, इटावा कानपुर एटा बरेली आदि को अंग्रेजों को दे दिया।
ये सब विजित एवं मिलाये गये क्षेत्र बंगाल प्रेसीडेन्सी के मातहत रखे गये और गवर्नर- जनरल के नियन्त्रण में रहे। 1833 ई० के गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया ऐक्ट द्वारा आगरा प्रेसीडेन्सी कायम को गई और अवध को छोड़कर लगभग पूरा क्षेत्र आगरा प्रेसीडेन्सी में शामिल किया गया। परन्तु इस योजना का कार्यान्वयन न हो सका। प्रदेश के
सन् 1950 ई० तक का इतिहास यह प्रदर्शित करता है कि इस समय तक उत्तर तीन प्रान्तों में विभिन्न व्यवस्थाएं प्रचलित थीं, जिनका ब्यौरा निम्नलिखित है –
बनारस का स्थायी बन्दोबस्त – ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बनारस प्रान्त (बनारस) – जौनपुर, बलिया, गाजीपुर एवं आजमगढ़ जिले का कुछ भाग तथा मिर्जापुर का उत्तरी भाग) 1775 में अवध के नवाब आसफुद्दौला से सन्धि में प्राप्त हुआ था। उस समय ये भाग बनारस के राजा चैत सिंह के प्रबन्ध में थे। राजा चैत सिंह को 22 लाख रुपया वार्षिक कर देने की शर्त पर इस प्रान्त का बन्दोबस्त करने एवं मालगुजारी वसूल करने का मालिक बना रहने दिया गया।
बनारस में नियुक्त अंग्रेजी रेजीडेंट इन्कन साहब के हाथ में राजस्व प्रशासन 1788-94 के काल तक रहा। उसने भूमि का बन्दोबस्त गवर्नर-जनरल लार्ड कार्नवालिस के आदेश से करना प्रारम्भ किया। उसका मूल इरादा था कि बन्दोबस्त किसानों के साथ किया जाय। लाई कार्नवालिस ने ऐसा न होने दिया और 1795 ई० में बंगाल में 1793 ई० में किये गये स्थायी बन्दोबस्त के प्रावधान को यहाँ लागू कर दिया।
स्थायी बन्दोबस्त जमींदारों के साथ किया गया था। उन्हें सारी भूमि का स्वामी माना गया। इस प्रकार ‘स्थायी बन्दोबस्त’ के साथ-साथ आधुनिक जमींदार और जमींदारी प्रथा प्रारम्भ हुई।
अवध की तालुकदारी प्रणाली– 1856 ई० में अवध अंग्रेजी राज्य में मिलाया गया। 1857 ई० में भारतीय स्वतन्त्रता का प्रथम संग्राम हुआ जब यह आन्दोलन दबा दिया गया। तब लार्ड कैनिंग ने यह घोषणा 1858 ई० में की कि बलरामपुर के राजा दिग्विजय सिंह और पहा के राजा कुलवंत सिंह को छोड़कर पूरे अवध प्रान्त का भूमि-सम्बन्धी अधिकार ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त कर लिया जाता है, और जैसा उचित समझा जायेगा वैसा भौमिक अधिकारों का प्रबन्ध किया जायेगा।
इस प्रकार ब्रिटिश शासकों ने अवध में जमींदारी प्रणाली स्थापित को। लार्ड कैनिंग ने 1858 ई० की घोषणा द्वारा न केवल भूमि का स्वामित्वाधिकार जब्त किया बल्कि हर किस्म की भूमि के अधिकार जिसमें दखलकारी अधिकार भी शामिल है, न केवल छोटे-छोटे किसान उखाड़ फेंके गये, बल्कि छोटे-छोटे जमींदार जो कि बीस वर्षों से भूमि का उपयोग कर रहे थे. भी हटा दिये गये। तालुकदार सदैव के लिए अंग्रेजी सरकार के मित्र एवं भक्त बन गये। बाद में अंग्रेजों ने ‘अवध कम्प्रोमाइज’ के अनुसार दो अधिनियम पारित किये-
(i) अवध सब-सेन्टिलमेंट एक्ट 1866 और
(ii) अवध रेन्ट एक्ट, 18681
अवध सब सेन्टिलमेन्ट अधिनियम ने छोटे जमींदारों को उनके अधिकार उन्हें दे दिये। अवध रेन्ट एक्ट, 1868 को समाप्त कर 1886 का एक्ट बनाया गया जिसमें गैर-दखीलकारी काश्तकारों को संरक्षण प्रदान किया गया। ये पाँच वर्ष तक बेदखल नहीं किये जायेंगे और उनका लगान बढ़ाया न जा सकेगा।
प्रश्न 4. उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1950 के पहले उत्तर प्रदेश में कौन-कौन से भूमि अधिनियम प्रचलित थे? संक्षेप में वर्णन कीजिए। Describe in brief how many Act were enforced relating to land in U.P. before the enforcement of U.P.Z.A. 1950?
उत्तर- उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1950 के लागू होने के पहले उत्तर प्रदेश में निम्नलिखित भूमि सम्बन्धी अधिनियम प्रचलित थे, जैसे-
(1) रेन्ट रिकवरी ऐक्ट, 1859
(2) नार्थ-वेस्टर्न प्राविन्सेज रेन्ट ऐक्ट, 1873
(3) आगरा टेनेन्सी ऐक्ट, 1926
(4) अवध रेन्ट (अमेण्डमेण्ट) एक्ट, 1921)
(5) उत्तर प्रदेश काश्तकारी अधिनियम, 1939
(1) रेन्ट रिकवरी ऐक्ट, 1859- आगरा में पहला अधिनियम जो भूमि-विधि में लागू हुआ, वह है-रेण्ट रिकवरी ऐक्ट, 1859 यह अधिनियम फोर्ट विलियम प्रेसीडेन्सी के क्षेत्र के लिए था और उन प्रान्तों में भी लागू किया गया जो ब्रिटिश सरकार के अधिकार में आये। आगरा प्रान्त में यह अधिनियम लागू किया गया। इस अधिनियम का उद्देश्य था कि किसानों के लिए कुछ अधिकार सुरक्षित किये जायें। किन्तु यह अधिनियम किसानों को कुछ लाभ न पहुँचा सका, बल्कि इस अधिनियम ने जमींदारों के हाथों को और भी मजबूत किया। इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित थे-
(1) जोतदारों की परिभाषा एवं वर्गीकरण
(2) जमींदारों का यह कर्तव्य निर्धारित किया गया कि वे काश्तकारों को पट्टा निष्पादित करें ताकि किसान अपनी हैसियत को जान सकें।
(3) अवैध तरीकों से किसानों का शोषण एवं लगान से अतिरिक्त वसूली पर रोक।
(4) लगान को बढ़ाने एवं कम करने का प्रावधान।
(5) जोतों का समर्पण करने का प्रावधान।।
(2) नार्थ वेस्टर्न प्राविन्सेज रेण्ट ऐक्ट, 1873 – नॉर्थ-वेस्टर्न प्राविन्सेज ऐक्ट, 1873 के अस्तित्व में आने के बाद आगरा प्रान्त में प्रचलित रेण्ट रिकवरी ऐक्ट 1859 को निरस्त कर दिया गया। इस अधिनियम द्वारा एक और किस्म के जोतदारों का प्रादुर्भाव हुआ जिसे गतस्वामित्व काश्तकार कहते हैं। इस प्रकार अब पाँच प्रकार के जोतदार हो गये और ये पाँचों प्रकार के जोतदार 1887 के रेण्ट ऐक्ट और 1901 ई० के टेनेन्सी ऐक्ट में भी ज्यों के त्यों बने रहे।
सन् 1901 में नार्थ-वेस्टर्न प्राविन्सेज टेनेन्सी ऐक्ट पास हुआ। उसका नाम, 1902 में बदलकर आगरा टेनेन्सी ऐक्ट, 1901 रखा गया। इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है काश्तकारों को दखीलकारी अधिकारों का प्रदान करना। इन अधिनियम ने जमींदारों की स्वेच्छा पर धारण करने वाले उन काश्तकारों को जो 12 वर्ष तक भूमि पर काबिज थे, उन्हें दखलकार काश्तकार बना दिया, जिसका अर्थ यह हुआ कि ये काश्तकार जमींदार द्वारा बेदखल नहीं किये जा सकते थे, जब तक वे लगान देते रहें या अवैध अन्तरण न करें।
उदाहरण- जमींदार ने ‘संदीप’ नामक किसान को एक भूमि 5 वर्ष के लिए दी उसके बाद जमींदार ने यह भूमि ‘संदीप’ से छीनकर उसे ‘कल्लू’ को दे दिया और ‘कल्लू’ की भूमि छीनकर ‘संदीप’ को दे दिया। ‘संदीप’ ने दूसरी भूमि पर भी 4 वर्ष तक कृषि को, और काबिज रहा। जमींदार ने ‘संदीप’ से इस भूमि का इस्तीफा ले लिया और 1 वर्ष के अन्दर ही ‘संदीप’ को एक अन्य खेत दिया, जिस पर ‘संदीप’ तीन वर्षों तक काबिज रहा। यहाँ 12 वर्ष के काल की गिनती करते समय ‘संदीप’ के पहले, दूसरे और तीसरे खेत के समय को जोड़ लिया जायेगा। इस प्रकार 5+4+3- 12 वर्ष पूरा हो जाता है और ‘संदीप’ तीसरे खेत का देखीलकार काश्तकार हो जाता है।
इस अधिनियम ने दूसरा महत्वपूर्ण कार्य यह किया कि टेनेन्ट्स ऐट बिल का नाम बदलकर गैर-दखीलकार काश्तकार रखा और यह प्रावधान किया कि उन्हें अगले 7 वर्ष तक भूमि को धारण करने का अधिकार रहेगा। तीसरा महत्वपूर्ण कार्य जो इस अधिनियम ने किया वह है, भूमि को ‘सौर भूमि’ में होने से रोकना। इस अधिनियम के लागू होने के बाद कोई भी जमींदार किसी भूमि को ‘सीर भूमि’ में बदल नहीं सकता था।
आगरा टेनेन्सी ऐक्ट, 1926 और अवध रेन्ट (अमेण्डमेण्ट ) ऐक्ट, 1921 – किसानों के बढ़ते असन्तोष को रोकने के लिए दो अधिनियम पारित किये गये जिसमें पहला आगरा टेनेन्सी ऐक्ट, 1926 एवं दूसरा अवध रेन्ट (संशोधन) अधिनियम, 1921 पारित किया गया। आगरा टेनेन्सी एक्ट, 1926 के तहत भूमि विधि में निम्नलिखित परिवर्तन किये गए-
(1) इस अधिनियम ने पहले के गैर देखीलकार काश्तकारों में से अधिकांश काश्तकारों को अधिनियमित काश्तकार में बदल दिया। इस अधिनियम की धारा 19 के अनुसार संविदा या पट्टा में किसी बात के रहते हुए भी जो कोई व्यक्ति किसी भूमि का काश्तकार हो या अधिनियम के लागू होने के बाद हो, वह अधिनियमित काश्तकार होगा। ऐसे काश्तकार को हक होगा कि वह भूमि को आजीवन धारण किये रहे। अधिनियमित काश्तकार की मृत्यु पर उसका उत्तराधिकारी पाँच साल तक भूमि पर काबिज रहेगा।
(2) 12 वर्ष लगातार जोत होने पर जो जोतदार देखीलकार काश्तकार हो जाया करता था, वह समाप्त कर दिया गया। यह प्रावधान किया गया कि जमींदार किसी भी काश्तकार को दखीलकारी अधिकार प्रदान कर सकते हैं।
(3) काश्तकारों में खेतों का बँटवारा जमींदार की अनुमति के बिना सम्भव हो गया।
(4) जमींदारों को नयी सीर प्राप्त करने का अधिकार मिल गया।
(5) जमींदारों द्वारा लिया जाने वाला नजराना अवैध करार दे दिया गया।
अवध रेण्ट (संशोधन) अधिनियम, 1921 – इस अधिनियम ने अवध प्रान्त की कास्तकारी विधि में निम्नलिखित महत्वपूर्ण परिवर्तन किये-
(1) गैर दखोलकर काश्तकार जो अधिक समय से पट्टे पर भूमि को जोत-बो रहे थे. उन सभी को अधिनियमित काश्तकार (Statutory tenant) बना दिया गया, चाहे भले ही पढ़े की शर्ते इसके विपरीत क्यों न रही हों। ये नये काश्तकार भूमि को अपने जीवन काल तक धारण कर सकते थे तथा उनके उत्तराधिकारी भी 5 वर्ष तक भूमि को धारण कर सकते थे।
(2) भूमि का दाखिला करते समय जमींदार जो नजराना लेते थे, उसे अवैध बना दिया गया। यदि कोई जमींदार नजराना लेता था तो जमींदार से प्रतिकर दिलवाया जाता था जो नजराना की धनराशि के दो गुने तक हो सकता था।
(3) भूमि को लगान पर उठाने पर और अधिक प्रतिबन्ध लगाया गया।
(4) सीर भूमि बढ़ाने की सुविधा जमींदारों को प्रदान की गई। अधिनियम के लागू होने समय मौजूदा सभी खुदकाश्त भूमि सोर भूमि बना दी गई। अब जमींदार भविष्य में 12 वर्ष के स्थान पर केवल 10 वर्ष के निरन्तर जुलाई – बुलाई से किसी भूमि को मीर भूमि बना सकेंगे।
उत्तर प्रदेश काश्तकारी अधिनियम, 1939- आगरा टेनेन्सी एक्ट, 1926 एवं अवध रेण्ट (संशोधन) अधिनियम, 1921 जिन उद्देश्यों के लिए पारित हुए थे, वे इन उद्देश्यों को लाने में सफल न हो सके तथा जमींदारों द्वारा मनमानी बेदखली जारी रही एवं जमींदारों ने अपनी खुदकाश्त एवं सीरभूमि बढ़ा ली। वे लगातार किसानों का शोषण करते रहे इसलिए जमींदारी समाप्ति का आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिसके कारण एक नया अधिनियम उत्तर प्रदेश काश्तकारी अधिनियम, 1939 पारित किया गया। इस अधिनियम की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
(1) आगरा एवं अवध प्रान्तों में भूमि विधि का एकीकरण कर दिया गया।
(2) जमींदारों द्वारा ‘सौर’ अब प्राप्त नहीं की जा सकती थी। (3) बेगार एवं नजराना स्पष्टतया वर्जित किया गया।
(4) कोई काश्तकार दखीलकारी अधिकार नहीं प्राप्त कर सकता था।
(5) ‘सीर’ भूमि के काश्तकार अधिनियम के लागू होने के 5 वर्ष तक बेदखल नहीं किये जा सकते थे, चाहे उनके पट्टे या करार की जो भी शर्त हो ।
प्रश्न 5. जमींदारी प्रथा से आप क्या समझते हैं? इसके उन्मूलन के लिए क्या प्रयास किये गये? संक्षेप में बताइये। What do you understand by Jamindari Pratha? What do attempted for its abolition? Describe in brief.
उत्तर- जमींदारी प्रथा – जमींदारी प्रथा से तात्पर्य एक ऐसी प्रथा से है जिसमें राज्य की समस्त भूमियों कुछ विशिष्ट प्रभावित व्यक्तियों के पास ही सिमटकर रह गयीं। छोटे और मझोले काश्तकार भूमि विहीन थे जिसके कारण उनका शोषण एवं उत्पीड़न चरम पर था। जमींदारी प्रथा अंग्रेजी राज्य की देन है। भारतीय परम्परागत सिद्धान्तों और विचारों के विरोध में यह प्रथा रही। देश के विद्वानों एवं नेताओं ने सदैव इसकी आलोचना की। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जब किसानों में जागृति आयी तो उन्होंने जमींदारी प्रथा को दमन, अक्षमता एवं भ्रष्टाचार के अस्त्र के रूप में देखा।
यह असंतोष ही किसान आन्दोलन का मुख्य कारण था। किसान आन्दोलन के परिणामस्वरूप ही 1921 ई० में अवध रेन्ट अधिनियम तथा 1926 ई० में आगरा काश्तकारी अधिनियम पास हुआ। किन्तु किसानों के कष्टों का निवारण ये अधिनियम न कर सके। यह अनुभव किया गया कि जमींदारी वर्ग को समाप्ति के बिना कृषक वर्ग के लोगों की परिस्थिति में महत्वपूर्ण सुधार करना असम्भव है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1935 ई० में लखनऊ अधिवेशन में राज्य में जमींदारी उन्मूलन का सिद्धान्त स्वीकार किया। 1937 ई० में जब प्रथम कांग्रेस मंत्रिमण्डल बना तो इसने भूमि सुधार कार्य अपने हाथ में लिया और यू० पी० काश्तकारी अधिनियम, 1939 पारित करके किसानों की दशा सुधारने का प्रयत्न किया।
कांग्रेस ने जब राज्य में अपना मंत्रिमण्डल बनाया तो जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए आवश्यक कार्यवाही की।
उत्तर प्रदेश विधान सभा में प्रस्ताव- 8 अगस्त, 1946 ई० राज्य की भूमि विधि में एक स्मरणीय तिथि बनी रहेगी, क्योंकि इसी दिन राज्य की विधान सभा ने उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन के सिद्धान्तों को स्वीकार कर यह प्रस्ताव पास किया-
“यह विधान सभा इस प्रान्त में जमींदारी प्रथा, जो कृषक और राज्य के बीच मध्यवर्तियों से युक्त है के उन्मूलन के सिद्धान्त को स्वीकार करती है तथा यह निश्चय करती है कि ऐसे मध्यवर्तियों के अधिकार उचित मुआवजा देकर अर्जित कर लिये जायँ और सरकार एक समिति की नियुक्ति करे जो इस उद्देश्य के लिए योजना तैयार करे।”
जमींदारी उन्मूलन समिति- जमींदारी उन्मूलन समिति उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन समिति के नाम से भी जानी जाती है। इस समिति के अध्यक्ष उस समय के मुख्यमंत्री पं० गोविन्द वल्लभ पंत और उपाध्यक्ष हुकुम सिंह थे। ए० एन० झा और श्री अमीर रजा समिति के मंत्री नियुक्त किये गये। इस समिति में इन चारों व्यक्तियों के अलावा 13 और भी सदस्य थे जिनमें सम्मिलित थे, पंडित कमलापति त्रिपाठी और चौधरी चरण सिंह।
इस समिति के विचारणीय विषय तीन थे—
(1) जमींदारी प्रथा के उन्मूलन का सिद्धान्त स्वीकार करना और जमींदारों के अधिकारों के अर्जन के लिए मुआवजा निर्धारण का सिद्धान्त निश्चित करना।
(2) प्रान्त में जमींदारी उन्मूलन पर जो जोतदारी व्यवस्था होगी, उसका मूल सिद्धान्त क्या होगा?
(3) भूमि व्यवस्था की नयी योजना को लागू करने का प्रशासकीय संगठन क्या होगा और सरकारी मालगुजारी एवं देवों की वसूली का कौन-सा साधन होगा? समिति ने कई बैठकें की। समिति की प्रथम बैठक 14 नवम्बर, 1946 ई० को और अन्तिम बैठक 3 जुलाई, 1948 को हुई।
“जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था विधेयक -7 जुलाई, 1949 ई० को उत्तर प्रदेश विधान सभा में उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था विधेयक पेश किया गया। कई अवस्थाओं से गुजरता हुआ यह विधेयक संशोधित रूप में 10 जनवरी, 1951 ई० को | विधानसभा द्वारा और 16 जनवरी, 1951 को विधान परिषद् द्वारा पारित कर दिया गया। 24 जनवरी, 1951 ई० को राष्ट्रपति ने इस अधिनियम पर अपनी स्वीकृति दी और 26 जनवरी, 1951 ई० को यह उत्तर प्रदेश असाधारण राजट में प्रकाशित किया गया और इसी दिन से यह अधिनियम भूमि विधि का भाग बन गया।
उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम की धारा 4 के अनुसार जमींदारी का उन्मूलन उस दिन से होगा जिस दिन राज्य सरकार गजट में अधिसूचना जारी कर प्रकाशित करें। सूर्यपाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, आ० ई० रिo 1952 सुप्रीम कोर्ट 252 के मामले में जमींदारों ने यह मामला उठाया कि उक्त अधिनियम संविधान में प्रदत्त मूल अधिकार का उल्लंघन करते हैं। अतः उक्त अधिनियम को खारिज किया जाय। किन्तु उच्चतम न्यायालय ने मई 1951 में जमींदारों द्वारा दायर की गई इस अपील को निरस्त कर उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम को वैध ठहराया।
उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 की धारा 4 के अन्तर्गत राज्य सरकार ने 1 जुलाई, 1952 ई० को उत्तर प्रदेश गजट (असाधारण) में अधिसूचना प्रकाशित की और उसी दिन जमींदारों के साथ आस्थान राज्य सरकार में निहित हो गये। इसी दिन को निहित होने का दिनांक (Date of vesting) कहते हैं। 1360 फसली वर्ष का प्रारम्भ भी इसी दिन से होता है।
उपरोक्त अधिनियम, 1950 को लागू हुए। लगभग 60 वर्ष बीतने के पश्चात् प्रदेश सरकार को ऐसा अनुभव हुआ कि कृषि अधिकारों से सम्बन्धित उ० प्र० जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के कुछ प्रावधानों के अतिरिक्त 38 ऐसे अधिनियम अभी भी लम्बित स्थिति में हैं जो अनुपयोगी एवं निष्प्रयोज्य हो चुके हैं। इन सभी अधिनियमों को निरस्त करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 तैयार करके प्रावधानों को सरल कर दिया गया तथा सर्वप्रथम इसे उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 8 सन् 2012 द्वारा विधानमण्डल ने पारित कर दिया और राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति प्रदान कर दी गयी। संहिता दिनांक 11.2.2016 से उ० प्र० राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के साथ पूरे भारत में लागू की जा चुकी है एवं अभी तक चले आ रहे 99 अधिनियमों को संहिता की धारा 2 एवं 230 एवं प्रथम अनुसूची की सूची (क) एवं (ख) द्वारा अब निरसित कर दिया गया है।
पुनः उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम संख्या 7 वर्ष 2019 द्वारा उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 में संशोधन कर वर्तमान संहिता की कुछ मुख्य धाराओं 80, 89 (3), 94, 95 और 104 को पूर्णतः समाप्त कर नये रूप में प्रतिस्थापित किया गया है जिसके आधार पर कोई भी भूमिधर अपनी जोत का उपयोग कृषि, उद्योग, व्यवसायिक तथा रिहायशी उद्देश्यों के प्रयोग के साथ ही जोत या उसके कुछ भाग को निजी पट्टे द्वारा किसी व्यक्ति या विधिक व्यक्ति को पंजीकृत पट्टे द्वारा अधिकतम 30 वर्षों हेतु आपसी सहमति से निर्धारित प्रतिफल के बदले कृषि कार्य या सौर विद्युत उत्पाद हेतु उठा सकता है। धारा 81, 105, 108 एवं 110 में भी संशोधन किया गया है तथा धारा 108 एवं 110 में “अविवाहित पुत्री” को मृत पिता के पुत्र के साथ उत्तराधिकार में बराबरी का स्थान दे दिया गया है। इसी के साथ धाराएं 96, 97 एवं 103 को हमेशा के लिए विलुप्त कर दिया गया है जिसका परिणाम है केवल मानसिक अस्वस्थता से ग्रसित एवं अवयस्क भूमिधर के अतिरिक्त अन्य सभी व्यक्ति अपनी भूमि का खेती और व्यावसायिक उपयोग कर सकते हैं।
प्रश्न 6. उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की मुख्य विशेषताओं का विवरण दें। इसके मुख्य उद्देश्य क्या थे? किस सीमा तक उन उद्देश्यों की प्राप्ति हुई ? Describe briefly the sallent features of the U.P.ZALR. Act. What were the main objects of the U.P.Z.A.L.R. Act? To what extent have they been achieved?
उत्तर- उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ (Snilent features to U.P.ZA. & L.R. Act)- इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) जमींदारी प्रथा की समाप्ति (Abolition of Zamindari System) – इस अधिनियम के द्वारा निहित होने के दिनांक अर्थात् 1 जुलाई, 1952 से जमींदारों के सब अधिकार आगम एवं हित जो भूमि में, भूमि के निचले भाग में, अकृषित भूमि में, बंजर आदि में थे, समाप्त होकर राज्य सरकार में निहित हो गये और इस प्रकार जमींदारी प्रथा सदा के लिए प्रदेश में समाप्त हो गयी।
(2) मुआवजा का भुगतान (Payment of compensation)- अधिनियम में उन व्यक्तियों को, जिनकी जमींदारी राज्य सरकार में निहित हुई है, मुआवजा का भुगतान करने की उचित व्यवस्था की गयी है। यह मुआवजा उनकी शुद्ध वार्षिक आय के आठ गुने के. बराबर देय होगा। जमींदार छोटा हो या बड़ा हो, वह किसी जमींदारी का ठेकेदार हो, मुआवजा पाने का हकदार है।
(3) पुनर्वास अनुदान का भुगतान (Payment of Rehabilitation Grant)- इस अधिनियम ने उन जमींदारों को जिनकी सालाना देय मालगुजारी दस हजार रुपये तक है, पुनर्वास अनुदान प्राप्त करने के लिए हकदार घोषित किया है। यह अनुदान मुआवजा के अतिरिक्त है।
(4) खेती करने के सबके अधिकार सुरक्षित रखे गये (Right of all to: cultivate kept secured) – अधिनियम में भूमि विधि को इस नीति को सुरक्षित रखा गया है कि जो व्यक्ति भूमि पर खेती करता है वह उसे धारित करे; इसलिए ऐसे व्यक्तियों को भूमि का स्वामी बना दिया गया है। इसलिए जमींदार भी, जमींदारी चली जाने के बाद भी, उस भूमि का भूमिधर बन गया है जो उसकी खुदकाश्त भूमि थी या ऐसी सीर भूमि थी जिसे उसने पट्टे पर नहीं उठाया था। इसी प्रकार शिकमी काश्तकार भी उस भूमि के अधिवासी बन गये जो उनके कब्जे में थी।
(5) नई जोतदारी व्यवस्था (New tenure arrangement )– इस अधिनियम के पहले 14 प्रकार की भ्रामक क्लिष्ट जोतदारी व्यवस्था लागू थी, जिसे जमींदारी प्रथा के साथ- साथ समाप्त करके उनके स्थान पर केवल चार प्रकार की जोतदारी प्रारम्भ में कायम की गयी थी — (1) भूमिधर (2) सीरदार, (3) अधिवासी एवं (4) असामी अब सीरदार और अधिवासी भी नहीं रहे और भूमिधर के दो वर्ग हो जाने से निम्म तीन प्रकार के जोतदार मौजूद हैं- (1) अन्तरणीय अधिकार वाला भूमिधर, (2) बिना अन्तरणीय अधिकार वाला भूमिधर, और (3) आसामी।
(6) पट्टे पर भूमि को उठाने पर प्रतिबन्ध (Restriction on leasing out the land) – अक्षम व्यक्तियों को छोड़कर, जिनका विवरण इस अधिनियम की धारा 157 (1) में दिया गया है, कोई भी व्यक्ति अपनी कृषि भूमि के पट्टे पर नहीं उठा सकता है। जिन व्यक्तियों को भूमि उठाने का अधिकार दिया गया है वे शारीरिक दुर्बलता से पीड़ित है या उन्हें कानूनी क्षमता नहीं है, या वे इस परिस्थिति में हैं कि स्वयं खेती-बारी नहीं कर सकते। जैसे अवयस्क, पागल, मूर्ख या शारीरिक दुर्बलता से पीड़ित हैं जैसे अन्धा व्यक्ति, जेल में निरुद्ध व्यक्ति, वृद्ध व्यक्ति, अविवाहित या विधवा या तलाकशुदा या पत्ति से अलग हुई या ऐसी स्त्रियों जिनके पति अन्धे या किसी शारीरिक दुर्बलता से पीड़ित हों या 25 वर्ष से कम उम्र के विद्यार्थी, जो किसी मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्था में शिक्षा ग्रहण कर रहे हों और जिनके पिता मर गये हों, या पागल या जड़ हों या अन्य शारीरिक दुर्बलता से पीड़ित हों, या प्रतिरक्षा कर्मचारी हो।
(7) ग्रामीण जनतंत्र (Rural Democracy) — गाँव सभा और गाँव पंचायत की स्थापना करके तथा जमींदारों से ली गई भूमि को गाँव सभाओं में निहित करके राज्य सरकार ने ग्रामीण जनतंत्र की स्थापना की है। इस अधिनियम के द्वारा गाँव सभा की ओर से सभी भूमि का प्रबन्ध करने के लिए एक समिति भूमि प्रबन्धक समिति की स्थापना की गई है। इस प्रकार सारे प्रदेश में ये गाँव छोटे-छोटे गणतन्त्र के रूप में स्वायत्तशासी हैं।
(8) निजी कुओं, इमारतों, इमारतों में संलग्न भूमि, आबादी के वृक्षों का उनके मालिकों के साथ बन्दोबस्त – इस अधिनियम के द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी कुओं, इमारतों, इमारतों से संलग्न भूमि और आबादी के वृक्षों का स्वामी होगा, मानो राज्य सरकार ने उनके साथ उनका बन्दोबस्त कर दिया है। (धारा 9)
(9) अलाभकर जोतों के निर्माण पर रोक- अधिनियम के अन्तर्गत 3-1/8 एकड़ (पक्का 5 बीघा) तक की जोतों का विभाजन नहीं हो सकता। यदि बंटवारे की भूमि 3-1/8 एकड़ या उससे कम है तो न्यायालय इस भूमि के विक्रय की अनुमति देगा और प्राप्त विक्रय धनराशि का बंटवारा हक के अनुसार किया जायेगा।
राज्य सरकार ने धारा 168 (क) द्वारा लगाये गये चक के टुकड़े करने पर प्रतिबन्ध की शर्त को उ० प्र० जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 2004 द्वारा निरस्त कर दिया है। परिणामतः अब छोटे काश्तकार अपने चर्को को छोटे-छोटे टुकड़े में विक्रय करने में स्वतन्त्र हैं।
(10) अधिक भूमि के जमाव पर रोक भविष्य में कोई भी कुटुम्ब दान या विक्रय – द्वारा ऐसी जोत नहीं प्राप्त करेगा जो उसकी अपनी जोत मिलाकर उत्तर प्रदेश में कुल 12-1/2 एकड़ से अधिक हो। जिसके पास 12-1/2 एकड़ भूमि है ऐसे लोग कोई और भूमि दान या विक्रय द्वारा प्राप्त नहीं कर सकेंगे।
(11) समान उत्तराधिकार – इस अधिनियम के पूर्व के कुछ जोतदार अपनी वैयक्तिक विधि (Personal Law) द्वारा शासित होते थे और कुछ काश्तकारी अधिनियम में वर्णित विधि द्वारा किन्तु इस अधिनियम ने भूमि विधि से न केवल जमींदारी का सफाया कर दिया वरन् धर्म (मजहब) को भी समाप्त कर दिया। किसी जोतदार के मरने पर उसकी भूमि का न्यागमन धारा 171 से 175 तक में वर्णित उसके उत्तराधिकारियों को जायेगा न कि उसके वैयक्तिक विधि उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार की विधि भूमिधर, सीरदार (असंक्राम्य अधिकार वाला भूमिधर) और असामी तीनों पर समान रूप से लागू होगी।
उक्त अधिनियम में असंक्राम्य अधिकार वाले भूमिधर को लगातार दस वर्ष तक कब्जे में बने रहने पर उसके अधिकार परिपक्व होकर संक्राम्य अधिकार प्राप्त कर लेता था। इसी प्रकार असामी के अधिकार निश्चित समय तक के लिए था।
सार्वजनिक उपयोगिता (Public utility) की भूमि पर किसी भी व्यक्ति को हक या अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता था भले ही ऐसी भूमि पट्टे पर खेती करने के लिए निश्चित समय के लिए दे दी जाती थी। आवासीय पट्टे की व्यवस्था कर गरीब जोतदार या कृषि मजदूरों को भूमि आवंटित करके उनकी आजीविका से वंचित नहीं किया गया था।
परन्तु अभ्यन्तर काल में शासन द्वारा ऐसा समझा गया कि उक्त अधिनियम के अलावा अनेक ऐसे पुराने अधिनियम बेकार चल रहे हैं जिनकी विधिक दृष्टि से कोई महता नहीं रह गई है अत: शासन ने उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 को निरस्त कर नया प्राविधान बनाने की मंशा व्यक्त की तथा सम्यक् विचारोपरान्त उ० प्र० जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के स्थान पर “उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 (उ० प्र० अधिनियम संख्या 8 वर्ष 2012 ) ” को विधानमण्डल ने दिनांक 12 दिसम्बर 2012 को पारित कर दिया, जिसे अधिसूचना द्वारा उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 1 की उपधारा (3) के अधीन शक्ति का प्रयोग करके महामहिम राज्यपाल ने संहिता की धाराएं 1, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 233 एवं 234 को दिनांक 18 दिसम्बर, 2015 से लागू कर दिया गया तथा शेष धाराओं को दिनांक 11 फरवरी, 2016 से प्रभावी कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप प्रदेश से अब उ० प्र० जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 पूर्णतः समाप्त हो चुका है तथा वर्तमान उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 भूमि अधिकारों, राजस्व आदि के सम्बन्ध में लागू हो चुकी है।
अधिनियम के उद्देश्य (Object of the Act)- किसी अधिनियम के उद्देश्य का पता उसकी प्रस्तावना से, उद्देश्यों और कारणों का विवरण से और पूरे अधिनियम को एक साथ पढ़ने से चलता है। इस अधिनियम की प्रस्तावना इस प्रकार है।
“चूँकि उत्तर प्रदेश में कृषक और राज्य के बीच मध्यवर्तियों के अस्तित्व से युक्त जमींदारी प्रथा का उन्मूलन करने, उक्त मध्यवर्तियों के अधिकार, आयम और हित को अर्जित करने तथा उक्त उन्मूलन एवं अर्जन के फलस्वरूप भौमिक अधिकार सम्बन्धी विधि में सुधार करने एवं उससे सम्बन्धित अन्य बातों की व्यवस्था करने के लिए प्रावधान करना इष्टकर है इसलिए निम्नलिखित बातें अधिनियमित की जाती हैं-
(1) कृषकों और राज्य के बीच मौजूद जमींदारों को हटाकर जमींदारी प्रथा का अन्त करना;
(2) जमीदारों के अधिकार, आगम और हित का राज्य सरकार द्वारा अर्जित किया जाना;
(3) जमींदारी उन्मूलन के फलस्वरूप भौमिक अधिकारों से सम्बन्धित कानून में सुधार करना;
(4) जमींदारी उम्मूलन के फलस्वरूप उससे सम्बन्धित अन्य बातों के लिए व्यवस्था करना;
(5) जैसे-भूमि का आवंटन, अर्जित की गई भू-सम्पत्ति का पर्यवेक्षण, सुरक्षा एवं मालगुजारी की वसूली आदि।
अधिनियम के उद्देश्यों और कारणों का विवरण (Statement of Object and reasons of the Act) – 10 जून, 1949 को सरकारी गजट में इस विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों का विवरण जो प्रकाशित हुआ था उसका सारांश निम्नलिखित हैं-
(1) जमींदारी प्रथा का उन्मूलन,
(2) मुआवजा का भुगतान करके जमींदारों के अधिकार, आगम और हित का अर्जन
(3) एक समान सरल जोतदारी व्यवस्था स्थापित करना और पुरानी भ्रामक कठिन जोतदारी व्यवस्था को समाप्त करना:
(4) शिकमी पर भूमि उठाने पर रोक लगाना:
(5) ग्रामीण स्वायत्त शासन का विकास
(6) अलाभकर जोतों के निर्माण पर रोक लगाना:
(7) अधिक भूमि के जमाव पर रोक लगाना;
(8) सहकारी खेती को प्रोत्साहित करना; और
(9) सामान्य उपयोगिता की सभी भूमियों को गाँव सभा में निहित करना और उनका प्रबन्ध करने के लिए उसे व्यापक शक्तियाँ साँपना।
उद्देश्यों की सफलता (Achievement of Objects)- जमींदारी उन्मूलन हुए लगभग 60 वर्ष से ऊपर हो गये यह अधिनियम अपने अधिकांश उद्देश्य के लक्ष्य को प्राप्त करने में अब तक सफल रहा है। उदाहरण के लिए-
(1) कृषकों और राज्य के बीच मौजूद मध्यवर्ती (जमींदार) हट गये और जोतदारों तथा सरकारों के बीच सीधा सम्बन्ध स्थापित हो गया है।
(2) पुरानी भ्रामक कठिन 14 प्रकार की जोतदारी प्रथा समाप्त हो गयी और उसके स्थान पर सरल जोतदारी व्यवस्था स्थापित हो गयी है जिसके अन्तर्गत अब केवल तीन प्रकार के जोतदार हैं- (1) अन्तरणीय अधिकार वाले भूमिधर (11) बिना अन्तरणीय अधिकार वाले भूमिधर और (iii) असामी।
(3) पट्टे पर भूमि उठाने पर रोक लगी हुई है। केवल इस अधिनियम में वर्णित अक्षम व्यक्ति ही अपनी भूमि पट्टे पर उठा सकते हैं।
(4) अधिक भूमि के जमाव पर इस प्रकार रोक लगा दी गई है कि कोई भी परिवार प्रदेश में कहीं भी अपनी जोत मिलाकर कुल 122 एकड़ से अधिक भूमि प्राप्त नहीं कर सकता है।
(5) अलाभकर जोतों के निर्माण पर इस प्रकार रोक लगा दी गई है कि 3 एकड़ या उससे कम भूमि का बँटवारा नहीं किया जा सकता है बल्कि न्यायालय के आदेश से उसकी बिक्री की जायेगी और विक्रय-धन को हिस्सेदारों में बाँट दिया जायेगा।
(6) ग्रामीण स्वायत्त शासन के विकास में यह अधिनियम सफल रहा। गाँवों के प्रशासन के लिए अब तीन स्वायत्तशासी संस्थायें (1) गाँव सभा, (2) गाँव पंचायत और (3) भूमि प्रबन्धक समिति सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं।
(7) सहकारी कृषि को प्रोत्साहन यह अधिनियम सहकारी कृषि की स्थापना और विकास में अवश्य ही असफल रहा है। यद्यपि इस अधिनियम ने सहकारी कृषि को प्रोत्साहन देने के लिए बहुत सी सुविधाओं की व्यवस्था की थी, फिर भी बहुत कम संख्या में सहकारी कृषि फार्म स्थापित हुए। तब सहकारी कृषि फार्म सम्बन्धी प्रावधानों को सन् 1965 में इस अधिनियम से निकालकर उत्तर-प्रदेश सहकारी समितियाँ अधिनियम, 1965 में रख दिया गया।
उपर्युक्त बिन्दुओं के आधार पर यह आसानी से कहा जा सकता है कि अधिनियम अपने उद्देश्य के अधिकांश भाग को प्राप्त करने में सफल रहा। वर्तमान में इस अधिनियम को निरसित कर अब उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 लाकर के इसके प्रावधानों को और भी सरलीकरण कर दिया गया है।
प्रश्न 7. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 किन क्षेत्रों में लागू होगा और किन क्षेत्रों में नहीं? स्पष्ट करें। Which areas enforced U.P. Revenue Code, 2006 and which Pareas are not enforced? Explain.
उत्तर- उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 1 (2) के अनुसार इस संहिता का विस्तार सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में होगा। उत्तर प्रदेश राज्य में भू-खातेदारी और भू-राजस्व से सम्बन्धित विधियों का समेकन एवं संशोधन करने और उससे सम्बन्धित एवं आनुषंगिक विषयों की व्यवस्था करने के लिए उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 बनाया गया है इसका विस्तार सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में होगा।
इस संहिता के उपबन्ध, अध्याय 8 एवं 9 को छोड़कर, सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में लागू होंगे और अध्याय 8 एवं 9 ऐसे क्षेत्रों में लागू होंगे जिन पर प्रथम अनुसूची के क्रम संख्या 19 और 25 पर विनिर्दिष्ट कोई अधिनियम इस संहिता द्वारा उनके निरसन के ठीक पूर्ववर्ती दिनांक को लागू था।
इस संहिता की धारा 3 (1) के अनुसार, जहां इस संहिता के प्रारम्भ होने के पश्चात् उत्तर प्रदेश के राज्य क्षेत्र में कोई क्षेत्र सम्मिलित किया जाय, वहाँ राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा ऐसे क्षेत्र में इस संहिता का सम्पूर्ण या कोई उपबन्ध विस्तारित कर सकती है।
जहाँ उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना जारी की जाय यहाँ उक्त उपधारा में विनिर्दिष्ट क्षेत्र में प्रवृत्त किसी अधिनियम, नियम या विनियम के उपबन्ध, जो इस प्रकार लागू किये गये उपबन्धों से असंगत हो, निरसित हुए समझे जायेंगे। [ धारा 3 (2) ]
राज्य सरकार किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचना द्वारा उपधारा (1) के अधीन जारी किसी अधिसूचना में संशोधन, उपान्तरण या परिवर्तन कर सकती है [धारा 3(3)]
प्रश्न 8. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत निम्नलिखित पदों को परिभाषित कीजिए-
(1) कृषि
(2) कृषि श्रमिक
(3) आबादी
(4) भूमि प्रबन्धक समिति
Define the following terms under the U.P. Revenue Code, 2006-
(I) Agriculture
(2) Agriculture labourer
(3) Abadl
(4) Land Management Committee.
उत्तर- (1) कृषि (Agriculture)-उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 4 (2) कृषि को परिभाषित करती है। कृषि का तात्पर्य, कृषि कार्य या खेती करना, बागवानी, फूलों की खेती, पशुपालन मछली पालन, मधुमक्खी पालन, मुर्गीपालन या इनसे सम्बन्धित सभी कार्य सम्मिलित हैं, जो कृषि पर निर्भर व्यक्ति एवं उसके परिवार की आजीविका का स्त्रोत हो। “कृषि” एवं “कृषि उद्देश्य” को उत्तर प्रदेश कृषि एवं कृषि उद्देश्य अधिनियम, 1973 की धारा 2 (क) में इस प्रकार से परिभाषित किया गया है :
“कृषि” और “कृषित उद्देश्य” के अन्तर्गत भूमि को खेती योग्य बनाना, भूमि पर खेती करना, भूमि सुधार (सिचाई के साधन लगाना), फसलें उगाना तथा पकने के पश्चात् कटाई करना, वानिकी, पशु-पालन, बागवानी, दुग्धशाला, कुक्कुट पालन, मछली पालन, सुअर पालन, पशु उत्पादन, मछलियों का प्रजनन कराना तथा उनके जीरे (बच्चे). उत्पन्न कराना, साथ ही समस्त उत्पादों को संरक्षण एवं बाजार में विक्रय हेतु उपलब्ध कराना कृषि में सम्मिलित किया गया है।
(2) कृषि श्रमिक (Agriculture labourer) कृषि श्रमिक को राजस्व संहिता की धारा 4 (3) में परिभाषित किया गया है। कृषि श्रमिक से अभिप्राय है कि ऐसे व्यक्ति जिनकी आजीविका का साधन कृषि में लगने वाला शारीरिक श्रम हो। ऐसे श्रमिक को खेतिहर मजदूर कहा जा सकता है, जिन्हें सामान्य उद्योगों में कार्य करने वाले श्रमिकों से भिन्न माना जाता है क्योंकि वे अकुशल मजदूर की श्रेणी में रखे जाते हैं जिनका मुख्य कार्य भूमि की जुताई करना, खड़ी फसलों को निराई-गुड़ाई, सिचाई एवं कटाई से सम्बन्धित होता है। खेतिहर मजदूर (कृषि श्रमिक) को उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम – की धारा 126 (ग) (घ) में पारिभाषित किया एवं उपरोक्त व्याख्या सम्मिलित की गई है।
(3) आबादी (Abadi) उ० प्र० राजस्व संहिता, 2006 की धारा 4 (1) में आबादी के विषय में प्रावधान किया गया है “आबादी” या “ग्रामीण आबादी” से अभिप्राय है कि वह स्थानीय क्षेत्र जो “ग्राम” या “गाँव” के रूप में राजस्व अभिलेख में दर्ज किया गया हो तथा उस गाँव में निवास करने वाले निवासी (जिनका मुख्य रूप से जीविकोपार्जन का साधन कृषि या कृषि पर आधारित उत्पाद या शारीरिक श्रम पर निर्भर हों) साथ ही ग्रामीण आबादी (जनसंख्या) उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 के अन्तर्गत तैयार की जाने वाली निर्वाचक नामावली में मतदाता (voter) के रूप में नाम अंकित किया – गया हो।
(4) भूमि प्रबन्धक समिति (Land Management Committee) भूमि प्रबन्धक समिति का उल्लेख उ० प्र० राजस्व संहिता, 2006 की धारा 4 (5) में किया गया है-इस समिति की स्थापना यू० पी० पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 28 (क) के अन्तर्गत की गई है। भूमि प्रबन्धक समिति गाँव पंचायत द्वारा निर्वाचित सदस्यों द्वारा ग्राम प्रधान के अधीन गठित समिति है जिसका मुख्य कार्य गाँव सभा के अधिकार क्षेत्र में आने वाली समस्त भूमि पर नियन्त्रण, पर्यवेक्षण, प्रबन्धन, एवं सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया है। ग्राम सभा का प्रधान सभापति तथा उपप्रधान-उपसभापति होता है तथा प्रत्येक गाँव सभा का कार्यरत लेखपाल पदेन मंत्री (Secretary) होता है। गाँव सभा के निर्वाचित सदस्य भूमि प्रबन्धक समिति के सदस्य होते हैं। उपरोक्त समिति अधिनियम में दिये गये समस्त कार्यों एवं दायित्वों का निर्वहन के लिए अपने अधिकारों एवं शक्तियों का प्रयोग कर सकती है। वर्तमान में गाँव सभा को समाप्त कर गाँव पंचायत कर दिया गया है।
प्रश्न 9. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत ‘परिवार’ शब्द की व्याख्या कीजिए। Explain the term ‘Family’ under the U.P. Revenue Code, 2006.
उत्तर- परिवार (Family) उ० प्र० राजस्व संहिता 2006 को धारा 4 को उपधारा 10 में परिवार का उल्लेख किया गया है। परिवार का अभिप्राय पति-पत्नी या थर्ड जेण्डर पति या पत्नी (परन्तु न्यायिक रूप से पृथक पत्नी या पति या थर्ड जेण्डर पति या पत्नी इसके अन्तर्गत नहीं आते) विवाहित पुत्रियों और थर्ड जेण्डर अवयस्क संतानों से भिन्न अवयस्क पुत्रों तथा अवयस्क पुत्रियों से है। यहाँ यह बताना उचित होगा कि वर्तमान संहिता के लागू किये जाने के पूर्व प्रदेश में, उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमिसुधार अधिनियम 1950 दिनांक 1 जुलाई, 1952 से लागू की गई थी जिसकी धारा 154 के अन्तर्गत 7 दिसम्बर, 1974 के पूर्व “परिवार” शब्द में शामिल थे- संक्रमणी पति या पत्नी (जैसी भी दशा हो) और उनके अवयस्क बच्चे। परिवार में पिता और माता सम्मिलित नहीं थे। अंतएव जब अन्तरण किसी अवयस्क बच्चे को किया जाता था तो उसके माता-पिता की भूमि 12-1/2 एकड़ की सीमा के लिए जोड़ी नहीं जाती थी। इस प्रकार अवयस्क अपने माता-पिता के परिवार में शामिल था, किन्तु माता-पिता अवयस्क के परिवार में नहीं आते थे। होशियार लोग भूमि अपने अवयस्क बच्चे के नाम लेते थे और धारा 154 के प्रतिबन्धों से बच जाते थे। विधान मण्डल ने उ० प्र० भूमि विधि (संशोधन) अधिनियम, 1974 पास करके इस दोष को भी हटा दिया। अधिनियम, 1950 के निरसित हो जाने के पश्चात ।
अब ‘परिवार’ शब्द में शामिल है संक्रमणी, पति या पत्नी (जैसी भी दशा हो) और उनके अवयस्क बच्चे और यदि संक्रमणी अवयस्क है तो उसके माता-पिता भी अवयस्क बच्चे के “परिवार” में शामिल माने जाएँगे, चाहे वे अविभक्त हों या विभक्त।
जैसे कि- एक भूमिधारक या खातेदार अपनी 3 एकड़ भूमि एक अवयस्क के को अन्तरित कर देता है। क के पिता के पास 12-1/2 एकड़ भूमि है। यह अन्तरण चूंकि निर्धारित सीमा 5.0586 हेक्टेयर या 12-1/2 एकड़ से अधिक हो जाती है। इस कारण पिता के पास की 12-1/2 एकड़ भूमि धारा 89 के प्रयोजनार्थ जोड़ ली जायेगी। इस प्रकार से परिवार के पास अन्तरण के परिणामस्वरूप 15-1/2 एकड़ भूमि हो जायेगी। चूँकि यह अन्तरण धारा 89 के प्रतिबन्धों के उल्लंघन में है, अतएव यह शून्य है।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2020 के बाद उ० प्र० राजस्व संहिता, 2006 की धारा 4 (10) के अनुसार किसी भू-खातेदार के सम्बन्ध में ‘परिवार’ का तात्पर्य यथास्थिति स्वयं पुरुष या स्त्री और उसकी पत्नी या उसका पति या धई जेण्डर पत्नी या पति (न्यायिक रूप से पृथक् पत्नी या पति या थर्ड जेण्डर पति या पत्नी से भिन्न), विवाहित पुत्रियों और थर्ड जेण्डर अवयस्क संतानों से भिन्न अवयस्क पुत्रों तथा अवयस्क पुत्रियों से है।
थर्ड जेण्डर का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो पुरुष अथवा स्त्री लिंग से भिन्न लिंग का हो।
भूमि में सम्पत्तिक अधिकार (Property Rights in Land)
1. हिन्दू काल में सम्पत्तिक अधिकार का उद्गम एवं विकास
हिन्दू काल में सम्पत्तिक अधिकार का विकास धार्मिक और सामाजिक परंपराओं पर आधारित था। भूमि को निजी सम्पत्ति के रूप में नहीं बल्कि एक पवित्र धरोहर के रूप में देखा जाता था। मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार थीं:
- वैदिक काल (1500-600 ईसा पूर्व) – भूमि व्यक्तिगत स्वामित्व के बजाय जनजातीय या कुलीन स्वामित्व में थी। राजा को भूमि का संरक्षक माना जाता था।
- महाजनपद एवं मौर्य काल (600 ईसा पूर्व – 300 ईसा पश्चात) – इस काल में भूमि कर (भूमि से राजस्व) लिया जाने लगा और कृषि योग्य भूमि पर निजी स्वामित्व बढ़ने लगा।
- गुप्त एवं उत्तरवर्ती काल (300-1200 ईसा पश्चात) – जमींदारी और भू-संबंधी अधिकार स्थापित हुए। राजा, मंदिर, ब्राह्मणों और सामंतों को भूमि अनुदान देने लगा।
2. मुस्लिम काल में सम्पत्तिक अधिकार का विकास
मुस्लिम शासन (1206-1707) में भूमि स्वामित्व का स्वरूप अधिक संगठित हुआ।
- दिल्ली सल्तनत काल (1206-1526) – भूमि पर राज्य का सर्वोच्च अधिकार माना गया। इक्ता प्रणाली लागू की गई, जिसमें अधिकारियों को भूमि राजस्व का एक भाग दिया जाता था।
- मुगल काल (1526-1707) – टोडरमल की राजस्व प्रणाली लागू हुई, जिसमें भूमि की माप और कर निर्धारण किया गया। जमींदारों की भूमिका बढ़ी और भूमि पर स्वामित्व से अधिक, राजस्व वसूली पर ध्यान दिया गया।
3. ब्रिटिश काल में सम्पत्ति के अधिकार का विकास
ब्रिटिश शासन (1757-1947) में सम्पत्तिक अधिकारों का कानूनी ढांचा तैयार किया गया।
- स्थायी बंदोबस्त प्रणाली (1793) – लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू की गई। जमींदारों को भूमि का मालिक बना दिया गया।
- रैयतवाड़ी प्रणाली (1820) – मद्रास और बॉम्बे में लागू की गई, जिसमें किसान सीधे सरकार को कर चुकाते थे।
- महलवाड़ी प्रणाली (1822) – उत्तर भारत में लागू की गई, जिसमें ग्राम समुदायों को कर देने का अधिकार दिया गया।
- भूमि सुधार कानून – 19वीं और 20वीं शताब्दी में कई सुधार किए गए, जिससे किसानों को भूमि पर कुछ अधिकार मिले।
4. उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1950 से पहले भूमि सम्बन्धी अधिनियम
उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम (U.P.Z.A. 1950) से पहले कई भूमि संबंधी कानून लागू थे:
- ओध जमींदारी अधिनियम, 1886
- उत्तर प्रदेश एग्रीकल्चरल टेनेंसी एक्ट, 1926
- उत्तर प्रदेश लैंड रेवेन्यू एक्ट, 1901
- सीलिंग ऑन लैंड होल्डिंग एक्ट, 1939
इन अधिनियमों के तहत जमींदारी व्यवस्था बनी रही और किसानों को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया।
5. जमींदारी प्रथा और उसका उन्मूलन
जमींदारी प्रथा – ब्रिटिश शासन में जमींदारों को भूमि का स्वामी बना दिया गया था, जिससे वे किसानों से अधिक कर वसूलने लगे। किसान मात्र किरायेदार रह गए और अत्यधिक शोषण हुआ।
जमींदारी उन्मूलन के प्रयास –
- स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भूमि सुधार की मांग
- संविधान में भूमि सुधार के लिए अनुच्छेद 39
- उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950
6. उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम (U.P.Z.A.L.R. Act, 1950)
मुख्य विशेषताएँ:
- जमींदारी प्रथा समाप्त की गई – जमींदारों की भूमि सरकार द्वारा अधिग्रहित कर किसानों को दी गई।
- भूमि पर कृषकों के अधिकार – किसानों को भूस्वामी बनाया गया।
- कृषि भूमि का पुनर्वितरण – गरीब किसानों को भूमि उपलब्ध कराई गई।
- सीलिंग प्रणाली लागू की गई – एक व्यक्ति या परिवार के पास सीमित भूमि रखने की व्यवस्था बनी।
उद्देश्य और उपलब्धियाँ:
- किसानों को भूमि स्वामित्व का अधिकार मिला।
- कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई।
- भूमि का पुनर्वितरण करके सामाजिक न्याय को बढ़ावा दिया गया।
7. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 का लागू क्षेत्र
लागू क्षेत्र:
- यह पूरे उत्तर प्रदेश में लागू होता है, सिवाय कुछ विशेष अधिसूचित क्षेत्रों के।
जहाँ लागू नहीं होता:
- छावनी क्षेत्र (Cantonment Areas)
- वन भूमि (Forest Areas)
- केंद्र शासित प्रदेश के अधीन क्षेत्र
निष्कर्ष:
भूमि संबंधी अधिकारों का विकास समय के साथ कानूनी सुधारों के माध्यम से हुआ। हिन्दू, मुस्लिम और ब्रिटिश काल में भूमि स्वामित्व के अलग-अलग स्वरूप रहे। स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार कानूनों ने किसानों को वास्तविक अधिकार दिलाने में मदद की।
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत परिभाषाएँ
8. निम्नलिखित पदों की परिभाषा
(1) कृषि (Agriculture):
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार कृषि का अर्थ है – भूमि की जुताई, बुवाई, रोपाई, फसल उगाना और कटाई करना। इसमें वृक्षारोपण, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन एवं मधुमक्खी पालन जैसे कार्य भी शामिल होते हैं।
(2) कृषि श्रमिक (Agriculture Labourer):
कृषि श्रमिक वह व्यक्ति होता है, जो किसी अन्य व्यक्ति की भूमि पर कृषि कार्य करता है और बदले में मजदूरी प्राप्त करता है। यह मजदूरी नकद या अनाज के रूप में दी जा सकती है। कृषि श्रमिक को भूमि पर कोई स्वामित्व अधिकार नहीं होता।
(3) आबादी (Abadi):
आबादी से तात्पर्य गाँव या नगर की वह भूमि है, जो आवास, सड़कों, गलियों, तालाबों और सार्वजनिक उपयोग की अन्य संरचनाओं के लिए आरक्षित होती है। यह कृषि भूमि से अलग होती है।
(4) भूमि प्रबंधक समिति (Land Management Committee):
भूमि प्रबंधक समिति गाँव के सार्वजनिक और पंचायत भूमि का प्रबंधन करने वाली इकाई होती है। यह समिति ग्राम प्रधान की अध्यक्षता में कार्य करती है और भूमि आवंटन, देखरेख एवं विवाद निपटान से संबंधित निर्णय लेती है।
9. ‘परिवार’ (Family) की परिभाषा
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार ‘परिवार’ में पति, पत्नी, अवयस्क संतानें और आश्रित माता-पिता शामिल होते हैं। कुछ परिस्थितियों में, अन्य आश्रित सदस्य भी परिवार का हिस्सा माने जा सकते हैं, विशेष रूप से तब जब वे परिवार के भरण-पोषण पर निर्भर हों।
10. निम्नलिखित पदों की परिभाषा
(1) राजस्व परिषद (Board of Revenue):
राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश में भूमि एवं राजस्व संबंधी मामलों का सर्वोच्च अपीलीय निकाय है। यह भूमि विवादों, कर निर्धारण, और अन्य राजस्व मामलों में निर्णय लेने का कार्य करता है।
(2) कलेक्टर (Collector):
कलेक्टर (जिला अधिकारी) किसी जिले का प्रमुख राजस्व अधिकारी होता है। वह भूमि प्रशासन, राजस्व संग्रह, और कानून व्यवस्था से जुड़े कार्यों की देखरेख करता है।
(3) पूर्त-संस्था (Charitable Institution):
पूर्त-संस्था वह संगठन होती है, जो जनहित और परोपकार के कार्यों के लिए बनाई जाती है। इसमें धर्मार्थ अस्पताल, शिक्षण संस्थान, अनाथालय, वृद्धाश्रम, और समाजसेवा से जुड़े अन्य संस्थान शामिल होते हैं।
(4) आस्थान (Estate):
आस्थान का तात्पर्य भूमि की उस इकाई से है, जो किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार के स्वामित्व में हो और जिसे राजस्व कानूनों के अंतर्गत दर्ज किया गया हो। इसमें कृषि भूमि, जंगल, बाग और अन्य भूमि क्षेत्र शामिल हो सकते हैं।
11. निम्नलिखित पदों की परिभाषा
(1) ग्राम निधि एवं एकीकृत ग्राम फण्ड (Village Fund and Integrated Village Fund):
ग्राम निधि वह कोष होता है, जिसमें ग्राम पंचायत के राजस्व और अन्य आय को जमा किया जाता है। यह कोष ग्रामीण विकास, बुनियादी सुविधाओं और पंचायत कार्यों में खर्च किया जाता है। एकीकृत ग्राम फण्ड का तात्पर्य विभिन्न ग्रामीण योजनाओं से प्राप्त निधियों के समेकन से है।
(2) बाग या बाग भूमि (Orchard or Orchard Land):
बाग वह भूमि होती है, जिस पर फलदार वृक्षों या बागवानी के लिए पौधों की खेती की जाती है। इसमें आम, अमरूद, नींबू, केला आदि के बाग शामिल होते हैं।
(3) जोत (Holding):
जोत उस भूमि को कहते हैं, जो किसी एक किसान या काश्तकार द्वारा कृषि कार्य के लिए उपयोग में लाई जाती है। यह भूमि व्यक्तिगत स्वामित्व की भी हो सकती है या पट्टे पर ली गई हो सकती है।
(4) उन्नत कार्य (Improvement Work):
उन्नत कार्य का अर्थ वह सभी कार्य हैं, जो भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने या उसे अधिक उत्पादक बनाने के लिए किए जाते हैं। इसमें सिंचाई के साधन विकसित करना, मिट्टी संरक्षण, उर्वरक उपयोग, वृक्षारोपण और अन्य सुधारात्मक गतिविधियाँ शामिल होती हैं।
निष्कर्ष:
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 में भूमि और राजस्व संबंधी विभिन्न परिभाषाएँ दी गई हैं, जो भूमि प्रशासन और प्रबंधन को स्पष्ट करने में मदद करती हैं। इन कानूनी परिभाषाओं के माध्यम से भूमि सुधार, कराधान, और राजस्व विवादों के समाधान की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया गया है।
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत विभिन्न परिभाषाएँ और संक्षिप्त टिप्पणियाँ
12. भूमि एवं भूमिधारक (Land and Land-holder) की परिभाषा
(1) भूमि (Land):
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार, भूमि का तात्पर्य उस भू-भाग से है, जिसका उपयोग कृषि, बागवानी, भवन निर्माण, औद्योगिक या अन्य प्रयोजनों के लिए किया जाता है। इसमें कृषि भूमि, बंजर भूमि, चारागाह, तालाब और अन्य सार्वजनिक भूमि शामिल होती है।
(2) भूमिधारक (Land-holder):
भूमिधारक वह व्यक्ति होता है, जिसके नाम पर भूमि का स्वामित्व या कानूनी अधिकार दर्ज हो। इसमें वह व्यक्ति भी शामिल होता है, जो भूमि पर काश्तकारी अधिकार रखता हो या सरकार द्वारा भूमि पट्टे पर प्राप्त की हो।
13. निम्नलिखित पदों की परिभाषा
(1) राजस्व न्यायालय (Revenue Court):
राजस्व न्यायालय वे न्यायालय होते हैं, जो भूमि और राजस्व मामलों से संबंधित विवादों का निपटारा करते हैं। ये न्यायालय भूमि स्वामित्व, किरायेदारी, कर निर्धारण, और अन्य राजस्व मामलों में निर्णय सुनाते हैं।
(2) राजस्व अधिकारी (Revenue Officer):
राजस्व अधिकारी वह सरकारी अधिकारी होता है, जो भूमि एवं राजस्व मामलों का प्रबंधन करता है। इसमें तहसीलदार, नायब तहसीलदार, उप-जिलाधिकारी (SDM) और कलेक्टर (DM) शामिल होते हैं।
(3) टाँगिया रोपवनी (Taungya Plantation):
टाँगिया रोपवनी वह कृषि-वनीकरण पद्धति है, जिसमें किसानों को वन विभाग द्वारा जंगल के पुनर्विकास के लिए अस्थायी रूप से भूमि दी जाती है। वे इसमें वृक्षारोपण करने के साथ-साथ कुछ समय तक खेती भी कर सकते हैं।
(4) पट्टा (Lease):
पट्टा वह लिखित अनुबंध (Agreement) होता है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को सरकारी या निजी भूमि निश्चित समय के लिए किराए पर दी जाती है। यह कृषि, आवासीय, औद्योगिक या अन्य प्रयोजनों के लिए हो सकता है।
14. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ
(1) डिक्री (Decree):
डिक्री वह न्यायिक आदेश या निर्णय होता है, जो राजस्व न्यायालय द्वारा किसी विवाद के निपटारे के रूप में पारित किया जाता है। यह किसी व्यक्ति के अधिकार, स्वामित्व या भूमि से संबंधित अन्य मामलों को स्पष्ट करता है।
(2) मिनजुमला नम्बर (Minjumla Number):
यह राजस्व रिकॉर्ड में उपयोग होने वाला एक विशेष संख्या (संख्या कोड) होता है, जिसका उपयोग मिश्रित भूमि या विवादित भूमि को दर्शाने के लिए किया जाता है।
(3) मध्यवर्ती (Intermediary):
मध्यवर्ती वे लोग होते थे, जो ब्रिटिश काल में जमींदारों और किसानों के बीच भूमि व्यवस्था में शामिल होते थे। जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद इनकी भूमिका समाप्त कर दी गई।
(4) गाँव (ग्राम) (Village):
गाँव या ग्राम वह प्रशासनिक इकाई है, जिसमें एक निश्चित संख्या में घर, खेत और अन्य बुनियादी सुविधाएँ होती हैं। यह ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है और ग्रामीण प्रशासन का प्रमुख केंद्र होता है।
(5) ग्रामीण शिल्पी (Village Artisan):
ग्राम शिल्पी वे लोग होते हैं, जो गाँव में पारंपरिक शिल्प और कारीगरी का कार्य करते हैं, जैसे – बढ़ई, लोहार, कुम्हार, जुलाहा आदि। ये लोग गाँव की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
(6) किसान बही (Kisan Bahi):
किसान बही वह दस्तावेज होती है, जिसमें किसान की भूमि, फसल, ऋण और अन्य राजस्व संबंधी जानकारी दर्ज होती है। यह रिकॉर्ड रखने के लिए महत्वपूर्ण होती है।
(7) मातहत-स्वामी (Under Proprietor):
मातहत-स्वामी वे लोग होते थे, जो मुख्य जमींदारों के अधीन भूमि का स्वामित्व रखते थे। वे किसानों से किराया वसूलते थे और बदले में राजस्व देते थे।
(8) कृषि वर्ष (Agricultural Year):
कृषि वर्ष वह निर्धारित अवधि होती है, जिसके अंतर्गत फसल उत्पादन और उससे संबंधित कर निर्धारण किया जाता है। आमतौर पर यह 1 जुलाई से 30 जून तक माना जाता है।
15. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत राजस्व क्षेत्रों का गठन
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार, राज्य को विभिन्न राजस्व क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। इसका उद्देश्य भूमि प्रशासन को सुचारू रूप से चलाना और कर प्रणाली को व्यवस्थित करना है।
मुख्य राजस्व इकाइयाँ:
- राजस्व मंडल (Revenue Division):
- यह राज्य में राजस्व प्रशासन का सर्वोच्च स्तर है।
- प्रत्येक मंडल का प्रमुख ‘राजस्व मंडल आयुक्त’ होता है।
- जिला (District):
- प्रत्येक मंडल में कई जिले होते हैं।
- जिले का प्रमुख ‘जिलाधिकारी (Collector)’ होता है।
- तहसील (Tehsil):
- प्रत्येक जिले में कई तहसीलें होती हैं।
- तहसील का प्रमुख ‘तहसीलदार’ होता है।
- परगना (Pargana):
- तहसीलों के अंतर्गत छोटे प्रशासनिक खंड होते हैं, जिन्हें परगना कहा जाता है।
- यह व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से चली आ रही है।
- ग्राम पंचायत (Village Panchayat):
- गाँव स्तर पर राजस्व कार्यों का संचालन ग्राम पंचायत करती है।
- ग्राम पंचायत के अधीन ‘भूमि प्रबंधक समिति’ कार्यरत होती है।
निष्कर्ष:
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार, भूमि और राजस्व प्रशासन को सुव्यवस्थित करने के लिए विभिन्न प्रशासनिक इकाइयाँ बनाई गई हैं। ये इकाइयाँ राज्य के राजस्व संग्रहण, भूमि विवाद निपटान, और ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
16. राजस्व परिषद (Revenue Board) और अधिकारिता एवं कार्यों का वितरण करने की शक्ति
राजस्व परिषद (Revenue Board):
राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश में भूमि और राजस्व मामलों के निपटारे और प्रशासन के लिए एक उच्चतम प्राधिकृत निकाय है। यह परिषद राज्य के भूमि और राजस्व मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संस्था होती है। इसके पास भूमि संबंधी विवादों, करों और अन्य राजस्व प्राधिकरणों से संबंधित मामलों को सुलझाने की शक्ति होती है।
अधिकारिता एवं कार्यों का वितरण (Power to distribute business and Jurisdiction):
राजस्व परिषद के पास अपने कार्यों और जिम्मेदारियों के वितरण की शक्ति होती है। यह परिषद विभिन्न राजस्व अधिकारियों के मध्य कार्यों को विभाजित करती है। परिषद में इस शक्ति का उपयोग कर, विभिन्न न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों को निर्धारित किया जाता है, जैसे कि भूमि अधिकारों का निपटारा, जमीन की नीलामी, राजस्व का निर्धारण, भूमि सुधार आदि। परिषद यह तय करती है कि कौन सा मामला किस राजस्व अधिकारी के पास जाएगा और कार्यों के बीच समन्वय बनाए रखने के लिए इसके अधिकार क्षेत्र का निर्धारण करती है।
17. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी
(क) कमिश्नर और अतिरिक्त कमिश्नर (Commissioner and Additional Commissioner):
- कमिश्नर (Commissioner):
कमिश्नर राज्य के राजस्व प्रशासन का प्रमुख अधिकारी होता है। यह एक क्षेत्रीय प्रशासनिक इकाई का प्रमुख होता है और भूमि संबंधित मामलों की उच्चतम न्यायिक और प्रशासनिक शक्ति रखता है। कमिश्नर की भूमिका में भूमि विवादों का निपटारा, कार्यों का निरीक्षण और विकास योजनाओं का क्रियान्वयन शामिल होता है। - अतिरिक्त कमिश्नर (Additional Commissioner):
अतिरिक्त कमिश्नर कमिश्नर के अधीन कार्य करता है और उसे विभिन्न कार्यों में सहायता प्रदान करता है। जब कमिश्नर अनुपस्थित होते हैं या किसी विशेष मामले में अतिरिक्त शक्तियों की आवश्यकता होती है, तो अतिरिक्त कमिश्नर को कार्य सौंपा जाता है।
(ख) राजस्व निरीक्षक (Revenue Inspector):
राजस्व निरीक्षक भूमि और राजस्व मामलों के निरीक्षण, समीक्षा और रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार होते हैं। इनका मुख्य कार्य भूमि का सर्वेक्षण करना, भूमि रिकॉर्ड का रखरखाव करना और राजस्व संबंधी मामलों में प्रगति की रिपोर्ट तैयार करना होता है। यह निरीक्षक तहसील स्तर पर कार्य करते हैं और कलेक्टर व तहसीलदार को रिपोर्ट प्रदान करते हैं।
18. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत कमिश्नर की शक्तियाँ
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत कमिश्नर के पास कई महत्वपूर्ण शक्तियाँ होती हैं, जिनमें शामिल हैं:
- राजस्व मामले निपटाने की शक्ति: कमिश्नर को राजस्व मामलों, भूमि विवादों और भूमि सुधार संबंधी मुद्दों को सुलझाने की शक्ति दी जाती है।
- निर्णय लेना: कमिश्नर भूमि के स्वामित्व, अधिकार, और उपयोग के मामलों में अंतिम निर्णय लेने के लिए सक्षम होते हैं।
- समीक्षा और अपील: कमिश्नर भूमि स्वामित्व और कर निर्धारण से संबंधित मामलों की समीक्षा कर सकते हैं और न्यायिक निर्णय दे सकते हैं।
- भूमि सुधार कार्यों का कार्यान्वयन: कमिश्नर के पास भूमि सुधार योजना की निगरानी करने की शक्ति होती है।
19. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी
(1) कलेक्टर (Collector):
कलेक्टर, जिले का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होता है। वह राजस्व संग्रहण, भूमि विवादों के समाधान, और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होता है। कलेक्टर भूमि से संबंधित मामलों में अंतिम निर्णय लेने का अधिकारी होता है।
(2) सहायक कलेक्टर (Assistant Collector):
सहायक कलेक्टर कलेक्टर के अधीन कार्य करता है और जिलों में विभिन्न राजस्व कार्यों का संचालन करता है। वह कलेक्टर के निर्देशों का पालन करते हुए मामलों को निपटाते हैं।
(3) अतिरिक्त कलेक्टर (Additional Collector):
अतिरिक्त कलेक्टर का कार्य कलेक्टर के कार्यों में सहयोग करना और कलेक्टर की अनुपस्थिति में उनके कार्यों की जिम्मेदारी निभाना होता है।
(4) तहसीलदार (Tahsildar):
तहसीलदार तहसील स्तर पर राजस्व मामलों का संचालन करता है। वह भूमि सर्वेक्षण, कर निर्धारण, और भूमि स्वामित्व से संबंधित कार्यों का संचालन करता है।
(5) नायब तहसीलदार (Naib-Tahsildar):
नायब तहसीलदार तहसीलदार के अधीन कार्य करता है और उसे प्रशासनिक कार्यों में सहायता प्रदान करता है।
(6) लेखपाल (Lekhpal):
लेखपाल राजस्व रिकॉर्ड की देखभाल और भूमि सर्वेक्षण का कार्य करता है। यह किसानों और भूमि स्वामियों से संबंधित जानकारी एकत्र करता है और राजस्व अधिकारियों को रिपोर्ट करता है।
(7) खसरा और खतौनी (Khasra and Khatauni):
खसरा (Khasra): खसरा एक प्रकार का भूमि रिकॉर्ड होता है, जिसमें भूमि की सीमा, आकार और उपयोग की जानकारी होती है।
खतौनी (Khatauni): खतौनी भूमि मालिकों की जानकारी का रिकॉर्ड है, जिसमें भूमि स्वामित्व और उपयोगकर्ता का विवरण होता है।
20. कलेक्टर की शक्तियाँ और कर्तव्य
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत कलेक्टर के पास विभिन्न शक्तियाँ और कर्तव्य होते हैं:
- राजस्व संग्रहण: कलेक्टर राज्य सरकार के राजस्व संग्रहण का प्रमुख अधिकारी होता है। वह सभी प्रकार के कर और राजस्व वसूल करने का कार्य करता है।
- भूमि विवादों का समाधान: कलेक्टर भूमि स्वामित्व, सीमांकन, और कर निर्धारण से संबंधित विवादों का समाधान करता है।
- कार्यपालन: कलेक्टर भूमि सुधार योजनाओं और सरकारी आदेशों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है।
- सुरक्षा बनाए रखना: कलेक्टर जिले में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होता है।
- न्यायिक कार्य: कलेक्टर भूमि से संबंधित मामलों में न्यायिक कार्य भी कर सकता है, जैसे कि भूमि पुनः वितरण, दावा निपटारा आदि।
कलेक्टर का कार्य व्यापक और विविध होता है, जो जिला स्तर पर भूमि, राजस्व और प्रशासनिक कार्यों को सुचारू रूप से चलाने में मदद करता है।
21. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत सहायक कलेक्टर परगनाधिकारी की शक्तियाँ
सहायक कलेक्टर परगनाधिकारी (Assistant Collector In-charge of Sub-division):
सहायक कलेक्टर परगनाधिकारी राज्य में उपखंड के अंतर्गत राजस्व कार्यों का संचालन करता है। उनके पास कई शक्तियाँ होती हैं, जैसे:
- भूमि विवादों का निपटारा: सहायक कलेक्टर भूमि विवादों और राजस्व संबंधित मामलों को हल करने के लिए अधिकृत होता है।
- राजस्व संग्रहण: वह उपखंड के राजस्व वसूली के कार्य का संचालन करता है और कर निर्धारण से संबंधित कार्यों का निपटारा करता है।
- जमीन की समीक्षा: वह उपखंड के अंतर्गत भूमि सर्वेक्षण, खसरा, खतौनी और भूमि रिकॉर्ड के रखरखाव की निगरानी करता है।
- भूमि सुधार कार्यों का कार्यान्वयन: सहायक कलेक्टर भूमि सुधार योजनाओं का कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है।
- न्यायिक कार्य: वह राजस्व मामलों के न्यायिक कार्यों को देखता है, जैसे भूमि अधिकारों का निपटारा, भूमि पुनर्वितरण, आदि।
22. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत तहसीलदार और नायब तहसीलदार के कार्यों की विवेचना
तहसीलदार (Tahsildar):
तहसीलदार एक प्रशासनिक अधिकारी होता है जो तहसील स्तर पर राजस्व कार्यों का संचालन करता है। उनके कार्यों में शामिल हैं:
- राजस्व वसूली: तहसीलदार स्थानीय स्तर पर करों की वसूली और भूमि संबंधित अन्य दायित्वों का पालन कराता है।
- भूमि विवादों का निपटारा: तहसीलदार भूमि विवादों को सुलझाने और भूमि स्वामित्व के अधिकारों का निर्धारण करता है।
- लेखपाल के कार्यों का निरीक्षण: वह लेखपाल द्वारा किए गए भूमि सर्वेक्षण और रिकॉर्ड की निगरानी करता है।
- न्यायिक कार्य: तहसीलदार भूमि से संबंधित मामलों में मध्यस्थता करता है और विवादों को निपटाने के लिए न्यायिक निर्णय लेता है।
नायब तहसीलदार (Naib-Tahsildar):
नायब तहसीलदार तहसीलदार के अधीन कार्य करता है और उनके कार्यों में सहायता करता है। उसके कर्तव्य हैं:
- तहसीलदार के कार्यों का पालन: नायब तहसीलदार तहसीलदार के निर्देशों का पालन करता है और जरूरी कार्यों का निष्पादन करता है।
- राजस्व वसूली: वह तहसीलदार द्वारा निर्धारित कर वसूल करने में मदद करता है।
- भूमि विवाद निपटारे में सहायता: नायब तहसीलदार भूमि विवादों को सुलझाने में तहसीलदार को सहायता प्रदान करता है।
23. लेखपाल किसे कहते हैं? उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत लेखपाल के कर्तव्य
लेखपाल (Lekhpal):
लेखपाल एक राजस्व कर्मचारी होता है जो भूमि संबंधित रिकॉर्ड, सर्वेक्षण और राजस्व वसूली में सहायता प्रदान करता है। यह ग्राम स्तर पर कार्य करता है और किसान या भूमि मालिक से संबंधित विभिन्न रिकॉर्डों को अद्यतन करता है।
लेखपाल के कर्तव्य:
- खसरा और खतौनी का रखरखाव: लेखपाल भूमि स्वामियों के रिकॉर्ड, खसरा और खतौनी को अद्यतन करता है।
- भूमि सर्वेक्षण: वह भूमि की सीमा, क्षेत्रफल, और अन्य विवरणों का सर्वेक्षण करता है।
- राजस्व वसूली: लेखपाल राजस्व वसूली और कर संग्रहण के कार्यों में सहायता प्रदान करता है।
- कृषक जानकारी का संकलन: वह कृषकों से संबंधित जानकारी एकत्र करता है और उसे राजस्व अधिकारियों को रिपोर्ट करता है।
- वार्षिक रजिस्टर में शुद्धि: वह वार्षिक रजिस्टर में किसी भी प्रकार की गलती को सुधारने का कार्य करता है।
24. सीमा चिह्न और सीमा विवाद निपटारा प्रणाली
सीमा चिह्न (Boundary Marks):
सीमा चिह्न वह निशान होते हैं जो भूमि की सीमाओं को निर्धारित करने के लिए लगाए जाते हैं। ये चिह्न भूमि के आकार, स्थिति, और स्वामित्व को दर्शाते हैं। ये चिह्न प्राकृतिक या कृत्रिम हो सकते हैं जैसे पत्थर, लकड़ी, कागज के निशान आदि।
सीमा विवाद निपटारा प्रणाली:
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत सीमा विवादों के निपटारे के लिए एक स्पष्ट प्रणाली है। यदि सीमा को लेकर विवाद उत्पन्न होता है, तो यह विवाद संबंधित तहसीलदार या उपखंड अधिकारी के पास जाता है। अधिकारी सर्वेक्षण कर सीमा निर्धारण करता है और विवाद का समाधान करता है। यदि मामला न सुलझे तो इसे उच्च स्तर पर भेजा जा सकता है, जैसे कलेक्टर या कमिश्नर के पास।
25. मार्गाधिकार और अन्य सुखाचार पर संक्षिप्त टिप्पणी
मार्गाधिकार (Right of Way):
मार्गाधिकार वह अधिकार होता है जिसमें एक व्यक्ति को किसी दूसरे की भूमि पर निश्चित मार्ग के रूप में चलने का अधिकार होता है, जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक रास्तों के लिए। यह अधिकार भूमि मालिक की अनुमति से होता है और यह सुनिश्चित करता है कि किसी के निजी भूमि पर जाने का उचित मार्ग रहे।
अन्य सुखाचार (Other Easements):
सुखाचार वह अधिकार होते हैं जो एक व्यक्ति को दूसरे की भूमि पर स्वीकृत होते हैं, जैसे जल उपयोग का अधिकार, वायु संचरण का अधिकार आदि। इन अधिकारों का उद्देश्य भूमि के उपयोग को सुविधाजनक बनाना होता है, बशर्ते ये अन्य व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन न करें।
26. गाँव और ग्रामों की सूची
गाँव (Village):
गाँव एक छोटी सी प्रशासनिक इकाई होती है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित होती है। यह भूमि उपयोग, कृषि कार्य, और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र होता है।
ग्रामों की सूची (List of Villages):
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत ग्रामों की सूची वह सूची होती है जिसमें राज्य के सभी ग्रामों के नाम, स्थिति और अन्य महत्वपूर्ण विवरण शामिल होते हैं। यह सूची सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा होती है और भूमि प्रशासन और विकास कार्यों के लिए आवश्यक होती है।
27. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी
(1) गाँव का नक्शा:
गाँव का नक्शा उस गाँव के क्षेत्रफल, सीमाओं, और भूमि का ग्राफिक चित्रण होता है।
(2) खसरा:
खसरा भूमि के आकार, सीमा और स्वामित्व का विवरण देने वाला दस्तावेज़ होता है।
(3) अधिकारों का अभिलेख:
यह रिकॉर्ड भूमि स्वामित्व, उपयोग और अन्य अधिकारों के बारे में जानकारी देता है।
(4) खतौनी:
खतौनी वह दस्तावेज़ होता है जिसमें भूमि मालिकों का नाम और उनकी भूमि संबंधी अधिकारों का विवरण होता है।
(5) वार्षिक रजिस्टर में शुद्धि:
यह प्रक्रिया भूमि के रिकॉर्ड को अद्यतन करने और उसमें कोई भी गलत जानकारी सुधारने का कार्य है।
(6) नक्शे एवं खसरे की दुरुस्ती:
यह कार्य उन नक्शों और खसरे में त्रुटियों को सुधारने से संबंधित है जो भूमि सर्वेक्षण और रिकॉर्ड में होते हैं।
(7) किसान बही:
किसान बही उस दस्तावेज़ को कहते हैं जिसमें कृषक अपनी कृषि गतिविधियों, फसलों, और उनके द्वारा किए गए कामों का रिकॉर्ड रखता है।
28. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत राजस्व अभिलेखों में नामान्तरण (दाखिल खारिज की प्रक्रिया)
नामान्तरण (Mutation of Names):
नामान्तरण या दाखिल-खारिज वह प्रक्रिया होती है, जिसके द्वारा भूमि के मालिक का नाम राजस्व अभिलेखों में अपडेट किया जाता है, जैसे खसरा, खतौनी आदि। यह प्रक्रिया तब होती है जब किसी भूमि के स्वामित्व में परिवर्तन होता है, जैसे बिक्री, दान, वसीयत या उत्तराधिकार के कारण।
प्रक्रिया:
- दाखिल खारिज आवेदन: जब भूमि के स्वामी का परिवर्तन होता है, तो भूमि के नए मालिक को संबंधित तहसील या लेखपाल के पास आवेदन देना होता है।
- दस्तावेज़ों का संकलन: आवेदन के साथ आवश्यक दस्तावेज़, जैसे विक्रय पत्र (Sale Deed), वसीयत (Will), मृत्यु प्रमाण पत्र, आदि प्रस्तुत किए जाते हैं।
- सर्वेक्षण: तहसीलदार या संबंधित अधिकारी भूमि का सर्वेक्षण कर सकते हैं और आवश्यक रूप से सत्यापन कर सकते हैं।
- स्मरण पत्र जारी करना: एक बार सत्यापन होने के बाद, तहसीलदार संबंधित दस्तावेज़ों को स्वीकार करता है और भूमि के रिकॉर्ड में नामान्तरण की प्रक्रिया शुरू करता है।
- रजिस्टर में नामान्तरण: अंततः नए स्वामी का नाम राजस्व रजिस्टर में जोड़ा जाता है और पुराने स्वामी का नाम हटा दिया जाता है।
29. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत नक्शे तथा अभिलेखों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया
नक्शे और अभिलेखों का पुनरीक्षण (Revision of Maps and Records):
राजस्व अभिलेखों और नक्शों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया का उद्देश्य भूमि के सही रिकॉर्ड और उपयोग सुनिश्चित करना है। यह विशेष रूप से भूमि परिवर्तन, विभाजन, पुनः सर्वेक्षण या अन्य आवश्यक कार्यों के दौरान किया जाता है।
प्रक्रिया:
- आवश्यकता का निर्धारण: जब किसी भू-भाग में कोई परिवर्तन होता है, जैसे सीमा का बदलाव या भूमि का विभाजन, तो उसे अभिलेखों और नक्शों में सही तरीके से दर्शाने की आवश्यकता होती है।
- सर्वेक्षण: भूमि के सर्वेक्षण के लिए एक टीम भेजी जाती है, जो भू-भाग का निरीक्षण करती है और नक्शे को अद्यतन करती है।
- अभिलेखों का अद्यतन: सर्वेक्षण के आधार पर, खतौनी, खसरा और अन्य अभिलेखों में आवश्यक परिवर्तन किए जाते हैं।
- प्राधिकृत अधिकारियों द्वारा अनुमोदन: अभिलेखों और नक्शों के पुनरीक्षण के बाद, इन्हें तहसीलदार या अन्य सक्षम अधिकारी द्वारा अनुमोदित किया जाता है।
- रजिस्टर में परिवर्तन: अनुमोदन के बाद, पुनरीक्षित नक्शे और अभिलेखों को राज्य के राजस्व रजिस्टर में जोड़ा जाता है।
30. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत अभिलेख अधिकारी तथा सहायक अभिलेख अधिकारी
अभिलेख अधिकारी (Record Officer):
अभिलेख अधिकारी वह व्यक्ति होता है जो भूमि अभिलेखों के रखरखाव और अद्यतन का जिम्मेदार होता है। वह सभी भूमि रिकॉर्ड्स, खसरा, खतौनी, नक्शे और अन्य राजस्व अभिलेखों की निगरानी करता है।
अभिलेख अधिकारी की शक्तियाँ और कार्य:
- अभिलेखों का संकलन और अद्यतन: अभिलेख अधिकारी राजस्व अभिलेखों को अपडेट करने और उनका रखरखाव सुनिश्चित करता है।
- संपत्ति के अधिकारों का सत्यापन: वह संपत्ति के अधिकारों, भूमि के स्वामित्व और अन्य संबंधित अभिलेखों की जांच करता है।
- रिपोर्टिंग: वह भूमि रिकॉर्ड से संबंधित रिपोर्ट तैयार करता है और उच्च अधिकारियों को प्रस्तुत करता है।
- दाखिल खारिज प्रक्रिया: वह नामान्तरण और अन्य संबंधित प्रक्रिया की निगरानी करता है।
- अभिलेखों की सुरक्षा: अभिलेख अधिकारी अभिलेखों की सुरक्षा और उनका सही तरीके से रखरखाव करता है।
सहायक अभिलेख अधिकारी (Assistant Record Officer):
सहायक अभिलेख अधिकारी अभिलेख अधिकारी की सहायता करता है। वह भूमि अभिलेखों के अद्यतन और अन्य कार्यों में मदद करता है।
31. भूमि से क्या तात्पर्य है? उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत भूमि के स्वामित्व या हक के बारे में
भूमि (Land):
भूमि से तात्पर्य किसी भी प्रकार के भू-भाग से है, चाहे वह कृषि भूमि हो, आवासीय भूमि हो या अन्य कोई भूमि हो। यह किसी व्यक्ति या संस्था की संपत्ति हो सकती है, और इसमें उगाई जाने वाली फसलें, खनिज, पानी आदि भी शामिल हो सकते हैं।
भूमि के स्वामित्व या हक (Ownership or Rights over Land):
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत भूमि का स्वामित्व उस व्यक्ति या संस्था का होता है, जिसका नाम भूमि के अभिलेखों में दर्ज होता है। भूमि का स्वामित्व किसी व्यक्ति को अधिकार देता है कि वह उस भूमि का उपयोग, विक्रय, लीज या हस्तांतरण कर सके। इसके अलावा, भूमि पर कुछ विशिष्ट अधिकार भी हो सकते हैं, जैसे जल उपयोग, खनिज निकालना, और अन्य संबंधित अधिकार।
32. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें:
(1) खान और खनिज (Mines and Minerals):
खनिज उन प्राकृतिक संसाधनों को कहते हैं जिन्हें भूमि से निकाला जाता है, जैसे कोयला, खनिज, और अन्य धातुएं। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत इनका स्वामित्व भूमि के मालिक को होता है, लेकिन खनिज संसाधनों के उपयोग के लिए सरकार से अनुमति ली जाती है।
(2) फलदार वृक्ष (Fruit-bearing Trees):
फलदार वृक्ष वे पेड़ होते हैं जो फल उत्पन्न करते हैं, जैसे आम, केला, और अन्य वृक्ष। इन वृक्षों के स्वामित्व अधिकार भूमि के स्वामी को होते हैं और इनकी खेती कृषि भूमि में की जाती है।
(3) वृक्षों पर अधिकार (Rights over Trees):
वृक्षों पर अधिकार उस व्यक्ति को होता है जो भूमि का मालिक है। भूमि स्वामी को अपने वृक्षों का उपयोग करने, उन्हें काटने या बेचने का अधिकार होता है। हालांकि, कुछ वृक्षों की सुरक्षा के लिए राज्य द्वारा विशेष कानून होते हैं।
33. उ० प्र० राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत ग्राम सभा से आप क्या समझते हैं? स्पष्टीकरण करें।
ग्राम सभा (Gram Sabha):
ग्राम सभा एक ऐसी संस्था होती है, जो ग्राम पंचायत के तहत ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले सभी वयस्क नागरिकों का समुच्चय होती है। यह ग्रामीण समुदाय के सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था होती है, जो स्थानीय शासन और प्रशासन से संबंधित मामलों में भाग लेती है। ग्राम सभा का उद्देश्य ग्रामीण समाज की जरूरतों को पहचानना और उन्हें समाधान प्रदान करना है।
फंक्शन और कार्य:
- ग्राम सभा पंचायत चुनावों में भागीदारी करती है।
- यह स्थानीय विकास योजनाओं की स्वीकृति देती है।
- ग्राम सभा स्थानीय प्रशासन की निगरानी करती है और समाजिक एवं विकासात्मक कार्यों को संचालित करती है।
- यह भूमि संबंधी मुद्दों, जैसे भूमि उपयोग, सरकारी योजनाओं का आवंटन, आदि में भी भूमिका निभाती है।
34. ग्राम पंचायत से आप क्या समझते हैं तथा इसके कार्य, कर्तव्य एवं शक्तियों का भी वर्णन करें।
ग्राम पंचायत (Gram Panchayat):
ग्राम पंचायत एक स्थानीय शासन की संस्था होती है, जिसे ग्राम सभा द्वारा चुने गए सदस्य संचालित करते हैं। यह ग्राम स्तर पर प्रशासनिक कामकाज संभालती है, और ग्रामवासियों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएं बनाती है। ग्राम पंचायत का कार्य स्थानीय स्तर पर सरकारी योजनाओं का कार्यान्वयन करना, सामाजिक कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विकास कार्यों का संचालन करना होता है।
कार्य और कर्तव्य:
- ग्राम पंचायत का प्रमुख कार्य स्थानीय विकास योजनाओं का कार्यान्वयन करना है।
- यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल आपूर्ति, सड़कों और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास में सक्रिय होती है।
- ग्राम पंचायत सार्वजनिक संपत्ति के प्रबंधन और उसकी देखरेख करती है।
- यह स्थानीय स्तर पर पंचायत चुनावों का आयोजन भी करती है।
शक्तियाँ:
- ग्राम पंचायत भूमि प्रबंधन, विकास कार्यों के लिए धन आवंटन कर सकती है।
- यह ग्रामवासियों से कर वसूलने का अधिकार रखती है।
- यह स्थानीय निर्णय लेने की स्वतंत्रता रखती है और प्रशासनिक कार्यों के लिए बजट का प्रबंधन करती है।
35. भूमि प्रबन्धक समिति का गठन किस प्रकार होता है? इसके कार्य और कर्तव्यों का वर्णन कीजिए।
भूमि प्रबंधन समिति (Land Management Committee):
भूमि प्रबंधन समिति एक स्थानीय निकाय या ग्राम पंचायत के तहत गठित की जाती है, जिसका उद्देश्य भूमि और अन्य संपत्तियों का उचित प्रबंधन और नियंत्रण करना होता है। यह समिति भूमि के स्वामित्व, उपयोग और वितरण से संबंधित निर्णय लेने में सहायता करती है।
गठन:
भूमि प्रबंधन समिति का गठन स्थानीय प्रशासन या ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता है, और इसमें विभिन्न सदस्य होते हैं, जो भूमि से संबंधित प्रशासनिक कार्यों को संभालते हैं। इनमें ग्राम पंचायत के सदस्य, ग्राम सभा के प्रतिनिधि, और अन्य विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं।
कार्य और कर्तव्य:
- भूमि के वितरण, उपयोग और रखरखाव से संबंधित निर्णय लेना।
- भूमि विवादों का समाधान करना।
- भूमि के पट्टे, अधिग्रहण और स्थानांतरण के मामलों को देखना।
- भूमि का उचित और निष्पक्ष उपयोग सुनिश्चित करना।
36. भूमि प्रबन्धक समिति की शक्तियों का वर्णन करें।
भूमि प्रबंधन समिति की शक्तियाँ:
- भूमि का नियमन: समिति को भूमि के उपयोग को नियंत्रित करने और उचित स्थानों पर भूमि आवंटित करने का अधिकार होता है।
- भूमि का वितरण: यह समिति भूमि का वितरण करती है, और यह सुनिश्चित करती है कि यह सही तरीके से हो।
- भूमि का अद्यतन: समिति को भूमि रिकॉर्ड को अद्यतन करने की शक्ति होती है।
- विवाद समाधान: भूमि विवादों का समाधान समिति द्वारा किया जाता है।
37. ग्राम निधि तथा समेकित ग्राम निधि से आप क्या समझते हैं?
ग्राम निधि (Gram Fund):
ग्राम निधि वह धनराशि है जो ग्राम पंचायत को विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होती है, जैसे पंचायत द्वारा वसूला गया कर, राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता, और अन्य वित्तीय सहायता। यह निधि ग्राम पंचायत द्वारा विकास कार्यों, सार्वजनिक सेवाओं और ग्राम के कल्याण के लिए उपयोग की जाती है।
समेकित ग्राम निधि (Consolidated Gram Fund):
समेकित ग्राम निधि ग्राम पंचायत द्वारा एकत्र की गई सभी वित्तीय संसाधनों का संग्रहण होती है, जिसे ग्राम के समग्र विकास के लिए एक ही खाते में रखा जाता है। इस निधि का उपयोग ग्राम स्तर पर विभिन्न विकासात्मक कार्यों के लिए किया जाता है।
38. निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें:
(1) स्थायी अधिवक्ता (Standing Counsel):
स्थायी अधिवक्ता वह वकील होता है जो सरकारी या किसी संस्था की ओर से स्थायी रूप से मुकदमे की पैरवी करता है। यह वकील नियमित रूप से सरकार या संस्था के लिए कानूनी सलाह देता है और अदालत में उनकी ओर से मामले प्रस्तुत करता है।
(2) ग्राम पंचायत सदस्यों की निर्योग्यता (Disqualification of the Membership of Gram Panchayat):
ग्राम पंचायत के सदस्य को यदि कोई अपराध होता है, जैसे भ्रष्टाचार, सार्वजनिक विश्वास का उल्लंघन, या यदि सदस्य कोई अन्य तय शर्तों को पूरा नहीं करता है, तो उसे निर्योग्य घोषित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि सदस्य ने पंचायत के कार्यों में भाग नहीं लिया या अनियमितता दिखायी तो उसे निर्योग्य किया जा सकता है।
39. पूर्व जोतदारी की किस्मों के बारे में संक्षेप में वर्णन कीजिए।
पूर्व जोतदार (Pretenure Holders):
पूर्व जोतदार वे व्यक्ति होते हैं, जिनके पास भूमि का स्वामित्व या अधिकार पूर्व में किसी विशेष व्यवस्था के तहत था, जैसे जमींदारी प्रथा या पट्टे पर भूमि देना। भारतीय भूमि प्रणाली में विभिन्न प्रकार के जोतदार होते हैं, जो भूमि के स्वामित्व के आधार पर वर्गीकृत किए जाते हैं। ये वर्गीकरण भूमि के स्वामित्व, उपयोग और उसे जोतने के अधिकार पर आधारित होते हैं। कुछ प्रमुख पूर्व जोतदार की किस्में इस प्रकार हैं:
- जमींदार (Zamindars):
जमींदारी प्रथा के अंतर्गत, जमींदार वे व्यक्ति होते थे, जिनके पास बड़े पैमाने पर भूमि का स्वामित्व होता था और जो भूमिहीन किसान से कर वसूलते थे। वे भूमि के मालिक होते थे, लेकिन भूमि की जोतने की जिम्मेदारी किसानों पर होती थी। - किरायेदार (Tenant):
ये वह लोग होते थे जिनके पास भूमि का अधिकार नहीं था, लेकिन वे कुछ निश्चित भुगतान या किराया देने की शर्त पर उस भूमि को जोतते थे। किरायेदारों के पास भूमि पर कड़ी नियंत्रण नहीं होता था। - पट्टेदार (Patta holders):
पट्टेदार वह व्यक्ति होते थे जिन्हें भूमि का स्वामित्व या उपयोग पट्टे पर दिया जाता था। वे भूमि के उपयोगकर्ता होते थे, लेकिन भूमि का कानूनी स्वामित्व भूमि के मालिक के पास होता था।
40. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत खातेदारों का वर्गीकरण कीजिए और संक्षेप में प्रत्येक के अधिकारों का वर्णन कीजिए।
खातेदारों का वर्गीकरण (Classification of Tenure Holders):
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार खातेदारों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है:
- स्वामित्वधारी (Owner):
स्वामित्वधारी वे व्यक्ति होते हैं जिनके पास भूमि का कानूनी स्वामित्व होता है। वे भूमि के मालिक होते हैं और उनके पास भूमि का पूरा अधिकार होता है, जैसे कि उसे बेचना, स्थानांतरित करना या अन्य किसी उद्देश्य के लिए उपयोग करना।अधिकार:- भूमि का स्वामित्व और नियंत्रण।
- भूमि का उपयोग और उसका व्यावसायिक संचालन।
- भूमि को बेचने, पट्टे पर देने या दान करने का अधिकार।
- किरायेदार (Tenant):
किरायेदार वे व्यक्ति होते हैं जिनके पास भूमि का स्वामित्व नहीं होता, लेकिन वे किराये पर भूमि का उपयोग करते हैं। वे उस भूमि पर खेती करते हैं और भूमि के मालिक को किराया भुगतान करते हैं।अधिकार:- भूमि का उपयोग करने का अधिकार, बशर्ते कि वे किराया सही ढंग से भुगतान करें।
- कुछ स्थितियों में स्थायी अधिकार प्राप्त करने का अधिकार, जैसे कि भूमि सुधार योजनाओं के तहत।
- पट्टेदार (Patta holder):
पट्टेदार वे व्यक्ति होते हैं जिन्हें भूमि का उपयोग पट्टे पर दिया जाता है। पट्टेदारों को भूमि का नियंत्रित उपयोग किया जाता है, लेकिन कानूनी स्वामित्व भूमि के मालिक के पास रहता है।अधिकार:- भूमि का उपयोग एक निश्चित अवधि के लिए।
- भूमि का सुधार और खेती की गतिविधियाँ करने का अधिकार।
- पट्टे के अनुसार अन्य लाभ प्राप्त करने का अधिकार।
- किरायेदार-कृषक (Tenant-at-will):
ये किसान हैं जो भूमि के मालिक से बिना किसी स्थायी समझौते के भूमि का उपयोग करते हैं। यह अस्थायी व्यवस्था होती है और इसका आधार भूमि मालिक की अनुमति होती है।अधिकार:- अस्थायी उपयोग का अधिकार।
- भूमि मालिक द्वारा किराये के भुगतान के लिए निर्धारित शर्तों का पालन करना।
- स्थायी पट्टेदार (Permanent Patta Holder):
यह वे लोग होते हैं जिन्हें भूमि का उपयोग स्थायी रूप से पट्टे पर दिया जाता है, और वे लंबे समय तक उस भूमि का उपयोग करने के अधिकार रखते हैं।अधिकार:- भूमि का स्थायी उपयोग।
- भूमि सुधार कार्यों में भागीदारी का अधिकार।
- कुछ मामलों में भूमि पर अधिकार प्राप्त करने का स्थायी अधिकार।
41. (क) उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत ऐसी “भूमि जिनमें भूमिधरी अधिकार प्राप्त नहीं होंगे” का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत कुछ विशिष्ट प्रकार की भूमि ऐसी हैं, जिनमें भूमिधरी अधिकार (Bhumidhari rights) प्राप्त नहीं होते। इन भूमियों पर भूमिधर अधिकार के रूप में भूमि का मालिकाना हक नहीं दिया जा सकता है। यह भूमियाँ सामान्यत: निम्नलिखित प्रकार की होती हैं:
- सरकारी भूमि:
यह भूमि सरकारी स्वामित्व में होती है, जैसे कि वन भूमि, जलाशय, राष्ट्रीय उद्यान या अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि। ऐसी भूमि पर भूमिधरी अधिकार नहीं मिलते। - धार्मिक या शैक्षिक संस्थाओं की भूमि:
यदि भूमि किसी धार्मिक या शैक्षिक उद्देश्य के लिए विशेष रूप से निर्धारित की गई है, तो उस पर भी भूमिधरी अधिकार नहीं दिए जाते। - मूल्यवान या विशिष्ट भूमि:
कुछ भूमि जो विशेष उद्देश्यों के लिए सुरक्षित होती हैं (जैसे जलस्रोतों के पास भूमि), उन पर भूमिधरी अधिकार लागू नहीं होते। - सीमित उपयोग वाली भूमि:
ऐसी भूमि जो किसी विशेष उद्देश्य के लिए आवंटित की जाती है, जैसे कि सड़कों, नहरों या रेलवे लाइनों के लिए, उन पर भी भूमिधरी अधिकार नहीं होते।
41. (ख) “एक भूमिधर के अधिकार हस्तान्तरणीय हैं” क्या भूमिधर के हस्तान्तरण के अधिकारों पर कोई प्रतिबन्ध है? यदि हाँ तो उनकी विवेचना कीजिए।
भूमिधर के अधिकार हस्तान्तरणीय हैं, लेकिन इन अधिकारों पर कुछ प्रतिबंध भी हैं। भूमिधर के पास अपनी भूमि को दूसरे व्यक्ति को बेचने, दान देने, या किसी अन्य तरीके से हस्तांतरित करने का अधिकार होता है। हालांकि, यह अधिकार कुछ शर्तों और सीमाओं के तहत होते हैं, जो कानून द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
प्रतिबन्ध:
- भूमि पर बकाया कर:
यदि भूमि पर कोई कर या बकाया होता है, तो वह भूमि केवल तभी हस्तांतरित की जा सकती है जब करों का भुगतान पूर्ण रूप से किया जाए। - विशिष्ट शर्तें:
यदि भूमि किसी विशेष उद्देश्य के लिए दी गई हो (जैसे कृषि भूमि, विशेष अधिकार वाली भूमि), तो उसे बिना अनुमति के किसी अन्य उद्देश्य के लिए हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। - स्थानिक प्रतिबंध:
यदि भूमि पर किसी स्थानिक या क्षेत्रीय कानूनी प्रतिबंध लगाए गए हों (जैसे रिहायशी या वाणिज्यिक क्षेत्रों में भूमि का हस्तांतरण), तो वह भूमि उन प्रतिबंधों के तहत नहीं हस्तांतरित की जा सकती। - कानूनी आवश्यकताएँ:
हस्तांतरण से पहले कानूनी रूप से जरूरी दस्तावेज़ और प्रक्रिया पूरी करनी होती है, जैसे कि रजिस्ट्रेशन, स्टांप शुल्क और अन्य आवश्यक कागजात।
42. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:
(1) भूमिधर द्वारा निजी जोत का पट्टा
भूमिधर द्वारा निजी जोत का पट्टा उस भूमि पर पट्टे के अधिकार की स्थिति को संदर्भित करता है, जहाँ भूमिधर अपनी निजी भूमि को अन्य व्यक्ति को पट्टे पर देता है। यह पट्टा एक निर्धारित अवधि के लिए होता है, और भूमि का उपयोग करने के लिए पट्टेदार को निश्चित किराया चुकाना होता है। भूमिधर को भूमि के स्वामित्व का अधिकार रहता है, जबकि पट्टेदार को भूमि का उपयोग करने का अधिकार मिलता है।
(2) पट्टा किस प्रकार किया जाएगा, उसका पर्यवसान तथा तत्सम्बन्ध के उठने वाला कोई विवाद
पट्टा भूमि का उपयोग करने के अधिकार को कानूनी रूप से मान्यता प्रदान करता है। पट्टा भूमि मालिक और पट्टेदार के बीच एक समझौता होता है, जिसमें शर्तें और किराया तय होते हैं। पट्टे की समाप्ति या विवाद की स्थिति में कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाता है, और न्यायालय या संबंधित राजस्व अधिकारियों के पास विवादों का समाधान करने का अधिकार होता है।
43. विनिमय से क्या समझते हैं? विनिमय के परिणाम से सम्बन्धित प्रावधानों का उल्लेख करें।
विनिमय (Exchange):
विनिमय दो पक्षों के बीच भूमि या अन्य संपत्तियों का आपस में आदान-प्रदान करने की प्रक्रिया को कहा जाता है। इसमें दोनों पक्षों के पास अपनी-अपनी संपत्ति का स्वामित्व रहता है, और वे आपस में सहमति से संपत्तियों का आदान-प्रदान करते हैं।
विनिमय के परिणाम:
विनिमय के परिणामस्वरूप, दोनों पक्षों को एक-दूसरे से संपत्ति का स्वामित्व मिल जाता है। यदि किसी विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है, तो इसका समाधान भी कानूनी प्रक्रिया के तहत होता है।
44. संक्राम्य अधिकार वाले भूमिधर के वसीयत करने के अधिकार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
संक्राम्य अधिकार वाले भूमिधर के वसीयत करने के अधिकार:
यदि भूमि पर भूमिधर के पास संक्राम्य (transferable) अधिकार हैं, तो वह भूमि की वसीयत करने का अधिकार रखता है। यह अधिकार भूमिधर को अपनी मृत्यु के बाद अपने परिवार के सदस्य या किसी अन्य व्यक्ति को भूमि का स्वामित्व देने का अवसर प्रदान करता है। वसीयत के लिए भूमिधर को संबंधित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होता है, और वसीयत का निष्पादन केवल तब संभव होता है जब वह कानूनी रूप से सही तरीके से बनाई गई हो।
45. भूमिधर द्वारा जोत के समर्पण एवं परित्याग से आप क्या समझते हैं? विभिन्न जोतदार किस प्रकार अपनी जोर्तों का समर्पण कर सकते हैं?
समर्पण (Surrender) और परित्याग (Abandonment) भूमि के अधिकारों को छोड़ने की प्रक्रिया है, जिसमें भूमि मालिक या जोतदार अपनी जोत या भूमि को पूरी तरह से छोड़ देता है। भूमिधर या जोतदार अपनी भूमि को समर्पित कर सकता है यदि वह अपनी भूमि से बाहर निकलने का निर्णय लेता है, और वह भूमि को फिर से राज्य या अन्य व्यक्ति को सौंप सकता है। भूमि का परित्याग तब होता है जब जोतदार अपनी भूमि का उपयोग बंद कर देता है और उसे पूरी तरह से छोड़ देता है।
46. समर्पण एवं परित्याग के बीच अन्तर स्पष्ट करें।
समर्पण (Surrender):
समर्पण में भूमि का स्वामित्व या उपयोग अधिकार वापस राज्य या अन्य उपयुक्त पक्ष को दिया जाता है, और इसे एक कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाता है।
परित्याग (Abandonment):
परित्याग तब होता है जब जोतदार भूमि का उपयोग बंद कर देता है और वह भूमि बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के छोड़ दी जाती है।
47. असामी कौन है? जोत में असामी के अधिकारों का वर्णन करें। उल्लंघन का क्या परिणाम होता है?
असामी (Tenant):
असामी वह व्यक्ति है जो किसी अन्य व्यक्ति से भूमि किराए पर लेकर उसे जोतता है। असामी के पास भूमि का स्वामित्व नहीं होता, लेकिन वह भूमि का उपयोग करने का अधिकार रखता है।
अधिकार:
असामी के पास भूमि का उपयोग करने का अधिकार होता है, बशर्ते कि वह निर्धारित किराया सही समय पर चुका सके।
उल्लंघन:
अगर असामी अपने किराए का भुगतान नहीं करता या भूमि के उपयोग की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो भूमि मालिक को कानूनी उपायों का सहारा लेने का अधिकार होता है, जैसे कि असामी को भूमि से निष्कासित करना या अन्य शर्तों को लागू करना।
48. निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें:
(1) जोत के विभाजन के लिए बाद
Suit for division of holding:
जब एक जोत (खाता) में कई हिस्सेदार होते हैं और वे अपनी भूमि का विभाजन चाहते हैं, तो एक ‘Suit for division of holding’ दाखिल किया जा सकता है। यह प्रक्रिया एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें जोत के मालिकों के बीच भूमि के हिस्सों का विभाजन किया जाता है। विभाजन का उद्देश्य प्रत्येक हिस्सेदार को उसकी हिस्सेदारी के अनुसार भूमि प्रदान करना है। यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनती, तो यह मामला राजस्व कोर्ट में जाता है, और वहां भूमि का विभाजन कानूनी रूप से तय किया जाता है।
(2) भूमिधर द्वारा परित्याग
Abandonment by Bhumidhar:
भूमिधर द्वारा भूमि का परित्याग (abandonment) तब होता है जब भूमिधर अपनी भूमि को छोड़ देता है और उसका उपयोग बंद कर देता है। यह आमतौर पर तब होता है जब भूमिधर भूमि से कोई लाभ नहीं प्राप्त करता या भूमि का उपयोग नहीं करना चाहता। परित्याग का परिणाम यह होता है कि भूमि फिर से राज्य के स्वामित्व में आ जाती है और भूमि पर भूमिधरी अधिकार समाप्त हो जाते हैं। यह प्रक्रिया अक्सर राजस्व अधिकारियों द्वारा अनुमोदित की जाती है।
49. उत्तराधिकार
(i) उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत एक पुरुष जोतदार के मामलों में उत्तराधिकार का क्रम बतलाइये।
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत एक पुरुष जोतदार की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का क्रम इस प्रकार होता है:
- पति का उत्तराधिकारी:
सबसे पहले पुरुष जोतदार के पति (यदि वह विवाहित है) को उत्तराधिकार प्राप्त होता है। - पुत्र/पुत्री का उत्तराधिकारी:
इसके बाद, पुरुष जोतदार के पुत्र या पुत्री को उत्तराधिकार मिलता है। पुत्रों को बराबरी का अधिकार मिलता है, और यदि कोई अविवाहित पुत्री है, तो उसे भी समान अधिकार प्राप्त होते हैं। - साक्षात्कारों के अन्य सदस्य:
यदि कोई भी पुत्र/पुत्री नहीं होता है, तो अन्य निकटतम रिश्तेदार, जैसे कि भाई, पिता आदि उत्तराधिकारी होते हैं।
(ii) उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत एक स्त्री भूमिधर के मामलों में उत्तराधिकार का क्रम बतलाइये।
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार स्त्री भूमिधर के मामलों में उत्तराधिकार का क्रम इस प्रकार होता है:
- पति का उत्तराधिकारी:
सबसे पहले महिला भूमिधर के पति को उत्तराधिकार प्राप्त होता है। - पुत्र/पुत्री का उत्तराधिकारी:
यदि महिला के पति का निधन हो चुका है या वह नहीं है, तो उसके पुत्र/पुत्री को उत्तराधिकार मिलता है। - माता-पिता और अन्य रिश्तेदार:
यदि महिला के कोई संतान नहीं है, तो उसके माता-पिता को उत्तराधिकार प्राप्त होता है। यदि माता-पिता भी जीवित नहीं हैं, तो अन्य निकटतम रिश्तेदार (जैसे भाई, बहन) को उत्तराधिकार मिलता है।
50. निम्नलिखित मामलों में उत्तराधिकार का क्रम बताइये:
(1) जब पुरुष भूमिधर अपने पीछे निम्नलिखित को छोड़कर मर जाता है-
- (क) विवाहित लड़की
- (ख) विवाहित बहिन
- (ग) पिता
उत्तराधिकार का क्रम:
- पिता को सबसे पहले उत्तराधिकार मिलेगा।
- यदि पिता नहीं हैं, तो विवाहित लड़की को उत्तराधिकार मिलेगा।
- विवाहित बहिन को उत्तराधिकार प्राप्त नहीं होता है, क्योंकि वह विवाहिता है और उसके पति के पास भूमि का स्वामित्व हो सकता है।
(2) जब एक महिला असामी अपने पीछे निम्नलिखित को छोड़कर मर जाती है-
- (क) पति
- (ख) पुत्र
- (ग) अविवाहित पुत्री
उत्तराधिकार का क्रम:
- पुत्र को पहले उत्तराधिकार मिलेगा।
- अविवाहित पुत्री को उत्तराधिकार मिलेगा।
- पति का कोई अधिकार नहीं होगा, क्योंकि महिला असामी थी और उसके पास संपत्ति का स्वामित्व नहीं था।
51. उत्तरजीविता का नियम की विवेचना कीजिए।
Law of Survivorship:
उत्तरजीविता का नियम (Law of Survivorship) उस स्थिति को संदर्भित करता है जिसमें दो या दो से अधिक लोग एक साथ संपत्ति के साझेदार होते हैं और यदि एक साझेदार की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी संपत्ति का हिस्सा स्वचालित रूप से जीवित साझेदार के पास चला जाता है। यह नियम साझेदारी में स्थितियों में लागू होता है, खासकर भूमि और संपत्ति के मालिकों के बीच, और यह सुनिश्चित करता है कि एक साझेदार की मृत्यु के बाद उसकी हिस्सेदारी का स्वामित्व बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के जीवित साझेदार को मिलता है।
52. राजगामी सम्पत्ति का नियम बतलाइये।
Law of Escheat:
राजगामी सम्पत्ति का नियम (Law of Escheat) तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं छोड़ता है (यानी वह बिना उत्तराधिकारी के मर जाता है)। इस स्थिति में, संपत्ति राज्य के स्वामित्व में चली जाती है। राज्य को इस संपत्ति को अपनाने का अधिकार होता है और इसे सार्वजनिक उपयोग के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। यह कानून यह सुनिश्चित करता है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं छोड़ता, तो वह संपत्ति राज्य के पास चली जाती है, और किसी अन्य के पास नहीं।
53. किसी व्यक्ति को किसी खाली भूमि में अथवा गाँवसभा में निहित भूमि में असंक्राम्य अधिकार वाले भूमिधरा असामी के रूप में भूमि प्रबन्धक समिति के द्वारा प्रविष्ट करने में अधिमान्यता के क्रम का वर्णन कीजिए।
Priority of Entry by Land Management Committee:
अगर कोई व्यक्ति खाली भूमि या गाँवसभा की भूमि पर असंक्राम्य अधिकार (Non-transferable rights) के तहत भूमि प्राप्त करता है, तो भूमि प्रबंध समिति द्वारा उसकी प्रविष्टि के क्रम में कुछ विशेष प्रक्रियाएँ होती हैं। भूमि प्रबंध समिति सबसे पहले भूमि के उपयोग की वास्तविक स्थिति और पात्रता की जांच करती है। यदि भूमि किसी विशेष उद्देश्य के लिए आवंटित की जाती है, तो प्रबंध समिति उस व्यक्ति को भूमि में असंक्राम्य अधिकार के साथ प्रविष्ट करती है, बशर्ते कि उसने सभी आवश्यक दस्तावेजों और शर्तों का पालन किया हो। इस प्रक्रिया में भूमि के अधिकार को भूमि उपयोगकर्ता के नाम पर स्थायी रूप से दर्ज किया जाता है।
54. आबंटन की प्रक्रिया एवं परिणाम का संक्षेप में वर्णन करें।
Procedure and Consequences of Allotment:
आबंटन की प्रक्रिया उस भूमि के आवंटन से संबंधित है जो राज्य या स्थानीय निकाय के द्वारा किसी व्यक्ति या संस्था को आवंटित की जाती है। यह प्रक्रिया आमतौर पर भूमि की उपलब्धता, उद्देश्य और पात्रता के आधार पर की जाती है।
- प्रक्रिया:
- पहले भूमि की उपयुक्तता और जरूरत का आकलन किया जाता है।
- आवेदन प्राप्त करने के बाद, पात्र व्यक्तियों का चयन किया जाता है।
- चयन के आधार पर, निर्धारित शर्तों के तहत भूमि का आबंटन किया जाता है।
- परिणाम:
- आबंटित भूमि पर व्यक्ति का कानूनी कब्जा स्थापित हो जाता है।
- भूमि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए किया जाता है और अन्य नियमों के तहत उपयोगकर्ता को जिम्मेदारी दी जाती है।
55. आबादी स्थल के प्रयोजन के लिए कौन सी भूमि, किन व्यक्तियों को, किसके द्वारा और किस वरीयता क्रम में आबंटित की जा सकती है?
Allotment of Land for Abadi Site:
आबादी स्थल के लिए भूमि का आबंटन निम्नलिखित प्रक्रिया में किया जा सकता है:
- भूमि का चयन:
- खाली और गैर-उपयोगी भूमि, जैसे ग्राम पंचायत की भूमि या राज्य की भूमि, जो आबादी के लिए उपयुक्त हो।
- किसे आबंटन होगा:
- भूमि उन व्यक्तियों को दी जाती है जो शहरी या ग्रामीण क्षेत्र में आवास की आवश्यकता रखते हैं, जैसे गरीब, मजदूर, किसान, या अन्य पात्र व्यक्ति।
- किसके द्वारा आबंटन:
- भूमि का आबंटन राज्य सरकार, स्थानीय निकाय (जैसे ग्राम पंचायत या नगर निगम) द्वारा किया जाता है।
- वरीयता क्रम:
- पहले उन व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है, जो सबसे अधिक आवश्यकता में होते हैं (जैसे गरीब, बेसहारा परिवार), फिर अन्य व्यक्तियों को यदि भूमि उपलब्ध हो।
56. निम्न का वर्णन करें:
(1) आबंटिती या सरकारी पट्टेदार को कब्जा देने की बहाली
Restoration of Possession to allottee or Government leasee:
अगर किसी व्यक्ति को सरकारी भूमि पर कब्जा देने के बाद, किसी कारणवश उसे कब्जा खो देना पड़ता है (जैसे किसी विवाद के कारण), तो उसे फिर से कब्जा बहाल करने की प्रक्रिया “कब्जा देने की बहाली” कहलाती है। यह प्रक्रिया कानूनी आदेश द्वारा की जाती है, जिसमें सरकारी अधिकारी भूमि का अवलोकन करते हैं और इसे संबंधित व्यक्ति को वापस सौंपते हैं।
(2) ग्राम तालाबों, पोखरों का प्रबंधन एवं पट्टा
Lease and Management of Village Ponds/Tanks:
ग्राम तालाबों और पोखरों का प्रबंधन ग्राम पंचायत या अन्य स्थानीय प्राधिकरण द्वारा किया जाता है। इनकी देखरेख और प्रबंधन का उद्देश्य जल संरक्षण और स्थानीय समुदाय की आवश्यकता को पूरा करना है। यदि आवश्यकता हो, तो इन्हें पट्टे पर दिया जा सकता है, ताकि उन्हें सुचारू रूप से चलाया जा सके। इस प्रक्रिया में शर्तों के तहत पट्टा दिया जाता है, जिसमें जल संसाधनों का उचित उपयोग सुनिश्चित किया जाता है।
57. आसामी की बेदखली के आधार और प्रक्रिया की विवेचना कीजिए।
Grounds and Procedure for Ejectment of an Asami:
आसामी की बेदखली के लिए निम्नलिखित आधार हो सकते हैं:
- आसामी द्वारा शर्तों का उल्लंघन:
- यदि आसामी ने पट्टे की शर्तों का उल्लंघन किया हो, जैसे कि भूमि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए न करना।
- भूमि का बिना अनुमति के हस्तांतरण:
- यदि आसामी ने भूमि का बिना अनुमति के हस्तांतरण किया हो, तो उसे बेदखल किया जा सकता है।
प्रक्रिया:
- सबसे पहले, राजस्व अधिकारी से नोटिस जारी किया जाता है।
- यदि आसामी पर आरोप सही पाए जाते हैं, तो उसे भूमि से बेदखल करने के लिए कानूनी आदेश दिया जाता है।
- बेदखली के बाद, भूमि राज्य के स्वामित्व में लौट आती है।
58. बिना हक के भूमि पर कब्जा करने वाले व्यक्तियों को निष्कासित करने को उस प्रक्रिया का संक्षेप में उल्लेख कीजिए जो उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 द्वारा विहित है।
Procedure for Ejectment of Persons in Possession of Land Without Title:
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार बिना हक के भूमि पर कब्जा करने वाले व्यक्तियों को निष्कासित करने की प्रक्रिया निम्नलिखित होती है:
- नोटिस जारी करना:
- सबसे पहले, संबंधित व्यक्ति को भूमि पर कब्जा करने के कारण एक कानूनी नोटिस भेजा जाता है।
- साक्ष्य की जांच:
- संबंधित अधिकारी यह जांच करते हैं कि क्या व्यक्ति का कब्जा अवैध है या नहीं।
- बेदखली आदेश:
- यदि कब्जा अवैध पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारी बेदखली का आदेश जारी करते हैं।
- निष्कासन:
- आदेश के बाद, संबंधित व्यक्ति को भूमि से निष्कासित किया जाता है।
ग्राम पंचायत भूमि पर कब्जा:
यदि कोई व्यक्ति ग्राम पंचायत की भूमि पर अवैध कब्जा करता है, तो ग्राम पंचायत उसके खिलाफ बेदखली का दावा कर सकती है। इस प्रक्रिया में भी नोटिस, साक्ष्य की जांच और बेदखली आदेश शामिल होते हैं।
59. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:
(1) भूमिधरों का बेदखल न किया जाना
Non-Ejectment of Bhumidars:
भूमिधर भूमि के स्वामी होते हैं और उन्हें कानून के तहत भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता है, जब तक कि वह भूमि के उपयोग की शर्तों का उल्लंघन न करें। भूमिधर की भूमि का अधिकार स्थायी होता है और उसका उपयोग उनके द्वारा कानूनी रूप से किया जाता है।
(2) असंक्राम्य अधिकार वाले भूमिधर की बेदखली
Ejectment of Bhumidhar with Non-transferable Rights:
असंक्राम्य अधिकार वाले भूमिधर को अपनी भूमि से बेदखल किया जा सकता है यदि वह भूमि का उपयोग निर्धारित शर्तों के अनुरूप नहीं करता। ऐसे भूमिधर का अधिकार केवल स्वयं के उपयोग तक सीमित होता है और वह भूमि का हस्तांतरण नहीं कर सकते। यदि वह इन शर्तों का उल्लंघन करते हैं, तो उन्हें बेदखल किया जा सकता है।
(3) गलत बेदखली के विरुद्ध उपचार
Remedies Against Wrongful Ejectment:
अगर किसी व्यक्ति को गलत तरीके से बेदखल किया जाता है, तो वह अपनी बेदखली के खिलाफ न्यायालय में अपील कर सकता है। व्यक्ति को अपने अधिकारों की रक्षा करने का अधिकार होता है और यदि बेदखली गलत पाई जाती है, तो उसे पुनः कब्जा सौंपा जा सकता है।
60. लगान और मालगुजारी में अन्तर बताइये।
Distinction between Rent and Land Revenue:
- लगान (Rent):
- लगान वह राशि है जो एक भूमि धारक (जैसे किसान) भूमि के मालिक (भूमिधर या सरकार) को कृषि भूमि के उपयोग के बदले अदा करता है।
- यह प्रायः भूमि के उपयोग की अनुमति के रूप में होता है, और यह भूमि के स्वामित्व से अलग होता है।
- यह कृषि उत्पादकता, भूमि की गुणवत्ता और क्षेत्रीय परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाता है।
- मालगुजारी (Land Revenue):
- मालगुजारी वह राशि है जो सरकार द्वारा भूमि पर कब्जा करने वाले व्यक्ति से वसूली जाती है।
- यह भूमि के स्वामित्व के आधार पर होती है और भूमि के स्वामी से सरकार को अदा की जाती है।
- मालगुजारी सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है और आमतौर पर राजस्व प्रशासन से संबंधित होती है।
61. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:
(1) लगान में छूट
Remission from Fixation of Rent:
- लगान में छूट तब दी जाती है जब किसी कारण से भूमि पर होने वाली कृषि उत्पादन में कमी होती है, जैसे सूखा, बाढ़ या अन्य प्राकृतिक आपदाएँ।
- इस स्थिति में सरकार या भूमि मालिक किसानों को उनकी लगान में छूट दे सकते हैं ताकि वे अपनी वित्तीय स्थिति को सुधार सकें।
- यह छूट सीमित समय के लिए होती है और विशेष परिस्थितियों में लागू की जाती है।
(2) लगान निर्धारण के लिए वाद
Suit for Fixation of Rent:
- अगर भूमि मालिक और काश्तकार के बीच लगान के निर्धारण को लेकर विवाद होता है, तो काश्तकार या भूमि मालिक राजस्व विभाग में शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
- यह वाद कोर्ट या सक्षम प्राधिकरण के सामने रखा जाता है, जहां भूमि की उपयोगिता, फसल की उत्पादकता और अन्य कारकों का मूल्यांकन करके लगान का निर्धारण किया जाता है।
62. लगान का निर्धारण किस प्रकार से किया जाता है? लगान वसूली की प्रक्रिया का वर्णन करें।
Determination of Rent and Procedure for Recovery:
- लगान का निर्धारण:
- लगान का निर्धारण भूमि की गुणवत्ता, फसल की उत्पादकता, क्षेत्रीय जलवायु, और कृषि के प्रकार के आधार पर किया जाता है।
- सरकार या भूमि मालिक, जो भी संबंधित हो, भूमि के उपयोगकर्ता (कृषक) से कनेक्टेड कारकों को ध्यान में रखते हुए एक उचित मूल्य तय करते हैं।
- वसूली की प्रक्रिया:
- एक बार लगान तय होने के बाद, यह किसानों या काश्तकारों से वसूला जाता है।
- वसूली का निर्धारण एक विशेष तारीख या समय सीमा के भीतर किया जाता है।
- अगर लगान का भुगतान समय पर नहीं किया जाता है, तो सरकार द्वारा दंडात्मक कार्रवाइयाँ की जा सकती हैं, जिसमें भूमि की बेदखली या अन्य कानूनी उपाय शामिल हो सकते हैं।
63. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत घोषणात्मक वादों से सम्बन्धित विधि को विवेचना कीजिए।
Law Relating to Declaratory Suits Under the U.P. Revenue Code, 2006:
- घोषणात्मक वाद वह वाद होता है जिसमें न्यायालय से किसी विशेष अधिकार, दायित्व या स्थिति के बारे में निर्णय लेने की मांग की जाती है।
- यदि किसी व्यक्ति का भूमि अधिकार विवादित होता है या किसी भूमि संबंधी दावे को लेकर असमंजस हो, तो वह घोषणात्मक वाद दायर कर सकता है।
- इस प्रकार के वाद में किसी व्यक्ति के भूमि अधिकारों, भूमि के स्वामित्व, या अन्य भूमि संबंधित विवादों को स्पष्ट किया जाता है। न्यायालय इस प्रकार के मामलों में दावों के आधार पर निर्णय देता है।
64. सरकारी पट्टेदार को परिभाषित कीजिए। सरकारी पट्टेदार की बेदखली एवं सरकारी पट्टेदार की भूमि से अतिचारी की बेदखली का वर्णन करें।
Define Government Lessee and Describe the Ejectment of Government Lessee and Trespasser from Government Land:
- सरकारी पट्टेदार (Government Lessee):
- सरकारी पट्टेदार वह व्यक्ति होता है जिसे सरकार भूमि के उपयोग के लिए पट्टे पर देती है। यह पट्टा आमतौर पर एक निश्चित अवधि के लिए होता है और सरकार को भूमि पर अधिकार होता है। पट्टेदार को भूमि पर कुछ विशेष अधिकार मिलते हैं लेकिन भूमि का स्वामित्व सरकार के पास रहता है।
- सरकारी पट्टेदार की बेदखली:
- सरकारी पट्टेदार को तब बेदखल किया जा सकता है जब वह पट्टे की शर्तों का उल्लंघन करता है, जैसे भूमि का गलत उपयोग, पट्टे की अवधि समाप्त होने के बाद भी भूमि का कब्जा रखना, या अन्य कानूनी वजहों से।
- अतिचारी की बेदखली:
- अगर कोई व्यक्ति सरकारी पट्टेदार की भूमि पर अवैध रूप से कब्जा करता है (अतिक्रमण करता है), तो सरकार उसके खिलाफ बेदखली की कार्रवाई कर सकती है।
- अतिक्रमण करने वाले व्यक्ति को नोटिस दिया जाता है और फिर उसे भूमि से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। इस प्रक्रिया में संबंधित अधिकारियों द्वारा साक्ष्य की जांच की जाती है और कानूनी कार्रवाई की जाती है।
65. मालगुजारी अदा करने के लिए कौन-से व्यक्ति उत्तरदायी होते हैं? मालगुजारी का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है?
Who are the Persons Responsible for the Payment of Land Revenue? How will Land Revenue be Assessed?
- मालगुजारी अदा करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति:
- भूमि के मालिक (भूमिधर) या वह व्यक्ति जो भूमि का उपयोग कर रहा हो (यदि वह पट्टेदार है) मालगुजारी अदा करने के लिए उत्तरदायी होता है।
- मालगुजारी का निर्धारण:
- मालगुजारी का निर्धारण भूमि के प्रकार, स्थिति, उत्पादकता और अन्य कारकों के आधार पर किया जाता है।
- यह आमतौर पर राज्य या स्थानीय प्राधिकरण द्वारा निर्धारित किया जाता है और भूमि के स्वामी से समय-समय पर लिया जाता है।
66. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें:
(1) मालगुजारी की वसूली
Recovery of Land Revenue:
- मालगुजारी की वसूली एक विधिक प्रक्रिया है जिसमें सरकार भूमि के स्वामी से राजस्व वसूल करती है।
- अगर कोई व्यक्ति समय पर मालगुजारी का भुगतान नहीं करता है, तो सरकार कानूनी कार्रवाई कर सकती है, जिसमें भूमि पर कब्जा की समाप्ति या अन्य दंडात्मक उपाय हो सकते हैं।
(2) भू-राजस्व में परिवर्तन
Changes in Land Revenue:
- भू-राजस्व में परिवर्तन तब होता है जब भूमि का उपयोग, मूल्य या उत्पादकता में बदलाव होता है।
- यदि भूमि में कोई संरचनात्मक परिवर्तन, जैसे कि नई खेती का तरीका या भू-उपयोग में बदलाव होता है, तो भू-राजस्व में संशोधन किया जा सकता है।
(3) मालगुजारी का बकाया
Outstanding Land Revenue:
- जब मालगुजारी का भुगतान समय पर नहीं किया जाता, तो वह बकाया हो जाता है।
- बकाया मालगुजारी पर सरकार द्वारा दंडात्मक शुल्क और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
(4) मालगुजारी एवं लगान में अन्तर
Difference Between Land Revenue and Rent:
- मालगुजारी सरकार द्वारा भूमि के स्वामित्व पर लगाए जाने वाला शुल्क है, जबकि लगान भूमि के उपयोग के लिए काश्तकार द्वारा भूमि मालिक को दिया जाता है।
- मालगुजारी भूमि के स्वामित्व पर आधारित होता है, जबकि लगान भूमि के उपयोग के आधार पर तय होता है।
67. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत भू-राजस्व के बकाये की वसूली हेतु प्रक्रिया का वर्णन करें।
Process for Recovery of Arrears of Land Revenue under the U.P. Revenue Code, 2006:
- नोटिस भेजना (Issuing Notice):
- जब किसी व्यक्ति पर भू-राजस्व का बकाया होता है, तो राजस्व अधिकारी उसे नोटिस जारी करता है जिसमें बकाया राशि का विवरण और भुगतान की तिथि दी जाती है।
- अदायगी की समयसीमा (Time Limit for Payment):
- नोटिस के बाद, व्यक्ति को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए एक निश्चित समय सीमा दी जाती है। यदि यह भुगतान समय पर नहीं होता है, तो वसूली की अन्य प्रक्रिया शुरू होती है।
- बकाया की वसूली (Recovery of Arrears):
- अगर बकाया राशि समय पर जमा नहीं की जाती, तो सरकार कानूनी उपायों का उपयोग करती है, जैसे संपत्ति की कुर्की (attachment) और फिर विक्रय (sale) करना।
- विक्रय (Sale):
- सरकार वसूली की प्रक्रिया के दौरान संपत्ति को जब्त कर सकती है और फिर उसे सार्वजनिक नीलामी में बेच सकती है।
- दंड और ब्याज (Penalties and Interest):
- बकाया राशि पर ब्याज और दंडात्मक शुल्क भी जोड़े जा सकते हैं, जो समय के साथ बढ़ सकते हैं।
68. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें:
(1) खातों पर प्रथम प्रभार भू-राजस्व
Land Revenue to be the First Charge on Khatas:
- खातेदारों (landholders) पर भू-राजस्व का पहला प्रभार होता है, यानी यदि किसी भूमि के खिलाफ बकाया है, तो वह सबसे पहले भू-राजस्व वसूली के लिए निर्धारित होता है।
- इस प्रावधान के अंतर्गत, सरकार का अधिकार है कि वह पहले भूमि से भू-राजस्व की वसूली करे, अन्य किसी भी कर्ज या दावे के मुकाबले।
(2) मांगपत्र
Writ of Demand:
- मांगपत्र एक कानूनी दस्तावेज होता है जो किसी व्यक्ति से राजस्व, ऋण या अन्य भुगतान की मांग करने के लिए जारी किया जाता है।
- यह दस्तावेज विशेष रूप से तब जारी होता है जब बकाया भुगतान के लिए अन्य तरीके विफल हो जाते हैं।
(3) गिरफ्तारी और निरोध
Arrest and Detention:
- यदि भू-राजस्व का बकाया भुगतान नहीं किया जाता, तो संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता है।
- इसके बाद, उसे न्यायालय में पेश किया जा सकता है या कुछ मामलों में निलंबित किया जा सकता है, जब तक वह बकाया राशि का भुगतान नहीं करता।
(4) रिसीवर की नियुक्ति
Appointment of Receiver:
- अगर किसी व्यक्ति द्वारा भूमि का प्रबंध ठीक से नहीं किया जा रहा है और सरकार को भू-राजस्व का भुगतान नहीं मिल रहा है, तो एक रिसीवर (receiver) नियुक्त किया जा सकता है।
- रिसीवर उस भूमि का प्रबंधन करता है और उसकी उपज या आय से बकाया वसूल करता है।
69. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें:
(1) स्थावर सम्पत्ति की कुर्की के विरुद्ध आपत्ति
Objection Against Attachment of Immovable Properties:
- यदि किसी व्यक्ति की स्थावर सम्पत्ति (immovable property) कुर्क की जा रही है, तो वह इसके खिलाफ आपत्ति दर्ज कर सकता है।
- आपत्ति न्यायालय में पेश की जाती है और यदि यह सही पाई जाती है, तो कुर्की की कार्रवाई रद्द की जा सकती है।
(2) विक्रय का प्रमाण-पत्र
Certificate of Sale:
- जब सरकारी नीलामी में संपत्ति बेची जाती है, तो खरीदार को विक्रय का प्रमाण-पत्र (certificate of sale) प्रदान किया जाता है।
- यह प्रमाण-पत्र खरीदार के अधिकारों को वैधता प्रदान करता है और यह दर्शाता है कि वह संपत्ति का कानूनी स्वामी है।
70. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत अचल सम्पत्तियों की कुर्की व विक्रय से सम्बन्धित प्रावधानों का वर्णन करें।
Provision Relating to Attachment and Sale of Immovable Properties under the U.P. Revenue Code, 2006:
- अचल सम्पत्तियों की कुर्की (Attachment of Immovable Property):
- जब किसी व्यक्ति द्वारा भू-राजस्व का बकाया नहीं चुकाया जाता, तो सरकार उस व्यक्ति की अचल सम्पत्तियों (जैसे भूमि, भवन आदि) को कुर्क कर सकती है।
- यह प्रक्रिया राजस्व अधिकारियों द्वारा की जाती है और इसमें सम्पत्ति का मूल्यांकन करके उसे वसूली के लिए एक निश्चित अवधि के बाद नीलामी के लिए तैयार किया जाता है।
- विक्रय (Sale):
- कुर्की के बाद, अगर बकाया राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो संपत्ति को सार्वजनिक नीलामी में बेच दिया जाता है।
- नीलामी में प्राप्त राशि से बकाया भू-राजस्व की वसूली की जाती है और यदि किसी अन्य कर्ज का बकाया हो, तो उसे भी चुकता किया जाता है।
71. 40 प्र० राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत सिविल न्यायालय और राजस्व न्यायालय की अधिकारिता के बारे में बताइये।
Jurisdiction of Civil Courts and Revenue Courts under the U.P. Revenue Code, 2006:
- सिविल न्यायालय की अधिकारिता (Jurisdiction of Civil Courts):
- सिविल न्यायालय भूमि स्वामित्व, भूमि विवाद, संपत्ति के अधिकार और अन्य सिविल मामले संबंधित मामलों को सुनने के लिए अधिकृत होते हैं।
- यदि भूमि पर कोई विवाद उत्पन्न होता है, जैसे कि स्वामित्व का दावा, तो सिविल न्यायालय मामले की सुनवाई करता है।
- राजस्व न्यायालय की अधिकारिता (Jurisdiction of Revenue Courts):
- राजस्व न्यायालय विशेष रूप से भूमि राजस्व, भूमि के कब्जे, पट्टे, राजस्व वसूली और भूमि उपयोग संबंधित मामलों को देखने के लिए अधिकृत होते हैं।
- राजस्व न्यायालय भूमि के उपयोग, राजस्व निर्धारण, भू-राजस्व वसूली, बेदखली और अन्य संबंधित मामलों में निर्णय लेते हैं।
72. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत किन आदेशों की अपील नहीं हो सकती है?
Non-Appealable Orders under U.P. Revenue Code, 2006:
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार, कुछ विशेष आदेशों के खिलाफ अपील नहीं की जा सकती। इन आदेशों में मुख्य रूप से वे आदेश शामिल हैं जिनमें:
- किसी भी निर्णय को संक्षिप्त प्रक्रिया (Summary Procedure) के तहत लिया गया हो।
- राजस्व परिषद या अन्य अधिकृत अधिकारियों द्वारा अस्थायी आदेश।
- विवादों का निपटारा, जिनमें अधिकार क्षेत्र से बाहर का मामला हो।
इन आदेशों पर कोई अपील नहीं की जा सकती और इन्हें अंतिम माना जाता है।
73. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें:
(1) राजस्व परिषद की पुनर्विलोकन की शक्ति
Power of Review to the Board of Revenue: राजस्व परिषद को पुनर्विलोकन की शक्ति प्राप्त है, जिसका मतलब है कि यदि किसी निर्णय में त्रुटि या अन्य असमझी हो, तो वह उस पर पुनः विचार कर सकता है और आदेशों को संशोधित कर सकता है। यह शक्ति मुख्य रूप से ग़लत निर्णयों को सुधारने के लिए दी जाती है ताकि न्यायपूर्ण निर्णय हो सके।
(2) मुकदमों को स्थानान्तरित करने की शक्ति
Power to Transfer Cases: राजस्व परिषद के पास मुकदमों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने की शक्ति होती है। यह तब होता है जब कोई मुकदमा किसी विशेष राजस्व अधिकारी के पास नहीं सुनवाया जा सकता या उसे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की आवश्यकता हो।
(3) राजस्व परिषद की अभिलेख मंगाने की शक्ति
Power to Call for Records the Board of Revenue: राजस्व परिषद को किसी भी मामले के अभिलेखों को मंगाने की शक्ति प्राप्त है। यदि किसी मामले में वह किसी दस्तावेज या निर्णय का संदर्भ लेना चाहता है, तो वह संबंधित अभिलेखों को अपने पास मंगवा सकता है और उनका पुनः मूल्यांकन कर सकता है।
74. उ० प्र० राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत सद्भावनापूर्वक की गयी कार्यवाही का संरक्षण के बारे में बताइये।
Protection of Actions Taken in Good Faith under the U.P. Revenue Code, 2006:
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अनुसार, यदि किसी अधिकारी ने सद्भावनापूर्वक और निष्कलंक उद्देश्य से कोई कार्यवाही की है, तो उन कार्यवाहियों के लिए उसे दंडित नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान अधिकारियों को संरक्षण प्रदान करता है, ताकि वे बिना डर के अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें, बशर्ते उनका इरादा गलत न हो।
75. निम्न पर टिप्पणी लिखें:
(1) कैवियट दाखिल करना
Lodging of Caveat: कैवियट दाखिल करना एक कानूनी प्रक्रिया है जिसमें कोई व्यक्ति अदालत से पहले आदेश प्राप्त करने से रोकने के लिए आवेदन करता है। यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि न्यायालय किसी पक्ष के पक्ष में बिना सुनवाई के कोई आदेश जारी न कर दे।
(2) ग्राम राजस्व समिति का गठन
Constitution of Village Revenue Committee: ग्राम राजस्व समिति का गठन ग्राम स्तर पर भूमि और राजस्व से संबंधित मामलों के समाधान के लिए किया जाता है। यह समिति राजस्व अधिकारियों और ग्राम पंचायत के सदस्य के सहयोग से कार्य करती है और भूमि से संबंधित विवादों का निपटारा करती है।
(3) सरसरी कार्यवाही का किया जाना
Determination of Proceedings under Summary Procedures: सरसरी कार्यवाही में मामलों का जल्दी और संक्षिप्त रूप से निपटारा किया जाता है। इसमें समय की बचत करने के लिए कम गवाही और दस्तावेजों की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया उन मामलों के लिए लागू की जाती है जो सरल और सीधे होते हैं।
76. उ० प्र० राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत दण्ड देने की शक्ति के सम्बन्ध में क्या प्रावधान किया गया है?
Provisions for Power to Impose Penalty Under the U.P. Revenue Code, 2006:
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अंतर्गत अधिकारियों को दंड लगाने की शक्ति दी गई है। यह शक्ति उन मामलों में लागू होती है जहां भूमि के प्रयोग में किसी प्रकार की अनियमितता या उल्लंघन पाया जाता है। दंड का उद्देश्य किसानों और भूमिधरों को राजस्व संबंधी नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित करना होता है। दंड में जुर्माना, भूमि की जब्ती या अन्य वैधानिक कार्यवाही शामिल हो सकती है।
77. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें:
(1) नियम बनाने की शक्ति
Power to Make Rules: उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत, राज्य सरकार या संबंधित प्राधिकरण को नियम बनाने की शक्ति दी गई है। यह नियम किसी विशेष कार्यवाही को निर्धारित करने, प्रक्रिया को स्पष्ट करने और कानूनी व्यवस्था को सुधारने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं। इन नियमों के माध्यम से विधिक और प्रशासनिक कार्यों को बेहतर तरीके से संचालित किया जाता है।
(2) कठिनाइयों दूर करने की शक्ति
Power to Remove Difficulties: इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी कानून या नियम को लागू करने में यदि कोई कठिनाई उत्पन्न हो, तो राज्य सरकार को उसे दूर करने की शक्ति प्राप्त है। यह शक्ति कानून या प्रशासन के उचित कार्यान्वयन के लिए दी जाती है ताकि किसी भी परिस्थिति में कोई कठिनाई न हो और व्यवस्था बनी रहे।
78. उत्तर प्रदेश जोत चकबन्दी अधिनियम, 1953 के उद्देश्यों का अधिकथन कीजिए।
Aims and Objectives of the U.P. Consolidation of Holdings Act, 1953: उत्तर प्रदेश जोत चकबन्दी अधिनियम, 1953 का मुख्य उद्देश्य भूमि सुधार और कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए भूमि का पुनर्वितरण और पुनः संगठन करना है। इसका उद्देश्य किसानों को उनके खेतों में एकत्रित और सुसंगठित भूमि प्रदान करना है ताकि कृषि कार्य अधिक सुचारू और लाभकारी हो सके। इसके माध्यम से भूमि का एकत्रीकरण किया जाता है, जो किसानों को बेहतर तरीके से खेती करने में सहायता करता है।
79. चकबन्दी (Consolidation) से आप क्या समझते हैं? चकबन्दी किन जोतदारों पर लागू होती है? चकबन्दी के क्या लाभ हैं? चकबन्दी के सम्बन्ध में घोषणा तथा विज्ञप्ति से सम्बन्धित प्रावधानों का उल्लेख करें।
What is Consolidation? Who are the tenure holders to whom it applies? What are its benefits?
चकबन्दी (Consolidation) एक प्रक्रिया है, जिसमें विभिन्न छोटे-छोटे खेतों को एकत्रित करके एक बड़ा और सुव्यवस्थित खेत बनाया जाता है। यह प्रक्रिया भूमि सुधार के उद्देश्य से की जाती है, ताकि खेती अधिक सटीक और उत्पादक हो सके।
जोतदारों पर लागू होने वाले: चकबन्दी सामान्यतः उन जोतदारों पर लागू होती है जिनकी भूमि छोटे टुकड़ों में बंटी हुई होती है। यह उनके भूमि के पुर्नवितरण और पुनर्संयोजन के लिए की जाती है।
लाभ:
- भूमि का समुचित और बेहतर उपयोग
- कृषि उत्पादन में वृद्धि
- जल, भूमि, और संसाधनों का बेहतर प्रबंधन
घोषणा और विज्ञप्ति: चकबन्दी प्रक्रिया शुरू करने से पहले राज्य सरकार द्वारा घोषणा की जाती है और इसकी जानकारी सार्वजनिक की जाती है, ताकि सभी संबंधित भूमि मालिकों को सूचित किया जा सके और प्रक्रिया पारदर्शी रहे।
80. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें:
(i) पुनः चकबन्दी (Re-consolidation)
Re-consolidation: पुनः चकबन्दी का मतलब है पहले से की गई चकबन्दी के बाद भूमि का पुनः पुनर्वितरण। यह तब किया जाता है जब भूमि के स्वामित्व या उपयोग में बदलाव होता है और पुराने चकबन्दी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता होती है।
(ii) चकबन्दी न्यायालय (Consolidation Courts)
Consolidation Courts: यह विशेष न्यायालय होते हैं जो चकबन्दी प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न होने वाले विवादों को हल करने के लिए बनाए जाते हैं। इन न्यायालयों में चकबन्दी से संबंधित सभी कानूनी मामले निपटाए जाते हैं।
(iii) निष्क्रान्त सम्पत्ति (Evacue Property)
Evacue Property: निष्क्रान्त सम्पत्ति वह भूमि या संपत्ति होती है, जो किसी क्षेत्र से पलायन या स्थानांतरण के कारण खाली हो जाती है। ये संपत्तियाँ सरकारी नियंत्रण में आ जाती हैं और फिर उन्हें पुनः आबंटित किया जा सकता है।
(iv) चकबंदी समिति (Consolidation Committee)
Consolidation Committee: यह समिति चकबन्दी प्रक्रिया को लागू करने के लिए जिम्मेदार होती है। समिति भूमि के पुनर्वितरण, पुन: संगठन और अन्य चकबन्दी संबंधित कार्यों को करती है। इसमें विभिन्न भूमि अधिकारी और अन्य विशेषज्ञ सदस्य शामिल होते हैं।
81. चकबन्दी उपनिदेशक से क्या तात्पर्य है? चकबन्दी निदेशक तथा चकबन्दी उपनिदेशक की पुनरीक्षण एवं निदेशन की शक्तियों का वर्णन करें।
Meaning of Consolidation Deputy Director and Powers of Director & Deputy Director of Consolidation:
चकबन्दी उपनिदेशक वह अधिकारी होते हैं जो चकबन्दी प्रक्रिया के संचालन में मदद करते हैं। वे चकबन्दी निदेशक के तहत कार्य करते हैं और भूमि पुनः संगठन, भूमि विवादों के समाधान, और चकबन्दी की योजना लागू करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
पुनरीक्षण एवं निदेशन की शक्तियाँ:
- चकबन्दी निदेशक और चकबन्दी उपनिदेशक दोनों के पास चकबन्दी योजनाओं की पुनरीक्षण करने और विवादों के समाधान के लिए निदेश देने की शक्ति होती है। वे भूमि मालिकों की शिकायतों को सुनते हैं और उचित निर्देश देते हैं।
- वे चकबन्दी प्रक्रिया की समीक्षा कर सकते हैं और आवश्यक सुधार की दिशा में आदेश जारी कर सकते हैं।
82. चकबन्दी योजना से क्या तात्पर्य है? उन आवश्यक शर्तों का वर्णन कीजिए जिन्हें चकबन्दी योजना द्वारा पूर्ण (समाहित) किया जाना चाहिए। प्रारम्भिक चकबन्दी योजना किसके द्वारा बनायी जाती है?
Meaning of Consolidation Scheme and its Conditions:
चकबन्दी योजना वह योजना है, जिसमें भूमि के पुनः संगठन, पुनर्वितरण और चकबन्दी की प्रक्रिया को निर्धारित किया जाता है। इसमें भूमि के विभाजन को सुनिश्चित किया जाता है, ताकि कृषि कार्य में अधिकतम लाभ प्राप्त हो सके।
आवश्यक शर्तें:
- भूमि की बेहतर उपलब्धता और समुचित उपयोग
- खेतों का एकत्रित और समुचित रूप से वितरण
- किसानों की सहमति और उनके अधिकारों का सम्मान
प्रारंभिक चकबन्दी योजना: यह योजना चकबन्दी निदेशक द्वारा बनाई जाती है और इसमें भूमि का विस्तृत विश्लेषण, पुनर्वितरण और सुधार के उपाय शामिल होते हैं।